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प्यार, बगावत, गिरफ्तारी…मस्तानी से इश्क की क्या कीमत चुकाई पेशवा बाजीराव ने?​

ये इश्क़ नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. लेकिन आशिक कीमत की कहां परवाह करते हैं! इश्क में सबकुछ दांव पर लगा देने के तमाम किस्से इतिहास का हिस्सा हैं. मराठा साम्राज्य के सबसे ताकतवर पेशवा की कहानी उनमें शामिल है. मस्तानी की दीवानगी में […]

ये इश्क़ नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. लेकिन आशिक कीमत की कहां परवाह करते हैं! इश्क में सबकुछ दांव पर लगा देने के तमाम किस्से इतिहास का हिस्सा हैं. मराठा साम्राज्य के सबसे ताकतवर पेशवा की कहानी उनमें शामिल है. मस्तानी की दीवानगी में पेशवा के अपने बेगाने हो गए. पुरोहितों ने विरोध किया. दरबारियों ने नाराजगी जताई. मां और भाई सब रिश्ते के खिलाफ थे. लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. बाजीराव बल्लाल कोई मामूली सरदार नहीं थे. ऐसे सेनानायक, जिन्होंने अपनी तलवार के दम पर मुगलों की नींद उड़ा रखी थी. जिनके घोड़े की टाप सुन बड़ेबड़े सूबेदार रास्ता बदल लेते थे.

कहा जाता है कि पेशवा ने अपने सैन्य जीवन में एक भी बड़ी लड़ाई नहीं हारी. लेकिन इस अजेय योद्धा के सामने एक ऐसी चुनौती आई, जिससे वे जिंदगी भर जूझता रहे. चुनौती थी मस्तानी. एक तरफ मस्तानी का प्यार था. दूसरी तरफ सामने खिलाफ खड़ा पुणे का पेशवा परिवार था. मस्तानी को अलग महल में रखना पड़ा. उसके आनेजाने पर पाबंदियां लगीं. यहां तक कि एक वक्त ऐसा भी आया, जब बाजीराव की गैरमौजूदगी में उसे कैद कर लिया गया. दिलचस्प यह कि यह प्रेम कहानी महल में रागरंग में डूबे किसी शहजादे और अपनी अदाओं का जादू बिखेरती नर्तकी के बीच की नहीं है. यह उपजी एक युद्ध की जीत के बीच.

उस युद्ध की जीत से मस्तानी मिली

बुंदेलखंड में दोनों की पहली मुलाकात हुई. बुंदेलखंड के राजा थे महाराजा छत्रसाल. मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के इलाहाबाद के सूबेदार मुहम्मद खान बंगश ने उनके राज्य पर हमला कर दिया. छत्रसाल बूढ़े हो चुके थे. बंगश की सेना भारी पड़ रही थी. राजा ने कई जगह से मदद मांगी. आखिरी दस्तक मराठा पेशवा बाजीराव को दी. 28 साल के बाजीराव उस समय तक युद्ध के मैदान में अपनी धाक जमा चुके थे.

बाजीराव मदद के लिए राजी हुए. अपनी सेना साथ बुंदेलखंड पहुंचे. बंगश की फौज को घेर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. छत्रसाल का राज्य बच गया. बूढ़े राजा के लिए यह किसी नई जिंदगी से कम नहीं था. अब छत्रसाल की बारी थी बाजीराव का अहसान चुकाने की. छत्रसाल ने बुंदेलखंड के बड़े हिस्से की कमाई के अधिकार बाजीराव को सौंप दिए. लेकिन एक और चीज सौंपी. इसने बाजीराव के दिलदिमाग में हलचल मचा दी. पर आगे परिवारसाम्राज्य में तूफान भी खड़ा कर दिया.

मस्तानी. फोटो: AI Generated

कौन थी मस्तानी?

मस्तानी को छत्रसाल की बेटी बताया जाता है. मां का नाम रूहानी बाई था. रूहानी फारसीमुस्लिम मूल की थी. हालांकि मस्तानी के जन्म और पारिवारिक परिचय को लेकर इतिहासकार एकराय नहीं हैं. छत्रसाल ने मस्तानी का विवाह बाजीराव से कर दिया. एक युद्ध से शुरू हुआ रिश्ता धीरेधीरे प्रेम कहानी में बदल गया. सिर्फ खूबसूरती में मस्तानी बेमिसाल नहीं थी. वह घुड़सवारी जानती थी. हथियार चलाने में माहिर थी. संगीत और नृत्य में निपुण थी. दरबारी तौरतरीकों से वाकिफ़ थी. बुंदेलखंड के राजपरिवार में पलीबढ़ी, मस्तानी की शख्सियत खूबियों का खजाना थी. उधर बाजीराव भी संगीत और कला के शौकीन थे. पहली ही नजर में बाजीराव पर मस्तानी का जादू चढ़ गया.

पेशवा के रूढ़िवादी परिवार ने मस्तानी को नहीं किया स्वीकार

बाजीराव शादीशुदा थे. पत्नी का नाम काशीबाई था. परिवार में मां राधाबाई और भाई चिमाजी अप्पा का खास प्रभाव था. पेशवा परिवार चितपावन ब्राह्मण परंपरा का था. वहां जाति और धार्मिक रीतिरिवाजों के बंधन बहुत कठोर थे. ऐसे परिवार के लिए मस्तानी को कुबूल करना आसान नहीं था. उसकी मां मुस्लिम पृष्ठभूमि से थीं. वैसे मस्तानी की धार्मिक पहचान को लेकर भी अलगअलग जानकारियां मिलती हैं. कुछ में उसे मुस्लिम बताया गया, तो कुछ में प्रणामी संप्रदाय से जुड़ा माना गया.

प्रणामी परंपरा में हिंदू और इस्लामी विचारों का मेल दिखाई देता है. लेकिन पुणे के रूढ़िवादी समाज के लिए ये बारीकियां कोई मायने नहीं रखती थीं. यह मंजूर नहीं था कि पेशवा किसी ऐसी महिला को पत्नी का दर्जा दें, जिसे समाज अपने दायरे से बाहर मानता था.

पेशवा बाजीराव. फोटो: AI Generated

फिर मच गया हंगामा

मस्तानी जब पुणे पहुंचीं तो उसका स्वागत किसी पेशवा की पत्नी की तरह नहीं हुआ. वहां बाजीराव का विशाल शनिवारवाड़ा था. मराठा सत्ता का केंद्र. वहीं से मराठा राज के फैसले होते थे. बड़ेबड़े सरदार पेशवा से मिलने आते थे.लेकिन मस्तानी को वहां रहने की जगह नहीं मिली. परिवार के जबरदस्त विरोध के चलते पेशवा को शनिवारवाड़ा से अलग मस्तानी के रहने की व्यवस्था करनी पड़ी. बाद में बाजीराव ने पुणे के कोथरुड में उसके लिए अलग महल बनवाया. जिस पेशवा का मराठा साम्राज्य में हुक्म चलता था, वहां उसकी पत्नी मस्तानी, परिवार से पूरी तौर पर अलगथलग रहने को मजबूर थी.

विरोध बीच भी बाजीराव ने साथ नहीं छोड़ा

पेशवा बाजीराव खामोश क्यों रहे? जिस मस्तानी के लिए उनके मन में बेपनाह मोहब्बत थी, उसका तिरस्कार क्यों स्वीकार किया? असलियत में इसकी राजनीतिक वजहें भी थीं. पहली पत्नी काशीबाई प्रभावशाली मराठा परिवार की थी. पेशवा की सत्ता मराठा सरदारों और दरबारियों के समर्थन पर टिकी थी. विवाद बढ़ने पर ऐसे सरदारों के समर्थन खो देने के खतरे से बचने के लिए बाजीराव ने न चाहते हुए भी बहुत कुछ बर्दाश्त किया. हालांकि इन मजबूरियों बीच बाजीराव ने मस्तानी का साथ नहीं छोड़ा. मां, भाई और पुरोहित सब खिलाफ थे.बाजीराव के लिए बाहर से ज्यादा मुश्किल घर के भीतर से थी. मां राधाबाई इस रिश्ते को पसंद नहीं करती थीं. भाई चिमाजी अप्पा भी मस्तानी के खिलाफ थे. दरबार के रूढ़िवादी ब्राह्मणों को भी यह रिश्ता अस्वीकार था. पेशवा का खानपान विवाद का विषय बन गया. मांस और मदिरा के सेवन को लेकर भी उनकी आलोचना होने लगी.

प्यार साथ मराठा राज की चिंता

मस्तानी को लेकर बाजीराव पर कई तरह के आरोप लगाए गए. कुछ ने समझाने की कोशिश की. कुछ ने दबाव बनाया. लेकिन बाजीराव ने मस्तानी को छोड़ने से इनकार कर दिया. बाजीराव सिर्फ प्रेमिका के लिए परिवार से लड़ नहीं रहे थे. वह अपने निजी जीवन के फैसले पर परिवार और समाज का नियंत्रण भी स्वीकार नहीं कर रहे थे. उनकी मुश्किल यह थी कि एक तरफ मराठा साम्राज्य के पेशवा के तौर पर साम्राज्य के विस्तार और उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी. दूसरी तरफ परंपराओं के नाम पर मस्तानी के प्यार को छोड़ देने के परिवार और रूढ़िवादी समर्थकों के दबाव का मुकाबला करना था. वक्त बीतने के साथ तनाव घटने की जगह बढ़ता चला गया. इस कहानी में बड़ा नाटकीय मोड़ मस्तानी की गिरफ्तारी थी.

युद्ध में पेशवा, परिवार ने मस्तानी को बनाया बंदी

बाजीराव उन दिनों किसी युद्ध में पुणे से दूर थे. परिवार के लोगों ने मस्तानी को कैद कर लिया.यह बाजीराव के लिए गहरा सदमा था. उन्होंने. मस्तानी को छुड़ाने की कोशिश की. उनके पत्रों और इस घटना से जुड़े ब्यौरों में उनकी बेचैनी झलकती है. पुणे में मौजूद अपने भरोसे के सरदारों को उन्होंने मस्तानी को मुक्त कराने का संदेश दिया.

मस्तानी को लेकर परिवार का गुस्सा सिर्फ निजी नाराजगी तक सीमित नहीं रह गया था. गिरफ्तारी का सीधा मतलब पेशवा की सत्ता को चुनौती था.हालांकि इस बात के पुख्ता सबूत नहीं हैं कि परिवार, मस्तानी को मार देना चाहता था. लेकिन कुछ स्त्रोत ऐसा ही बताते हैं. कुल मिलाकर इतना साफ है कि पुणे पहुंचने के बाद मस्तानी की जिंदगी कभी आसान नहीं रही.

सौत का बेटा काशीबाई की गोद में!

बाजीराव और मस्तानी के रिश्ते से एक बेटा पैदा हुआ. नाम रखा गया कृष्णराव. लेकिन पेशवा परिवार में उसे सहज स्वीकार नहीं किया गया. मस्तानी की धार्मिक पृष्ठभूमि को पेशवा परिवार भूलने को तैयार नहीं था. आगे चलकर कृष्णराव को शमशेर बहादुर के नाम से जाना गया. उसने बड़े होकर मराठा सेना में अपनी जगह बनाई. एक बहादुर सेनानायक बना. उसके वंशजों ने बांदा में अपना प्रभावशाली राजनीतिक ठिकाना बनाया. यानी बाजीराव और मस्तानी का रिश्ता सिर्फ एक प्रेम कहानी बनकर नहीं रह गया. उसने मराठा इतिहास में एक अलग वंश की नींव भी रखी. इस कहानी में एक दिलचस्प पहलू बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई का है. उन्हें सौत मस्तानी की वजह से सबसे ज्यादा दुख झेलना पड़ा. लेकिन उन्होंने मस्तानी की कोख से जन्मे शमशेर बहादुर पर प्यार लुटाया. परवरिश में मदद की. इसी का नतीजा था कि आगे दोनों परिवारों के बीच संबंध बने रहे.

अजेय बाजीराव, बीमारी से हारा

1740 में बाजीराव अपनी सेना के साथ उत्तर भारत के अभियान पर थे. नर्मदा नदी के किनारे रावेरखेड़ी में डेरा डाले हुए थे. तब उम्र महज 39 साल की थी. एक ऐसा योद्धा जिसने लगातार युद्धों में मराठा साम्राज्य का विस्तार किया था, अचानक बीमार पड़ गया. बीमारी ने उन्हें संभलने का मौका नहीं दिया.

28 अप्रैल 1740 को बाजीराव की मृत्यु हो गई. यह खबर पुणे पहुंची तो मस्तानी पर क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. कुछ समय बाद मस्तानी की भी मृत्यु हो गई. मस्तानी की मौत कैसे हुई? अलगअलग वजहें बताई जाती हैं. कहीं जहर देने की कहानी है. कहीं बाजीराव के मौत के सदमे का जिक्र है. आत्महत्या की बात भी बताई गई. मौत की वजह पर भले विवाद हो लेकिन यह तय है कि बाजीराव के मरने के थोड़े समय के भीतर 1740 में ही मस्तानी की भी मृत्यु हुई थी. बाजीराव की चिता के साथ मस्तानी के सती होने की लोकप्रिय कहानी भी सुनाई जाती है. मगर इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है.

मस्तानी आज भी यादों में

पुणे का शनिवारवाड़ा आज भी खड़ा है. हालांकि 1828 की भीषण आग ने उसके बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया था. कभी यह मराठा साम्राज्य की सत्ता का केंद्र था. यहीं बाजीराव का दरबार लगता था. कभी यहां मस्तानी के अलग रहने का इंतजाम हुआ था. कोथरुड का मस्तानी महल भी उसकी याद से जुड़ा है. अब उसका बहुत कम हिस्सा बचा है. बाजीराव की पहचान सिर्फ मस्तानी के प्रेमी के रूप में नहीं थी. वह भारतीय इतिहास के सबसे सफल सेनानायकों में गिने जाते हैं. उन्होंने मुगल सत्ता को लगातार चुनौती दी. दिल्ली तक मराठा सेना की पहुंच बना दी. हालांकि उनकी जिंदगी के एक बड़े हिस्से का जिक्र मस्तानी के लिए उनके प्यार के नाते किया जाता है.

इस प्रेम कहानी ने मराठी रंगमंच से लेकर उपन्यासों तक लंबा सफर तय किया. 1892 में एन. बी. कानिटकर के नाटक बाजीरावमस्तानी ने इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई. बाद में उपन्यासों, नाटकों और फिल्मों ने इस कहानी में कई नए रंग जोड़े. 2015 में संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी ने इस कहानी को फिर पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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