रूस के राष्ट्रपति पुतिन दो दिन के चीन दौरे पर हैं. वो मंगलवार को चीन पहुंचे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दौरे के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति की इस चीन यात्रा ने दुनिया का ध्यान खींचा है. हालांकि, राष्ट्राध्यक्षों की यात्राएं पूर्व नियोजित होती हैं. जरूरी नहीं है कि ट्रम्प ने चीन का दौरा किया इसलिए पुतिन पहुंच गए. आइए, पुतिन की इस चीन यात्रा के बहाने जानते हैं कि चीन एवं रूस की दोस्ती इतनी गहरी क्यों हैं? पांच बड़ी वजह क्या हैं?

चीन और रूस आज दुनिया की राजनीति में बहुत अहम देश हैं. दोनों बड़े हैं. ताकतवर हैं. दोनों के पास सेना, संसाधन और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव है. इसकी वजह सिर्फ एक नहीं है. इसके पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं. यह रिश्ता हमेशा एक जैसा नहीं रहा. अतीत में दोनों के बीच तनाव भी रहा. सीमा विवाद भी रहे. विचारधारा को लेकर मतभेद भी रहे, लेकिन समय के साथ दोनों ने अपने हित समझे. अब वे कई मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आते हैं. चीन और रूस की दोस्ती को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दोनों देश दुनिया को कैसे देखते हैं? दोनों को लगता है कि पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, का असर बहुत ज्यादा है. दोनों नहीं चाहते कि दुनिया पर सिर्फ एक ही ताकत का दबदबा हो. वे ऐसी विश्व व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें कई बड़े देश मिलकर संतुलन बनाए रखें. यही सोच उनके रिश्ते को मजबूत करती है.
1- अमेरिका और पश्चिमी दबाव का साझा जवाब
चीन और रूस की नजदीकी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका है. दोनों देशों के अपने-अपने कारण हैं. रूस को लगता है कि नाटो और पश्चिम उसकी सीमाओं के करीब आते गए. उसे यह अपनी सुरक्षा के लिए खतरा लगता है. दूसरी तरफ, चीन को अमेरिका की एशिया नीति, व्यापारिक दबाव और इंडो-पैसिफिक रणनीति से चुनौती महसूस होती है. दोनों देशों को लगता है कि अमेरिका दुनिया में अपनी शर्तें लागू करना चाहता है इसलिए वे कई मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन करते हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी अक्सर दोनों की सोच मिलती दिखती है. जब किसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ता है, तब चीन और रूस एक-दूसरे के और करीब आते हैं. यह दोस्ती भावनाओं से कम और रणनीति से ज्यादा जुड़ी है. दोनों जानते हैं कि अकेले रहना मुश्किल हो सकता है. साथ रहने से उनका कद बढ़ता है. दुनिया को भी संदेश जाता है कि वे पश्चिम के सामने झुकने वाले नहीं हैं. इस साझा दबाव ने उनकी दोस्ती को गहरा किया है.
2- ऊर्जा और व्यापार का मजबूत रिश्ता
रूस के पास तेल, गैस और खनिज संपदा बहुत है. चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. उसे लगातार ऊर्जा चाहिए. उसकी फैक्ट्रियां, शहर और उद्योग भारी मात्रा में ईंधन मांगते हैं. यहां दोनों के हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. रूस के लिए चीन बड़ा बाजार है. खासकर तब, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए. ऐसे समय में चीन रूस के लिए बहुत अहम खरीदार बन गया. दूसरी ओर, चीन को रूस से सस्ती और स्थिर ऊर्जा मिलती है.
रूस और चीन दोनों ही देश डॉलर पर निर्भरता घटाना चाहते हैं. फोटो: AP/PTI
पाइप-लाइन परियोजनाएं, गैस समझौते और लंबी अवधि के व्यापारिक करार इस रिश्ते को मजबूत बनाते हैं. दोनों देश डॉलर पर निर्भरता कम करने की भी कोशिश करते रहे हैं. वे स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात करते हैं. यह कदम आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है. अगर पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था से जोखिम बढ़े, तो दोनों एक वैकल्पिक रास्ता चाहते हैं.
3- रणनीतिक और सैन्य सहयोग
चीन और रूस का रिश्ता सुरक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ा है. दोनों देश सैन्य अभ्यास करते हैं. रक्षा क्षेत्र में तकनीकी सहयोग भी देखने को मिलता है. यह सहयोग सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है. इसके पीछे साफ संदेश होता है कि दोनों बड़ी सैन्य ताकतें हैं और अपने हितों की रक्षा कर सकती हैं. रूस लंबे समय से सैन्य तकनीक में मजबूत माना जाता है.
चीन ने भी पिछले वर्षों में अपनी सेना को तेजी से आधुनिक बनाया है. दोनों के बीच रक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और सुरक्षा संवाद के कई स्तर हैं. इससे विश्वास बढ़ता है. साथ ही, दोनों को एक-दूसरे की ताकत का अंदाजा भी रहता है. हालांकि, यह कहना ठीक नहीं होगा कि दोनों पूरी तरह एक सैन्य गठबंधन में बंधे हैं. उनका रिश्ता नाटो जैसा औपचारिक गठबंधन नहीं है. फिर भी, कई मामलों में उनका सामरिक तालमेल मजबूत है. खासकर तब, जब वे अमेरिका और उसके सहयोगियों की गतिविधियों को अपने लिए चुनौती मानते हैं. यह सहयोग एशिया, यूरोप और आर्कटिक जैसे क्षेत्रों में भी असर डालता है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. फोटो: AP/PTI
4- बहुध्रुवीय दुनिया की साझा सोच
चीन और रूस दोनों ऐसी दुनिया चाहते हैं, जिसमें कई शक्तियां हों. वे नहीं चाहते कि एक ही देश वैश्विक नियम तय करे. इस सोच को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहा जाता है. यही विचार उनकी विदेश नीति का अहम हिस्सा है. रूस खुद को एक बड़ी सभ्यता और वैश्विक शक्ति मानता है. चीन भी अपने पुराने गौरव और आधुनिक ताकत दोनों को सामने रखकर आगे बढ़ रहा है. दोनों चाहते हैं कि एशिया, यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में पश्चिमी असर का विकल्प बने. इसीलिए वे ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और दूसरे मंचों पर साथ काम करते हैं.
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इन मंचों पर दोनों देशों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है. वे विकासशील देशों को भी यह संदेश देते हैं कि दुनिया में पश्चिम के अलावा भी ताकतें मौजूद हैं. यह संदेश कई देशों को आकर्षित करता है. खासकर उन देशों को, जो पश्चिमी दबाव से परेशान रहते हैं. इस साझा सोच ने चीन और रूस के रिश्ते को वैचारिक आधार दिया है. वे हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं सोचते. पर इतना जरूर है कि वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने की इच्छा उनमें समान है. यही समानता उनकी नजदीकी को टिकाऊ बनाती है.
5- आर्थिक फायदा, कूटनीतिक सहारा
चीन और रूस की दोस्ती की एक और बड़ी वजह है व्यावहारिक राजनीति. दोनों देश आदर्शवाद से ज्यादा अपने हितों को महत्व देते हैं. उन्हें पता है कि दुनिया में स्थायी दोस्त कम, स्थायी हित ज्यादा होते हैं. इसलिए वे अपने रिश्ते को भावनात्मक नहीं, बल्कि उपयोगी आधार पर आगे बढ़ाते हैं. अतीत में चीन और रूस के बीच मतभेद रहे हैं. लेकिन अब दोनों उन पुराने विवादों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं.
चीन और रूस की दोस्ती की एक और बड़ी वजह है व्यावहारिक राजनीति.
सीमा विवाद काफी हद तक सुलझ चुके हैं. संवाद के रास्ते खुले हैं. दोनों यह भी समझते हैं कि टकराव से नुकसान होगा और सहयोग से फायदा. रूस को चीन से आर्थिक राहत, बाजार और कूटनीतिक सहारा मिलता है. चीन को रूस से ऊर्जा, सुरक्षा सहयोग और वैश्विक मंचों पर समर्थन मिलता है. दोनों के लिए यह रिश्ता लाभ का सौदा है. यही कारण है कि मुश्किल समय में भी वे एक-दूसरे से दूरी नहीं बनाते. वे अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को पहले रखते हैं. फिर भी, मौजूदा समय में उनके हित काफी हद तक एक दिशा में जाते हैं. यही व्यावहारिकता उनकी दोस्ती की असली ताकत है.
सरल शब्दों में कहें तो चीन और रूस की दोस्ती कई परतों वाली है. इसके पीछे अमेरिका और पश्चिम का दबाव है. ऊर्जा और व्यापार का रिश्ता है. सैन्य और रणनीतिक सहयोग है. बहुध्रुवीय दुनिया की साझा सोच है. साथ ही, बहुत मजबूत व्यावहारिक राजनीति भी है. फिर भी, यह याद रखना जरूरी है कि यह दोस्ती पूरी तरह भावनात्मक नहीं है. यह हितों पर आधारित है.





