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भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने चीन से मांगा परमाणु हथियार, जिनपिंग ने…

इस्लामाबाद: पाकिस्तान से लीक हुई एक रिपोर्ट से पता चला है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ चीन से न्यूक्लियर हथियार मांगे थे लेकिन चीन ने देने से मना कर दिया था। पाकिस्तान का एक लीक हुआ डिप्लोमेटिक केबल में कई बड़े खुलासे हुए हैं जिनमें इमरान खान को सत्ता से हटाने में अमेरिका की भूमिका, 2019 में असीम मुनीर का सीक्रेट ईरान दौरा और भारत के खिलाफ पाकिस्तान के न्यूक्लियर ट्रायड को पूरा करने के लिए चीन से मदद मांगने का खुलासा हुआ है। इस लीक केबल ने जियो पॉलिटिक्स में भूचाल ला दिया है और पाकिस्तान के डबल गेम का खुलासा हुआ है।

भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने चीन से मांगा परमाणु हथियार, जिनपिंग ने…
भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने चीन से मांगा परमाणु हथियार, जिनपिंग ने…

खोजी पत्रकारिता करने वाली संस्था ‘ड्रॉप साइट’ ने उस मूल दस्तावेज को प्रकाशित किया है जिनसे बड़े बड़े खुलासे हो रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने चुपचाप चीन से ‘समुद्र से लॉन्च होने वाली न्यूक्लियर स्ट्राइक क्षमता’ डेवलप करने में मदद मांगी थी। यानि पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली परमाणु शक्ति के लिए मदद मांगी थी लेकिन चीन ने पाकिस्तान को ये तकनीक दने से मना कर दिया था। यह कोई सामान्य सैन्य तकनीक नहीं थी बल्कि किसी भी परमाणु शक्ति की सबसे संवेदनशील और एडवांस डेटरेंस क्षमता मानी जाती है। भारत के रणनीतिक हलकों में इसे बेहद गंभीर संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

पाकिस्तान ने चीन से मांगी थी भारत के खिलाफ सेकेंड स्ट्राइक क्षमता
पाकिस्तान से लीक हुए डिप्लोमेटिक केबल के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान ने बीजिंग से समुद्र-आधारित परमाणु ‘सेकंड-स्ट्राइक’ क्षमता प्रदान करने के लिए कहा जो किसी भी परमाणु शक्ति की निवारक क्षमता का सबसे संवेदनशील तत्व है और एक ऐसी क्षमता जिसे विकसित करने के लिए पाकिस्तान ने अकेले ही दो दशक खर्च किए हैं लेकिन अभी तक वो क्षमता हासिल नहीं कर पाया है।

डिप्लोमेटिक केबल से पता चलता है कि चीन ने पाकिस्तान के सेकंड स्ट्राइक क्षमता देने से मना कर दिया था। वार्ताओं की जानकारी रखने वाले सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान की मांग के बाद बीजिंग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सेकंड-स्ट्राइक का यह अनुरोध दक्षिण एशिया में परमाणु प्रसार में चीन की प्रत्यक्ष भागीदारी के समान होगा और इसलिए यह बीजिंग की अपनी अप्रसार प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करेगा जो चीन को ऐसे अंतरराष्ट्रीय परिणामों के जोखिम में डाल देगा जो ग्वादर सुविधा के रणनीतिक महत्व की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर होंगे।

चीन ने पाकिस्तान को परमाणु मदद से क्यों कर दिया इनकार?
आपको बता दें कि परमाणु रणनीति में सेकंड स्ट्राइक क्षमता का मतलब है कि अगर दुश्मन पहले हमला करके आपके जमीनी मिसाइल बेस और एयरबेस नष्ट भी कर दे तब भी आपके पास जवाबी परमाणु हमला करने की क्षमता बची रहे। आमतौर पर यह क्षमता परमाणु हथियार ले जाने वाली पनडुब्बियों और समुद्र से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिए हासिल की जाती है। क्योंकि समुद्र में मौजूद पनडुब्बियों को ढूंढना बेहद मुश्किल होता है इसलिए इन्हें परमाणु डेटरेंस का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। भारत पहले ही इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है। INS अरिहंत परमाणु पनडुब्बियां भारत की न्यूक्लियर ट्रायड रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन पाकिस्तान लंबे समय से ऐसी क्षमता हासिल करने की कोशिश के बावजूद तकनीकी रूप से पीछे रहा है।

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डिप्लोमेटिक केबल के हवाले से 2024 में भी ड्रॉप साइट ने बताया था कि पाकिस्तान ने बीजिंग को निजी तौर पर यह आश्वासन दिया था कि वह चीन को ग्वादर स्थित गहरे पानी के बंदरगाह को एक स्थायी चीनी सैन्य ठिकाने में बदलने की अनुमति देगा। यह बीजिंग की एक लंबे समय से चली आ रही महत्वाकांक्षा थी जिसे पाकिस्तान एक दशक से भी अधिक समय से अस्वीकार करता आ रहा था। बदले में पाकिस्तान ने अमेरिकी दबाव से सुरक्षा, सैन्य आधुनिकीकरण और परमाणु क्षमता में सहयोग मांगा। अगर ऐसा समझौता हो जाता तो भारत के लिए अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति काफी जटिल हो सकती थी।

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