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बच्चे के साथ अपनी सेहत का भी रखें ख्याल! डिलीवरी के बाद शुरुआती 6 हफ्तों में शरीर को मजबूत बनाएंगे ये नुस्खे

Post Pregnancy Care Tips: एक नन्हे मेहमान के घर आने की खुशी जितनी बड़ी होती है उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी नई मां के स्वास्थ्य की भी होती है। डिलीवरी के बाद के शुरुआती 6 हफ्तों यानी करीब 42 दिनों को सूतिका काल कहा गया है। यह वह समय है जब महिला का शरीर अपने दूसरे जन्म की प्रक्रिया से गुजर रहा होता है। जानकारों का मानना है कि इस अवधि में की गई मामूली सी लापरवाही भी महिला को भविष्य में पुरानी बीमारियों और शारीरिक कमजोरी का शिकार बना सकती है।

बच्चे के साथ अपनी सेहत का भी रखें ख्याल! डिलीवरी के बाद शुरुआती 6 हफ्तों में शरीर को मजबूत बनाएंगे ये नुस्खे
बच्चे के साथ अपनी सेहत का भी रखें ख्याल! डिलीवरी के बाद शुरुआती 6 हफ्तों में शरीर को मजबूत बनाएंगे ये नुस्खे

क्यों नाजुक हैं ये 6 हफ्ते

महिला के शरीर से भारी मात्रा में ऊर्जा और रक्त की हानि होती है। इस समय शरीर में वात दोष काफी बढ़ जाता है जो जोड़ों में दर्द, थकान, पाचन की कमजोरी और मानसिक बेचैनी का मुख्य कारण बनता है। यह 6 हफ्ते वह रिकवरी विंडो हैं जिसमें गर्भाशय अपने पुराने आकार में लौटता है और शरीर के अंग दोबारा अपनी जगह व्यवस्थित होते हैं।

मालिश और सिकाई

सूतिका काल में आयुर्वेदिक तेलों से मालिश को अनिवार्य माना गया है। गुनगुने तेल की मालिश न केवल रक्त संचार को बेहतर करती है बल्कि बढ़े हुए वात को भी शांत करती है। यह मांसपेशियों के दर्द को दूर करने और तनाव कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है। मालिश के बाद हल्की सिकाई गर्भाशय की सफाई और रिकवरी में तेजी लाती है।

कैसा होना चाहिए आहार

  • इस दौरान मां का पाचन तंत्र बेहद कमजोर होता है इसलिए आहार का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।
  • दलिया, मूंग दाल की खिचड़ी और ताजी सब्जियों का सूप सबसे बेहतर है।
  • जीरा, अजवाइन, सोंठ और हल्दी का सीमित मात्रा में उपयोग पाचन सुधारने और गर्भाशय के संकुचन में मदद करता है।
  • डिलीवरी के बाद कम से कम 40 दिनों तक ठंडा पानी, बासी खाना, अधिक मिर्च-मसाले और गैस बनाने वाली चीजों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए।

स्तनपान और मानसिक स्वास्थ्य

के लिए मां का पहला गाढ़ा दूध अमृत के समान है। यह न केवल बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है बल्कि मां और बच्चे के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी पैदा करता है। आयुर्वेद यह भी सलाह देता है कि इस दौरान मां को मानसिक तनाव और शोर-शराबे से दूर रहना चाहिए क्योंकि मां की मानसिक स्थिति का सीधा असर दूध की गुणवत्ता और बच्चे के स्वभाव पर पड़ता है।

संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता सर्वोपरि है। नीम के पानी से स्नान और हर्बल धुएं का उपयोग आयुर्वेद में वातावरण और शरीर को शुद्ध करने के लिए बताया गया है। यदि परिवार का सहयोग और सही आयुर्वेदिक नियमों का पालन मिले तो मां बहुत जल्दी अपनी खोई हुई ऊर्जा वापस पा सकती है।

khabarmonkey@gmail.com

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