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नेताजी को 'राष्ट्र पुत्र' घोषित करवाने तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा याचिकाकर्ता! भविष्य में याचिका दाखिल करने पर लगी रोक

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर बार-बार एक ही जैसी याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि भविष्य में इस याचिकाकर्ता की कोई पीआईएल स्वीकार न की जाए. कोर्ट ने जिस याचिका पर यह सख्त आदेश दिया है उसमें नेताजी को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने, और उनके संघर्ष को आजादी का मुख्य कारण मानने जैसी कई मांगें की गई थीं.

नेताजी को 'राष्ट्र पुत्र' घोषित करवाने तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा याचिकाकर्ता! भविष्य में याचिका दाखिल करने पर लगी रोक
नेताजी को 'राष्ट्र पुत्र' घोषित करवाने तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा याचिकाकर्ता! भविष्य में याचिका दाखिल करने पर लगी रोक

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता ने पिनाक पाणि मोहंती ने पहले भी 2 बार मिलती-जुलती याचिका दाखिल की थी. उनकी एक याचिका का निपटारा 6 जनवरी 2024 को किया गया था. दूसरी याचिका भी उसी साल 18 नवंबर को सुनी गई थी. इन याचिकाओं में नेताजी की मृत्यु की नए सिरे से जांच, उन्हें और आज़ाद हिंद फौज को भारत की स्वतंत्रता का श्रेय देने और उन्हें ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने जैसी मांग थी.

सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को मोहंती की नई याचिका चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच के सामने सुनवाई के लिए लगी. अपने मामले की पैरवी करने के लिए खुद पेश हुए मोहंती को जजों ने आड़े हाथों लिया. चीफ जस्टिस ने कहा कि वह इस याचिकाकर्ता का सुप्रीम कोर्ट आना बंद करवा देंगे. इस पर मोहंती ने खुद को गंभीर याचिकाकर्ता बताते हुए एक मामले का जिक्र किया जिसमें उनकी याचिका पर हजारों निवेशकों के पैसे लौटाने का आदेश हुआ था.

इसके बाद चीफ जस्टिस ने उनसे पूछा कि उन्होंने यह याचिका किस वकील से तैयार करवाई है. ओडिशा के कटक के रहने वाले मोहंती ने वहां के एक वकील का नाम लिया. इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा, ‘क्या आपने उन्हें बताया कि आप पहले भी 2 बार इसी तरह की याचिका दाखिल कर चुके हैं?’ मोहंती ने जवाब दिया कि यह याचिका अलग है. इसमें पहले से अलग मांग की गई है.

जज मोहंती के जवाब से संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य किसी भी तरह से प्रचार हासिल करना लगता है. कोर्ट ने सख्त रवैया दिखाते हुए न सिर्फ याचिका खारिज की, बल्कि रजिस्ट्री से कहा कि वह इस याचिकाकर्ता की किसी जनहित याचिका को स्वीकार न करे.

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