उत्तर प्रदेश सरकार ने सोमवार को तीन स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण तय करने हेतु उत्तर प्रदेश राज्य समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है।

सरकार की ओर से यह कदम स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण लागू करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से जारी निर्देशों के अनुरूप उठाया गया है।
मार्च में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आयोग के गठन में हो रही देरी पर सख्त रुख अपनाया था और पूछा था कि क्या यह प्रक्रिया पंचायतों के मौजूदा पांच साल के कार्यकाल के 26 मई को समाप्त होने से पहले पूरी हो जाएगी।
यह क्यों मायने रखता है?
अदालतों ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय चुनावों में ओबीसी को आरक्षण देने से पहले, राज्यों को एक सख्त “ट्रिपल टेस्ट” पास करना होगा, जिसमें- एक समर्पित आयोग का गठन करना, पिछड़ेपन की अनुभवजन्य जाँच करना और संवैधानिक सीमाओं के भीतर आरक्षण का अनुपात तय करना शामिल है। इस आयोग के साथ, योगी सरकार पहली शर्त पूरी कर रही है।
पंचायत चुनाव का राजनीतिक महत्व क्या है?
में पंचायत चुनाव एक बहुत बड़ा आयोजन होता है, जिसमें पंचायत के अलग-अलग स्तरों पर 8 लाख से अधिक पदों के लिए चुनाव होते हैं। साल 2021 के चुनावों में 58189 ग्राम पंचायतों के 7.32 लाख वार्डों, 826 क्षेत्र पंचायतों के 75855 वार्ड़ों और 75 जिलों के 3051 सदस्यों के लिए चुनाव हुए थे।
हालांकि स्थानीय निकाय चुनाव राजनीतिक पार्टियों के चुनाव चिन्हों पर नहीं लड़े जाते, फिर भी बड़ी पार्टियां इन्हें अपनी ताकत दिखाने के लिए एक अहम चुनाव मानती है। 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के तौर पर सभी पार्टियां पंचायत चुनावों पर नजर गड़ाए हुए हैं ताकि वे जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकें और प्रदेश में अपनी ताकत दिखा सकें।
क्या करेगा यह आयोग?
अनुभवजन्य अध्ययन करना
एक अध्ययन से पूरे प्रदेश में ओबीसी वर्ग के बीच पिछड़ेपन की प्रकृति, सीमा और प्रभाव का आकलन करने में मदद मिलेगी। साथ ही यह निष्कर्षों के आधार पर, पैनल आरक्षण के अनुपात और तरीके की सिफारिश करेगा। जानकारी दे दें कि अनुभवजन्य अध्ययन का मतलब है कि ऐसा अध्ययन जो वास्तविक आंकड़ों, तथ्य, सर्वे, जमीन पर मिले डेटा और लोगों के अनुभवों के आधार पर किया जाए।
आरक्षण ढांचे की जांच करना
यह आयोग उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947, और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के तहत आरक्षण से संबंधित प्रावधानों की जांच करेगा। यह उत्तर प्रदेश पंचायत राज (सीटों और पदों का आरक्षण और आवंटन) नियम, 1994, और अन्य नियमों के तहत परिचालन ढांचे की भी समीक्षा करेगा।
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किन आधारों पर होगा विश्लेषण?
कैबिनेट नोट के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 243D और संबंधित राज्य कानूनों के तहत, पंचायत निकायों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण दिया जाता है।
कैबिनेट नोट में आगे कहा गया है कि जबकि एससी/एसटी आरक्षण उनकी आबादी के अनुपात में जारी रहेगा, पंचायतों में ओबीसी आरक्षण कुल सीटों के 27 प्रतिशत तक सीमित रहेगा। इसके अलावा, यदि पिछड़े वर्गों के लिए नया जनसंख्या डेटा उपलब्ध नहीं है, तो उनकी आबादी का आकलन एक निर्धारित सर्वे प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है।
कितने सदस्य होंगे शामिल?
इसमें पांच सदस्य शामिल होंगे जिन्हें पिछड़े वर्ग के मुद्दों में विशेषज्ञता हासिल होगी और जिन्हें राज्य सरकार की ओर से नियुक्त किया जाएगा। सदस्यों में से एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट के न्यायाधीश होंगे, जो अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे।
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए 17 हजार से अधिक एनकाउंटर
उत्तर प्रदेश में 2017 के बाद 17 हजार से अधिक एनकाउंटर हुए हैं। यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश सरकार ने जारी किए हैं। सरकार ने बताया कि मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यूपी पुलिस ने 17043 एनकाउंटर की हैं यानी हर दिन औसतन पांच एनकाउंटर हुए हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए





