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Ebola Vaccine: कोरोना के बाद अब इबोला की वैक्सीन बनाएगा सीरम इंस्टीट्यूट; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ हुआ बड़ा करार

कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाली भारतीय दवा निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) अब एक और घातक वायरस के खिलाफ कदम बढ़ाने जा रही है। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, सीरम इंस्टीट्यूट ने खतरनाक ‘इबोला वायरस’ (Ebola Virus) की वैक्सीन तैयार करने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ एक महत्वपूर्ण करार किया है। चिकित्सा विशेषज्ञों (Medical Experts) का मानना है कि यह साझेदारी भविष्य में इबोला के प्रकोप को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इबोला वायरस से निपटने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ता नई वैक्सीन विकसित करने और आने वाले समय में इसे रोल आउट करने की तैयारी में जुट गए हैं। इस वैक्सीन के निर्माण और बड़े पैमाने पर उत्पादन में भारत की पुणे स्थित बायोटेक कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया अहम भूमिका निभाएगी।

Ebola Vaccine: कोरोना के बाद अब इबोला की वैक्सीन बनाएगा सीरम इंस्टीट्यूट; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ हुआ बड़ा करार
Ebola Vaccine: कोरोना के बाद अब इबोला की वैक्सीन बनाएगा सीरम इंस्टीट्यूट; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ हुआ बड़ा करार

अगले कुछ महीनों में तैयार हो सकती है पहली डोज:

ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप और पैंडेमिक साइंसेज इंस्टीट्यूट की हेड ऑफ वैक्सीन इम्यूनोलॉजी प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे (Teresa Lambe) ने बताया कि इस वैक्सीन के लिए जानवरों पर परीक्षण (Animal Studies) पहले ही शुरू हो चुके हैं और दुनिया भर के साझेदार संस्थानों के साथ काम को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया एक ऐसी संस्था है जो बहुत तेजी से और बड़े स्तर पर उत्पादन करने की क्षमता रखती है। हमें उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों के अंदर क्लीनिकल ग्रेड वैक्सीन डोज तैयार हो जाएंगी। कोविड-19 के दौरान ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका (कोविशील्ड) वैक्सीन की सह-डिजाइनर रह चुकी प्रोफेसर लैम्बे ने बताया कि वैज्ञानिक ऐसी इबोला वैक्सीन विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो केवल एक डोज (Single Dose) में ही प्रभावी हो।

इबोला क्यों माना जाता है बेहद खतरनाक?

इबोला एक बेहद खतरनाक और तेजी से फैलने वाली संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों के जरिए इंसानों में फैलती है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ‘ज़ूनोटिक बीमारी’ (Zoonotic Disease) कहा जाता है। यह बीमारी ऑर्थोइबोलावायरस (Ortho Ebola Virus) परिवार के वायरस की वजह से होती है। इस वायरस के कई प्रकार (Strains) हैं, जिनमें इबोला वायरस, सूडान वायरस और बुंडीबुग्यो (Bundibugyo) वायरस प्रमुख माने जाते हैं।

यह वायरस शरीर में गंभीर हेमोरेजिक फीवर (Hemorrhagic Fever) पैदा करता है, जिसमें तेज बुखार के साथ शरीर के अंदरूनी और बाहरी अंगों से रक्तस्राव जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इबोला की मृत्यु दर काफी अधिक होती है और कुछ पिछले प्रकोपों में यह 50 से 90 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, वर्तमान में चर्चा में आया स्ट्रेन बुंडीबुग्यो वायरस से जुड़ा बताया जा रहा है, जो इबोला का एक दुर्लभ प्रकार माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इस विशिष्ट स्ट्रेन के लिए फिलहाल कोई विशेष स्वीकृत वैक्सीन या पूरी तरह प्रभावी इलाज वैश्विक स्तर पर उपलब्ध नहीं है। ऐसे में लक्षणों की समय पर पहचान, संक्रमित व्यक्ति को तुरंत आइसोलेट करना और संक्रमण नियंत्रण के कड़े उपाय ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका माने जाते हैं।

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डिस्क्लेमर: यह लेख वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों (WHO) और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा जारी आधिकारिक शोध व बयानों पर आधारित है। इबोला वायरस एक गंभीर संक्रामक बीमारी है। किसी भी प्रकार के संक्रामक लक्षण दिखने पर या अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी गाइडलाइंस व चिकित्सकीय सलाह का ही पालन करें।

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