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कपड़े के एक्सपोर्ट में चीन के बाद सबसे आगे है बांग्लादेश, फिर क्यों नहीं बढ़ पा रही वर्करों की सैलरी?​

बांग्लादेश में फिर एक बार लोग सड़कों पर उतर गए हैं. इससे पहले जब 2024 में जनता सड़क पर आई थी, तब उस समय की प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपनी कुर्सी छोड़ भारत आना पड़ा था. अब देश के वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते रविवार को कपड़े की फैक्ट्रियों […]

बांग्लादेश में फिर एक बार लोग सड़कों पर उतर गए हैं. इससे पहले जब 2024 में जनता सड़क पर आई थी, तब उस समय की प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपनी कुर्सी छोड़ भारत आना पड़ा था. अब देश के वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते रविवार को कपड़े की फैक्ट्रियों में काम करने वाले करीब 10 लाख मजदूरों ने प्रदर्शन किया, जिसके चलते देश की करीब 600 फैक्ट्रियां बंद रहीं.

अब प्रधानमंत्री ताहिर की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. सत्ता पक्ष का आरोप है मजदूरों की घेराबंदी के पीछे आवामी लीग का हाथ है, क्योंकि उसकी पकड़ मजदरों पर ज्यादा मानी जाती है. इन सभी कयासों के बीच में जो बात निकलकर आ रही है वह यही है कि बांग्लादेश चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा गारमेंट एक्सपोर्ट करने वाला देश है. वहां की इकोनॉमी में इस इंडस्ट्री की भूमिका सबसे बड़ी मानी है, तो इतना बड़ा बिजनेस होने के बावजूद देश अपने वर्कर्स की सैलरी आखिर क्यों नहीं बढ़ा पा रहा है, जिनकी उनकी अर्थव्यवस्था चल रही है.

कितनी बड़ी है इंडस्ट्री

कितना बड़ा है बांग्लादेश का गारमेंट कारोबार

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री की अहम भूमिका है. देश में करीब 4,000 रजिस्टर्ड कपड़ा फैक्ट्रियां हैं, जिनमें 40 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं. यहां तैयार होने वाले कपड़े दुनिया के करीब 150 देशों में भेजे जाते हैं. कई अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांड्स भी अपने कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग बांग्लादेश में कराते हैं. वर्ष 202526 में इस सेक्टर से करीब 3,870 करोड़ डॉलर का एक्सपोर्ट हुआ.

देश के कुल निर्यात में इस इंडस्ट्री की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है. इसका सालाना कारोबार करीब 10 लाख करोड़ रुपये का है. खास बात यह है कि इस उद्योग में काम करने वाली बड़ी आबादी महिलाओं की है. इतने बड़े कारोबार और लाखों लोगों को रोजगार देने के बावजूद यहां काम करने वाले मजदूरों की आमदनी में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पाई है.

क्यों नहीं बढ़ रही है मजदूरों की सैलरी?

  1. महंगाई के मुकाबले बहुत कम है मजदूरी बांग्लादेश में कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 टका है. भारतीय रुपये में यह करीब 8,800 से 9,500 रुपये के आसपास बैठता है. मजदूरों का कहना है कि मौजूदा कमाई में घर का किराया, राशन, बिजली और दूसरी जरूरी जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है. यही वजह है कि मजदूर न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर 30,000 टका यानी करीब 23 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में रोजमर्रा की चीजें महंगी हुई हैं, लेकिन उनकी कमाई उस रफ्तार से नहीं बढ़ी. ऐसे में मौजूदा वेतन पर परिवार का खर्च चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
  2. फैक्ट्री मालिकों के सामने भी लागत का दबाव मजदूरों की वेतन बढ़ाने की मांग और फैक्ट्री मालिकों की आर्थिक स्थिति के बीच टकराव बना हुआ है. बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन जैसे उद्योग संगठनों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपड़ों की कीमतों को लेकर काफी प्रतिस्पर्धा है. दूसरी ओर, कच्चे माल, बिजली, गैस और उत्पादन से जुड़े दूसरे खर्च लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए मजदूरी में एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी करना आसान नहीं है. मालिकों का मानना है कि अगर उत्पादन की लागत बढ़ती है तो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के सामने उनकी प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है.
  3. बिजली और गैस की महंगी सप्लाई से घट रहा मुनाफा गारमेंट इंडस्ट्री में उत्पादन लगातार चलाने के लिए बिजली और गैस की नियमित सप्लाई जरूरी होती है. लेकिन बांग्लादेश में ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं. ईंधन की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतारचढ़ाव और आयात पर निर्भरता का असर भी उद्योग पर पड़ता है. बिजली और गैस की लागत बढ़ने से फैक्ट्रियों का ऑपरेशन महंगा होता है. इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है. ऐसे हालात में फैक्ट्री मालिक मजदूरों की सैलरी बढ़ाने के बजाय पहले उत्पादन लागत और कारोबार को संभालने पर जोर दे रहे हैं.

राजनीतिक अस्थिरता ने कारोबार की मुश्किलें बढ़ाईं

बांग्लादेश में 2024 के सत्ता परिवर्तन के बाद से राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता का असर कारोबार पर भी पड़ा है. अलगअलग मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन, फैक्ट्रियों का बंद होना और सप्लाई में रुकावट जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं. गारमेंट इंडस्ट्री का कारोबार बड़े पैमाने पर विदेशी खरीदारों और समय पर होने वाली डिलीवरी पर निर्भर करता है. ऐसे में फैक्ट्रियों के बंद रहने या उत्पादन प्रभावित होने से ऑर्डर पूरे करने में दिक्कत आती है. इससे कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है और मजदूरी बढ़ाने का मुद्दा और जटिल हो जाता है.

वेतन तय करने की प्रक्रिया पर भी उठ रहे सवाल

बांग्लादेश में कपड़ा मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए सरकार की ओर से वेज बोर्ड बनाया जाता है. इस बोर्ड में मजदूरों, फैक्ट्री मालिकों और सरकार से जुड़े प्रतिनिधियों की भूमिका होती है. हालांकि, मजदूर संगठनों का आरोप है कि वेतन की समीक्षा समय पर नहीं होती और बढ़ोतरी भी उनकी जरूरतों के मुताबिक नहीं की जाती. उनका कहना है कि महंगाई और काम के बढ़ते दबाव को ध्यान में रखकर मजदूरी तय होनी चाहिए. वहीं, उद्योग जगत उत्पादन लागत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को आधार बनाकर वेतन बढ़ाने में सावधानी बरतने की बात करता है. यही खींचतान मजदूरों की मांग और फैक्ट्री मालिकों की सहमति के बीच बड़ा अंतर पैदा कर रही है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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