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सड़क पर लड़ाई, 2027 की परीक्षा… रामलीला मैदान की रैली से कांग्रेस को क्या हासिल हुआ?​

हर आंदोलन के हासिल पर सवाल होता है. रामलीला की रैली के बाद भी यही सवाल है. बेशक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश गुप्त पर हमले हो रहे हैं. पर निशाने पर तो मोदी सरकार है. ये राजनीतिक लड़ाई है. दिल्ली में राहुल गांधी की अगुवाई में अन्य विपक्षी दल उनके साथ हैं. जाहिर है कि […]

हर आंदोलन के हासिल पर सवाल होता है. रामलीला की रैली के बाद भी यही सवाल है. बेशक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश गुप्त पर हमले हो रहे हैं. पर निशाने पर तो मोदी सरकार है. ये राजनीतिक लड़ाई है. दिल्ली में राहुल गांधी की अगुवाई में अन्य विपक्षी दल उनके साथ हैं. जाहिर है कि जमीन पर कांग्रेस के हिस्से क्या आया, इसका हिसाब होगा. आक्रामक मुद्रा में राहुल दोहरा रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार को जेल जाना होगा. सवाल है कि क्या ज्ञानेश का इस्तीफा भी मुमकिन होगा? मॉक संसद में उन्होंने सीधे तौर पर 2024 के पूरे चुनाव को अवैध बता दिया. क्या इससे सरकार की सेहत पर कोई असर पड़ेगा? अभी 2029 का लोकसभा चुनाव दूर है. लेकिन 2027 में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं. उनमें भी देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के चुनाव, जहां से राहुल संसद में पहुंचे हैं, सबसे अहम हैं. वहां कांग्रेस आखिरी बार 1984 में जीती थी.

क्या दिल्ली में राहुल की सक्रियता उत्तर प्रदेश में निस्तेज पड़ी कांग्रेस को कुछ ऑक्सीज़न देगी? पार्टी की उम्मीदें सपा से गठबंधन पर टिकी हैं. दिल्ली में विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन में राहुल के साथ खड़े अखिलेश यादव क्या यह मानेंगे कि इस आंदोलन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मजबूती दी है और गठबंधन की हालत में कांग्रेस को उसकी मुराद माफिक लड़ने के लिए सीटें देंगे?

आगे की लड़ाई

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को जेल भेजने की बात कही है. लेकिन फिलहाल तो उनका इस्तीफा ही विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है. असलियत में उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाना भी आसान नहीं है. राहुल की इच्छा कैसे पूरी हो सकती है? आंदोलन से घबरा कर ज्ञानेश इस्तीफा दे दें.

दूसरा, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया से संसद द्वारा उन्हें हटाया जाए. इसके लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी है. तीसरा रास्ता, हालांकि यह दूर की कौड़ी है कि सुप्रीम कोर्ट मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और फॉर्म6 से जुड़े मामलों की सुनवाई में ज्ञानेश गुप्त की भूमिका पर ऐसे सवाल खड़े कर दे, जिससे विपक्ष को आगे लड़ने की ताकत मिल जाए. फिलहाल ये सारी संभावनाएं भविष्य के गर्भ में हैं. ऐसे में सवाल है कि राहुल और विपक्ष आगे की लड़ाई को क्या शक्ल देंगे?

CEC ज्ञानेश कुमार.

राहुल का बदलता नजरिया

चुनाव में वोटर फैसला करते हैं. चुनाव बाद चुने प्रतिनिधियों का संख्या बल पक्षविपक्ष की ताकत तय करते हैं. 2024 का चुनाव राहुल गांधी ने संविधान की हिफाजत के नाम पर लड़ा था. इस चुनाव में कांग्रेस 2019 की 52 सीटों से बढ़कर 99 पर पहुंच गई थी. भाजपा 240 पर अटक गई थी. राहुल ने इसे विपक्ष की कामयाबी बताया था. लेकिन 31 अक्टूबर को उसी चुनाव को खड़गे के आवास पर मॉक सदन में राहुल ने अवैध बता दिया. यह भी कहा था कि भाजपा के जो सदस्य लोकसभा पहुंचे, वे अवैध तरीके से निर्वाचित हुए. एक नवंबर को रामलीला मैदान की रैली में उन्होंने 2024 के चुनाव को फिर गैरकानूनी बताते हुए वोट चोरी का चुनाव बताया.

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को जेल भेजने की बात कही है.

13.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने और जीतहार के अंतर का हवाला दिया. लेकिन भाजपा सांसदों के निर्वाचन को अवैध बताने वाला साफ आरोप इस भाषण में लापता था .खड़गे के आवास पर मॉक सदन में सांसदों और चुनिंदा नागरिक समाज प्रतिनिधियों की भागीदारी थी. रामलीला मैदान में आम जनता की बड़ी मौजूदगी थी. दूर तक बात पहुंचती. लेकिन वहां इसे दोहराने की जरूरत राहुल ने क्यों नहीं समझी? राहुल हमेशा से भाजपा के निशाने पर रहे हैं. पार्टी उनकी परिपक्वता पर सवाल खड़े करने का कोई मौका नहीं छोड़ती. क्या राहुल ऐसे मौके खुद मुहैय्या नहीं करते? क्या वे इस तथ्य से अनजान हैं कि अगर 2024 का चुनाव अवैध था तो उसके जरिए निर्वाचित सभी सदस्यों का निर्वाचन अवैध होगा?

पलटवार में भाजपा भी सड़कों पर

विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी अपनी भूमिका निभा रहे हैं. सत्ता दल पर अंकुश के साथ ही अपनी पार्टी के ताकत के इजाफ़े के लिए वे सड़कों पर उतरे हुए हैं. लेकिन दूसरा पक्ष भी रक्षात्मक मुद्रा में नहीं है. राहुल की अगुवाई में विपक्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटा तो भाजपा ने भी उसी दिन अलगअलग राज्यों में सड़क पर उतरकर जवाब दिया.

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने हरियाणा के रोहतक में लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ पदयात्रा की अगुवाई की. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा शिमला में सड़क पर उतरे. दिल्ली में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 1984 के सिख नरसंहार की याद में सिख समुदाय के साथ मार्च किया. भाजपा ने विपक्ष के वोट चोरी के आरोपों के जवाब में लोकतंत्र और चुनावी संस्थाओं के बचाव को अपना मुद्दा बनाया.

भाजपा का जवाब एक दिन के शक्ति प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. पार्टी ने 30 नवंबर तक देशव्यापी अभियान की योजना बनाई है. इसमें केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता पदयात्राओं, जनसभाओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए विपक्ष के आरोपों का जवाब देंगे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई बड़े नेता अलगअलग राज्यों में कार्यक्रमों में शामिल होंगे. कांग्रेस और विपक्ष दिल्ली से देश को संदेश दे रहे हैं तो भाजपा अपने संगठन के जरिए राज्यों और जिलों तक पहुंचने की तैयारी में है. दोनों पक्षों के बीच मुकाबला सड़कों पर चल रहा है.

रामलीला मैदान में एकजुट हुए विपक्षी दल.

मछलीमछली कितना पानी!

किसकी कितनी ताकत इसका नतीजा चुनाव बताएंगे. लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं. पर 2027 के विधानसभा चुनाव की चुनौती नजदीक है. चूंकि इस आंदोलन का चेहरा राहुल बने हुए हैं, इसलिए चर्चा सबसे ज्यादा कांग्रेस के संभावित प्रदर्शन की है. क्या पंजाब में कांग्रेस की वापसी होगी? क्या पार्टी उत्तराखंड और गोवा भाजपा से छीन पाएगी? और इन सबसे बढ़कर सबसे बड़े उत्तर प्रदेश की बात जहां कांग्रेस का चार दशकों से ज्यादा वक्त से बुरा हाल है.

आखिरी बार 1985 के विधानसभा चुनाव में यहां कांग्रेस जीती थी. 2022 में प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में लड़की हूँ लड़ सकती हूँ , के स्लोगन के साथ चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस की भारी दुर्गति हुई थी. उसके 399 में सिर्फ दो उम्मीदवार जीते थे. चार दूसरे स्थान पर थे. महज छह जमानत बचा सके थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन ने कांग्रेस को राहत दी थी. 17 सीटों पर उसे लड़ने का मौका मिला था. छह ने जीत हासिल की थी.

2027 के विधानसभा चुनाव की चुनौती नजदीक है और राहुल गांधी आंदोलन का चेहरा राहुल बने हुए हैं.

उपचुनाव और विधानपरिषद चुनाव से कांग्रेस ने क्यों किया किनारा?

क्या 2024 के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने कुछ नई ताकत हासिल की? क्या राहुल की सक्रियता उसमें कुछ नया जोड़ सकी? कैसे पता लगे? 2024 के बाद प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों के उपचुनाव हुए. कांग्रेस इसे सपा के साथ गठबंधन में लड़ना चाहती थी. पांच सीटों की उसकी दावेदारी थी. सपा राजी नहीं हुई. फिर कांग्रेस ने उपचुनाव से दूर रहना बेहतर समझा.

हाल में विधान परिषद की स्नातक/शिक्षक क्षेत्र की ग्यारह सीटों का चुनाव हुआ. छह भाजपा ने और पांच सपा ने जीतीं. कांग्रेस चुनाव मैदान से दूर रही. क्यों ? जमीनी सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश में अकेले लड़ने पर कांग्रेस किसी मुकाबले में नहीं है. बेशक दिल्ली में इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की अगुवाई हो लेकिन उत्तर प्रदेश में गांधी परिवार के पारिवारिक क्षेत्र समझे जाने वाले रायबरेली और अमेठी तक में लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी , सपा के समर्थन और उसके उम्मीदवार न रहने पर ही बड़ी जीत हासिल कर पाते हैं. इन दोनों संसदीय क्षेत्र की दस विधानसभा सीटों में 2022 के विधानसभा चुनाव ने इकलौता क्षेत्र जगदीशपुर था, जहां कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे स्थान पर पहुंच सका था.

मजबूत का साथ, तो कमजोर मजबूर!

सपा और कांग्रेस दोनों ही भाजपा को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी जीत से रोकना चाहते हैं. इसके लिए जरूरी है कि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव न हो. माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर दोनों दल विधानसभा चुनाव गठबंधन में लड़ेंगे. सवाल सीटों के बंटवारे का है. कांग्रेस 175 से 200 सीटों की हिस्सेदारी चाहती है. सपा उसे साथ रखना चाहती है. लेकिन हिस्सेदारी को जीतने की क्षमता से तय करना चाहती है.

उत्तर प्रदेश में सपा काफी मजबूत स्थिति में है. कोई कमजोर जब किसी मजबूत का साथ करता है तो किसकी चलती है, यह सबको पता है. हाल में सपा नेता रामगोपाल यादव से जब सीटों के बंटवारे का सवाल हुआ था तो फैसला अखिलेश यादव पर छोड़ते हुए उन्होंने 1993 में सपाबसपा गठबंधन में सीटों के बंटवारे के लिए कांशीराम के साथ हुई बातचीत का किस्सा साझा किया. कांशीराम ने कहा था कि पिछले चुनाव में जो सीट जिस पार्टी ने जीती या फिर दूसरे स्थान पर रही हो , उसके हिस्से में कर दी जाए. संकेत में ही सही ,लेकिन इस फार्मूले से 2022 के चुनाव के नजरिए से कांग्रेस का हिस्सा छह सीटों का बनता है. दो जहां जीत मिली और चार जहां पार्टी दूसरे स्थान पर पहुंच सकी.

उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा पूरे दमखम से 2027 की चुनौती का सामना करने के लिए जमीनी तैयारियों में जुटे हुए हैं. बसपा भी सक्रिय हो गई है. और कांग्रेस? राहुलप्रियंका की सक्रियता फिलहाल दिल्ली तक सीमित है. हाल में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सपा मुखिया अखिलेश यादव से बेहतर तालमेल रखने वाले राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी की विधायक पुत्री आराधना मिश्रा को दी गई है.

कई मौकों पर सपा से तय गठबंधन की बात वे दोहरा चुकी हैं. कांग्रेस के लिए सीटों के सवाल पर उन्होंने फैसला केंद्रीय नेतृत्व पर छोड़कर किसी टकराव को टालने का रास्ता चुन रखा है. असलियत में कांग्रेस की उम्मीदें सपा से गठबंधन पर टिकी हुई हैं. अकेले 2022 के लड़ने की सीख और 2024 के गठबंधन के फायदे ने कांग्रेस के हाथ बांध रखे हैं. उत्तर प्रदेश में खोई राजनीतिक जमीन की वापसी की अब तक की उसकी कोशिशें नाकाम रही हैं. पार्टी का अपना ऐसा कोई वोट बैंक नहीं है, जिसके भरोसे वह भाजपा का अकेले मुकाबला कर सके.

ज्ञानेश विरोधी आंदोलन में राहुलअखिलेश की बेहतर केमिस्ट्री दिख रही है. लेकिन क्या दोनों के बेहतर रिश्तों का फायदा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सीटों की हिस्सेदारी में भी मिलेगा ? क्या इस आंदोलन ने कांग्रेस को कुछ नई राजनीतिक जमीन दी है? उत्तर प्रदेश के नजरिए से क्या इस पर अखिलेश भरोसा कर सकेंगे? दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान सड़कों पर लेटते जूझते और मॉक संसद से रामलीला मैदान की भीड़ बीच राहुल की हुंकार क्या वोटों की कुछ फसल तैयार कर सकेगी ? पता राज्यों के 2027 के विधानसभा चुनाव में चल सकेगा. पार्टी के सामने उत्तर प्रदेश में वोट से पहले लड़ने के लिए सपा से पर्याप्त सीटें हासिल करने की चुनौती दरपेश है.

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संपादकीय टीम

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