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सुप्रीम कोर्ट: आवारा कुत्तों के मामलों की सुनवाई में आर्टिकल-21 का जिक्र क्यों? पूरे मामले में कब-क्या हुआ, यहां समझें

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों पर बड़ा फैसला सुनाया. कोर्ट ने आवारा कुत्तों के पुनर्वास और नसबंदी को लेकर नवंबर 2025 में दिए गए निर्देशों को वापस लेने की मांग वाली सभी याचिकाओं को खारिज किया. अपने फैसले में यह भी कहा है कि इन्हें खुली जगहों पर खाना नहीं खिलाया जाएगा. नगर निगम आवारा कुत्तों को पकड़कर नसबंदी और टीकाकरण करेगा. कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट: आवारा कुत्तों के मामलों की सुनवाई में आर्टिकल-21 का जिक्र क्यों? पूरे मामले में कब-क्या हुआ, यहां समझें
सुप्रीम कोर्ट: आवारा कुत्तों के मामलों की सुनवाई में आर्टिकल-21 का जिक्र क्यों? पूरे मामले में कब-क्या हुआ, यहां समझें

यही नहीं, कोर्ट ने कहा कि लोगों की जान की सुरक्षा करना बेहद जरूरी है.खतरनाक और बीमार आवारा कुत्तों को इंजेक्शन लगाकर मारा जा सकता है. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आर्टिकल 21 का जिक्र किया और कहा, लोगों की जान की सुरक्षा जरूरी है. उन्हें कुत्तों के खतरों से मुक्त होकर गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है. इसे आधार बनाते हुए फैसला सुनाया है. जानिए क्या है आर्टिकल-21, सुप्रीम कोर्ट के पूरे मामले में कब-क्या कहा, क्यों विरोध हुआ, कैसे याचिकाएं बढ़ीं. आसान भाषा में समझें.

क्या है आर्टिकल-21?

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारी की पीठ ने पिछले वर्ष नवंबर में न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों में संशोधन की मांग करने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिया. न्यायमूर्ति मेहता ने अपने फैसले में लिखा है कि अनुच्छेद 21 में हर नागरिक को सार्वजनिक स्थानों पर बिना किसी शारीरिक हमले या कुत्ते के काटने जैसी जानलेवा घटनाओं डर से भयमुक्त घूमने का अधिकार है. राज्य मूक दर्शक नहीं बना रह सकता.

भारतीय संविधान का आर्टिकल-21 देश के हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है. सरकार मनमाने तरीके से किसी की जान नहीं ले सकती और न ही बिना कारण गिरफ्तार कर सकती है. मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले में कोर्ट ने कहा था कि जीवन का अर्थ पशुओं के अस्तित्व से कहीं अधिक है.

सुप्रीम कोर्ट.

आवारा कुत्तों का मामला कैसे कोर्ट पहुंचा, अब तक क्या-क्या हुआ?

  • 28 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों के कारण रेबीज से होने वाली मौतों की घटनाओं का स्वत: संज्ञान लिया. 11 अगस्त को 8 हफ्तों में आवारा कुत्तों को दिल्ली-NCR के आवासीय क्षेत्रों से हटाकर शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया.
  • सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का विरोध हुआ और चीफ जस्टिस बीआर गवई ने फैसले का रिव्यू करने के लिए 3 जजों की स्पेशल बेंच को सौंपा. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा.
  • 23 अगस्त को आदेश दिया कि पकड़े गए कुत्तों को नसबंदी के बाद ही छोड़ा जाएगा. खूंखार कुत्तों को कैद में रखा जाएगा. नवंबर 2025 में कोर्ट ने सभी राज्य और नेशनल हाईवे से आवारा पशुओं को हटाने को कहा. कुत्तों को शेल्टर होम में रखने और उन्हें वापस न छोड़ने को कहा. सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाने पर भी बैन लगाया था.
  • कुत्तों के अधिकारों की वकालत करने वाले लोगों और NGO ने इस आदेश को रद्द करने के लिए याचिकाएं दाखिल कीं. अब मंगलवार को दिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसला सुनाया.
  • सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साफ कर दिया है कि सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश नहीं बदलेगा. इनके हमले चिंताजनक हैं. आवारा कुत्तों को पकड़कर नगर निगम नसबंदी और टीकाकरण करेगा. रैबीज संक्रमित खूंखार कुत्ते वापस नहीं छोड़े जाएंगे. खतरनाक व्यवहार वाले कुत्तों को शेल्टर होम तैयार किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा इस कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन पर विचार किया है. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा आवारा कुत्तों की लगातार बढ़ती आबादी के अनुपात में आवश्यक बुनियादी ढांचे का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करने के लिए सतत, व्यवस्थित और क्रमिक प्रयासों का स्पष्ट अभाव रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें हवाई अड्डों, रिहायशी इलाकों, शहरी केंद्रों आदि में कुत्तों के काटने की घटनाओं से अवगत कराया गया है. देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों (आईजीआई) पर बार-बार कुत्तों के काटने की घटनाएं होना ही गंभीर अक्षमता को दर्शाता है. सूरत में एक जर्मन यात्री को कुत्ते ने काट लिया. ऐसी घटनाएं शहरी प्रशासन में जनता के विश्वास को बुरी तरह प्रभावित करती हैं. अदालत यह कहने के लिए विवश है कि एबीसी ढांचे के प्रभावी कार्यान्वयन में घोर निष्क्रियता के कारण समस्या और भी गंभीर हो गई है.

आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार हो रही हैं. रिपोर्टों से पता चलता है कि समस्या ने बेहद चिंताजनक रूप ले लिया है. अकेले राजस्थान के श्री गंगानगर शहर में एक महीने में 1084 कुत्ते के काटने की घटनाएं दर्ज की गईं. रिपोर्टों के अनुसार, छोटे बच्चों को गंभीर चोटें आईं, जिनमें उनके चेहरे पर गंभीर घाव आदि शामिल हैं.

तमिलनाडु में वर्ष के पहले चार महीनों में लगभग 2 लाख मामले दर्ज किए गए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नुकसान सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि अथाह है. 22 अगस्त और 7 नवंबर को जारी निर्देशों के बावजूद, रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट है कि ये निर्देश जमीनी स्तर तक पहुंच चुके हैं.

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… तो राज्यों पर लिया जाएगा एक्शन

न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने को गंभीरता से लिया जाएगा. निर्देशों का पालन न करने पर राज्यों के खिलाफ अवमानना, अनुशासनात्मक कार्यवाही और दंडात्मक दायित्व की कार्यवाही शुरू की जाएगी. निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो राज्यों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य के दायित्वों के लिए एक ढांचा तैयार करना आवश्यक है. गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में कुत्ते के काटने के खतरे से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार शामिल है. राज्य मूकदर्शक नहीं रह सकता. न्यायालय उन कठोर जमीनी हकीकतों से अनभिज्ञ नहीं रह सकता जहां बच्चे, विदेशी यात्री और बुजुर्ग लोग कुत्ते के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं.

संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता जहां बच्चे और बुजुर्ग लोग दया, शारीरिक शक्ति और संयोग पर निर्भर रहें.सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के सर्वोपरि अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करने का संवैधानिक दायित्व है.इससे सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए खतरा पैदा करने वाली स्थितियों को रोकने के लिए प्रभावी और आवश्यक उपाय करने का कर्तव्य बनता है,जिसमें एबीसी ढांचे के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए शैक्षिक बुनियादी ढांचे का निर्माण, संवर्धन और रखरखाव शामिल है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी स्थितियों को बिना रोक-टोक के जारी रहने दिया गया.तो इसका अपरिहार्य परिणाम डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत की ओर प्रतिगमन हो सकता है,ऐसे में योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धांत सार्वजनिक स्थानों पर नागरिक जीवन को प्रभावी रूप से नियंत्रित करेगाा. ऐसी स्थिति विधि के शासन द्वारा संचालित संवैधानिक लोकतंत्र के साथ पूर्णतः असंगत होगी

सुप्रीम कोर्ट का राज्यों को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, राज्य सरकार, AWBI फ्रेमवर्क नियमों को सुदृढ़ और कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी.राज्य प्रत्येक जिले में कम से कम एक ABC केंद्र की स्थापना सुनिश्चित करेंगे.प्रत्येक राज्य जिले की जनसंख्या घनत्व को ध्यान में रखते हुए अधिकारी ABC केंद्रों के विस्तार हेतु आवश्यक कदम उठाएंगे. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को कार्यान्वित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाएंगे कि उनका अक्षरशः और भावार्थ कार्यान्वयन हो. AWB नियमों का कार्यान्वयन सुनिश्चित हो.आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए SC के निर्देशों को अन्य सार्वजनिक स्थानों तक विस्तारित करने के संबंध में सोच-समझकर और तर्कसंगत निर्णय लिए जाएंगे.

रैबीज रोधी दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी. NHAI राष्ट्रीय राजमार्गों आदि पर आवारा पशुओं की समस्या का समाधान करेगी और आवारा पशुओं के प्रबंधन आदि के लिए पुराने परिवहन वाहनों की तैनाती करेगी. NHAI एक निगरानी और समन्वय ढांचा स्थापित करेगी. संबंधित अधिकारी मानव जीवन के खतरे को कम करने के लिए कानूनी रूप से अनुमत उपाय कर सकते हैं, जिनमें रैबीज से संक्रमित, खतरनाक कुत्तों के मामले में इच्छामृत्यु भी शामिल है.

नगर निगम, राज्य प्रशासन आदि के वे अधिकारी जिन्हें कोर्ट के निर्देशों के कार्यान्वयन का दायित्व सौंपा गया है, उनके द्वारा किए गए कार्यों में उचित संरक्षण के हकदार होंगे, ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सामान्यतः कोई एफआईआर या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी

khabarmonkey@gmail.com

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