सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की नाबालिग के लगभग 30 सप्ताह के गर्भ के मेडिकल टर्मिनेशन के आदेश में बदलाव से मना कर दिया है. कोर्ट ने 24 अप्रैल को यह आदेश दिया था. 29 अप्रैल को इस बारे में एम्स, दिल्ली की पुनर्विचार याचिका खारिज की थी. अब केंद्र सरकार की तरफ से दाखिल क्यूरेटिव याचिका पर भी अपने आदेश को बदलने से मना कर दिया है.

सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी पेश हुईं. उनके साथ ही एम्स के 2 वरिष्ठ डॉक्टर भी कोर्ट में आए. तीनों ने इसे जच्चा और बच्चा, दोनों के लिए नुकसानदेह बताया. डॉक्टरों ने कहा कि गर्भ के इतना आगे पहुंच जाने के बाद अब बच्चे को बाहर निकालना सही नहीं है. अब निकाला गया तो बच्चा जीवित रहेगा, लेकिन वह लंबे समय तक या संभवतः जीवन भर शारिरिक और मानसिक स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करेगा.
सुप्रीम कोर्ट में यह दलील भी रखी गई कि इस तरह से गर्भपात की कोशिश से यह आशंका है कि लड़की जीवन भर गर्भ धारण न कर सके. इस पर चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, ‘आप एक परिवार की तरफ से फैसला नहीं ले सकते. आप जो भी कह रहे हैं, वह लड़की और उसके माता-पिता को समझाइए. अगर वह सहमत न हों, तो हमारे आदेश का पालन करते हुए मेडिकल प्रक्रिया को पूरा कीजिए.’





