भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को जोरदार तेजी देखने को मिली, जिसमें सेंसेक्स और निफ्टी लगभग 2% उछल गए. अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स की बढ़त , कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अन्य सकारात्मक संकेतों ने दलाल स्ट्रीट पर तेजी का नया दौर शुरू कर दिया, जिससे इस हफ्ते बाजार की रिकवरी का सिलसिला और आगे बढ़ गया.

सेंसेक्स करीब 1,700 अंक से ज्यादा उछलकर 79,000 अंकों के लेवल को पार कर गया है. जबकि निफ्टी 50 में करीब 500 अंकों का उछाल देखने को मिला है. जिसकी वजह से निफ्टी एक बार फिर से से ज्यादा की तेजी आई और यह 24,442 के स्तर को पार कर गया. इस भारी तेजी से BSE पर लिस्टेड सभी कंपनियों के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन में 8 लाख करोड़ रुपए का इजाफा हुआ, जिससे यह बढ़कर 501 लाख करोड़ रुपए हो गया.
सेंसेक्स में इंडिगो के शेयरों में 6% से ज्यादा की उछाल आई, जो सबसे आगे रहे. इसके अलावा मारुति सुजुकी, एशियन पेंट्स, बजाज फाइनेंस, M&M, L&T, अल्ट्राटेक सीमेंट, HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, बजाज फिनसर्व, ICICI बैंक, TCS, इंफोसिस और HCL टेक्नोलॉजीज के शेयरों में 24% की तेजी दर्ज की गई.
ब्रॉडर मार्केट में भी तेजी रही, जहां निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स 1.5% तक उछल गए. इसी दौरान, बाजार में उतारचढ़ाव को मापने वाला इंडिया VIX 2.5% गिरकर 15 के स्तर से नीचे आ गया.
सेक्टरल इंडेक्स की बात करें तो, निफ्टी ऑटो, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज और निफ्टी रियल्टी में 2% से ज्यादा की तेजी आई, जबकि निफ्टी फार्मा लाल निशान में बंद हुआ. बाजार का कुल रुझान तेजी के पक्ष में रहा; NSE पर 2,468 शेयरों में तेजी आई, जबकि 313 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. वहीं, 55 शेयरों की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ.
तेल की कीमतें 95 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आईं
दलाल स्ट्रीट पर चल रही तेजी को और बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारण शायद कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट है. कई हफ्तों के बाद, कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गईं और फिर और गिरते हुए 95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी तोड़ दिया. गुरुवार सुबह ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 94 डॉलर प्रति बैरल के नीचे और WTI क्रूड फ्यूचर्स 87 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहे थे. पिछले दिन के मुकाबले तेल की कीमतों में लगभग 10% की गिरावट आई है.
खत्म हो सकता है मिडिल ईस्ट वॉर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस के दोनों सदनों सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर अपना नियंत्रण खो बैठी है. यह सब तब हुआ जब ईरान में युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ गईं, जिससे अमेरिकी लोगों की जेब पर भारी असर पड़ने लगा. चुनाव में हार के बाद एक लंबी पोस्ट में, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माना कि युद्ध और अमेरिकाइजरायल संबंधों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी के कारण रिपब्लिकन पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा. वहीं, सीनेट में अल्पसंख्यक नेता और डेमोक्रेट चक शूमर ने जल्द ही इस युद्ध को खत्म करने का वादा किया.
इससे मध्यपूर्व संघर्ष के खत्म होने की उम्मीदें फिर से जाग गई हैं. यह संघर्ष इस साल फरवरी के आखिर में तब शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए थे. इन हमलों में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता मारे गए थे, जिसके बाद तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और वैश्विक शेयर बाजारों में खलबली मच गई थी.
बॉन्ड यील्ड में गिरावट
तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बाद बॉन्ड यील्ड भी गिर गई है. 30 साल के अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स पर यील्ड गिरकर 5.2% हो गई, जबकि बेंचमार्क 10 साल के नोट्स पर यह 4.8% पर आ गई. 2 साल के अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड, जो फेड के ब्याज दरों से जुड़े फैसलों की उम्मीदों के साथ बदलती है, वह भी घटकर 4.5% रह गई.
बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड की कीमतें एकदूसरे के विपरीत चलती हैं. तेल की कीमतों में कमी आने से निवेशकों ने बॉन्ड खरीदना शुरू कर दिया, जिससे बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई. बॉन्ड यील्ड का गिरना आमतौर पर शेयर बाजार के लिए सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि इससे निवेशकों के लिए डेट मार्केट की तुलना में अधिक जोखिम वाले, लेकिन ज्यादा रिटर्न देने वाले शेयर अधिक आकर्षक हो जाते हैं.
रुपया 2 हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंचा
रुपया दो हफ्ते के उच्चतम स्तर पर खुला. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इसमें 0.3% की तेजी आई और यह 94.35 के स्तर पर पहुंच गया. ऐसा तेल की कीमतों में गिरावट के कारण हुआ. LKP सिक्योरिटीज में कमोडिटी और करेंसी के VP रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी ने कहा कि आगे चलकर, विदेशी फंड का लगातार आना और डॉलर का कमजोर बने रहना रुपए को और सहारा दे सकता है, जिससे 94.50 के स्तर की ओर इसका आउटलुक सकारात्मक बना रह सकता है.
ट्रंप के टैरिफ संबंधी रुख को लेकर चिंताएं कम हुईं
कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की शानदार जीत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अक्सर मनमाने फैसलों पर लगाम लगने की उम्मीदें जगा दी हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की हार से, वाशिंगटन के साथ एक संतुलित व्यापार समझौते की बातचीत में नई दिल्ली पर दबाव काफी कम हो सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को लगे इस झटके—जिसमें डेमोक्रेट्स ने हाउस और सीनेट दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है—से आगे चलकर टैरिफ और बाजार तक पहुंच के मुद्दों पर अधिक स्पष्टता मिल सकती है. इससे अमेरिका को होने वाले भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलने में मदद मिल सकती है.