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होर्मुज संकट में क्या तेल कंपनियों ने कमाया मुनाफा? यहां है हर सवाल का जवाब

पश्चिम एशिया में हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के हालिया संकट और कच्चे तेल की सप्लाई में बाधा के बीच, भारत की सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने वित्त वर्ष 2025-26 में 77,821 करोड़ रुपये का शानदार मुनाफा दर्ज किया है. इस आंकड़े को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं, लेकिन असल तस्वीर देश और जनता के लिए बेहद सकारात्मक है. करीब 20 लाख करोड़ रुपये के विशाल टर्नओवर पर यह महज 3 से 4 फीसदी का बेहद जरूरी और सामान्य वर्किंग मार्जिन है, जो एक स्वस्थ कंपनी के लिए आवश्यक है.

होर्मुज संकट में क्या तेल कंपनियों ने कमाया मुनाफा? यहां है हर सवाल का जवाब
होर्मुज संकट में क्या तेल कंपनियों ने कमाया मुनाफा? यहां है हर सवाल का जवाब

सबसे खास बात यह है कि इस मुनाफे का सीधा फायदा देश के विकास और आम जनता को मिल रहा है. इसका आधा हिस्सा डिविडेंड (लाभांश) के रूप में सरकारी खजाने में जाता है, जिससे देश में शानदार हाईवे, रेलवे और मेट्रो जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होता है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय संकट के बावजूद सरकार ने 27 मार्च 2026 को पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) घटाकर जनता को महंगाई से पूरी तरह सुरक्षित रखा है. आइए, आसान सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं कि कैसे सरकारी तेल कंपनियों ने देश की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के हितों की बेहतरीन तरीके से रक्षा की है.

सवाल 1: पिछले साल की तुलना में तेल कंपनियों के मुनाफे में उछाल कैसे आया?

जवाब: यह उछाल कोई अप्रत्याशित कमाई नहीं है. दरअसल, वित्त वर्ष 2024-25 में इन कंपनियों का मुनाफा घटकर महज 33,602 करोड़ रुपये रह गया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कंपनियों ने देश की जनता को मात्र 550 रुपये में एलपीजी सिलेंडर देने के लिए खुद 40,434 करोड़ रुपये का भारी घाटा (अंडर-रिकवरी) अपने कंधों पर उठाया था. बाद में सरकार ने इस राशि की भरपाई कर दी. यदि पिछले तीन वर्षों का औसत देखें, तो यह मुनाफा सालाना लगभग 64,000 करोड़ रुपये बैठता है. यानी यह 130 फीसदी की छलांग सिर्फ इसलिए दिख रही है क्योंकि पिछले साल कंपनियों ने जनता की भलाई के लिए अपना मुनाफा कम कर लिया था.

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सवाल 2: तेल कंपनियों को हुए 77,821 करोड़ रुपये के मुनाफे का असली सच क्या है?

जवाब: आंकड़े को टर्नओवर के चश्मे से देखना जरूरी है. तीनों बड़ी सरकारी तेल कंपनियों का कुल कारोबार लगभग 20 लाख करोड़ रुपये है. इस विशाल टर्नओवर पर 77,821 करोड़ रुपये का मुनाफा केवल 3 से 4 फीसदी का ऑपरेटिंग मार्जिन है. कोई भी स्वस्थ बिजनेस इतने मार्जिन के बिना नहीं चल सकता. अगर कंपनियां मुनाफा नहीं कमाएंगी, तो देश की भविष्य की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी होंगी? सिर्फ एक रिफाइनरी के विस्तार में 50,000 से 60,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है. विदेशी प्राइवेट कंपनियों (जैसे विटोल, एक्सॉनमोबिल) की तुलना में तो भारतीय कंपनियों का मुनाफा बेहद मामूली और संतुलित है.

सवाल 3: क्या हॉर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल के दामों में आई तेजी का फायदा इन कंपनियों को मिला है?

जवाब: बिल्कुल नहीं. हॉर्मुज संकट के समय भारतीय बाजार पूरी तरह सुरक्षित रहा. भारतीय तेल कंपनियों की कुशल रणनीति के तहत उनके पास संकट शुरू होने से पहले ही पुरानी और सस्ती कीमतों पर खरीदा गया 50 से 60 दिनों का कच्चा तेल (क्रूड इन्वेंट्री) मौजूद था. इसलिए चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2026) के नतीजों पर महंगे क्रूड का कोई असर नहीं पड़ा. महंगे कच्चे तेल का वास्तविक बोझ कंपनियों के बही-खातों में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में दिखाई देगा.

सवाल 4: अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच सरकार ने आम जनता को महंगाई की मार से कैसे बचाया?

जवाब: सरकार ने बेहद मुस्तैदी दिखाते हुए संकट शुरू होने के महज चार हफ्ते के भीतर, 27 मार्च 2026 को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की बड़ी कटौती कर दी. अगर 2021 से देखें, तो सरकार अब तक पेट्रोल पर 23 रुपये और डीजल पर 26 रुपये की टैक्स कटौती कर चुकी है. इसी का नतीजा है कि दुनिया भर में मचे हाहाकार के बीच भारत में ईंधन की कीमतें केवल 8 से 9 फीसदी ही बढ़ी हैं. जबकि नेपाल और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम 20 से 67 फीसदी तक बढ़ चुके हैं. भारत की इस मूल्य-स्थिरता नीति ने ही देश की महंगाई दर को 5-6 प्रतिशत के सुरक्षित दायरे में बनाए रखा है.

सवाल 5: यह भारी-भरकम मुनाफा आखिर जाता कहां है?

जवाब: इस मुनाफे का एक-एक पैसा देश के काम आ रहा है. मुनाफे का लगभग 50 फीसदी हिस्सा सरकार को डिविडेंड के रूप में मिलता है, जो सीधे जनता की सुविधाओं (सड़क, रेल, अस्पताल) पर खर्च होता है. बची हुई रकम का इस्तेमाल रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने (केपेक्स पाइपलाइन) में किया जाता है.
सबसे अच्छी बात यह है कि 2014 के बाद से मौजूदा सरकार ने एक भी नया ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी नहीं किया है, जिससे आने वाली पीढ़ियों पर कर्ज का कोई बोझ न पड़े. इसके विपरीत, सरकार आज भी यूपीए (UPA) काल के 1.3 लाख करोड़ रुपये के पुराने ऑयल बॉन्ड का भुगतान बजट से कर रही है. तेल कंपनियों ने संकट के दौर में मुनाफाखोरी नहीं की, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनकर उपभोक्ताओं की जेब की रक्षा की है.

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