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Critical Minerals Crisis: भारत में नीलाम हुईं 733 खदानें, लेकिन सिर्फ 125 से ही क्यों निकल रहा खनिज?​

Critical Minerals Crisis: पूरी दुनिया में इस वक्त क्रिटिकल मिनरल्स यानी जरूरी खनिजों पर कब्जे की होड़ मची है. दूसरी तरफ चीन से जुड़ी सप्लाई चेन की रुकावटों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे अहम समय में भारत अपनी ज्यादातर खदानों को चालू ही नहीं कर पा रहा है. कोयला और खान मंत्रालयों […]

Critical Minerals Crisis: पूरी दुनिया में इस वक्त क्रिटिकल मिनरल्स यानी जरूरी खनिजों पर कब्जे की होड़ मची है. दूसरी तरफ चीन से जुड़ी सप्लाई चेन की रुकावटों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे अहम समय में भारत अपनी ज्यादातर खदानों को चालू ही नहीं कर पा रहा है. कोयला और खान मंत्रालयों की ताजा समीक्षा रिपोर्ट में ये चौंकाने वाली बात सामने आई है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक खबर के मुताबिक , भारत अभी भी आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है. जमीनी स्तर पर काम शुरू करने में आ रही रुकावटों ने पूरे सिस्टम को जकड़ रखा है. छठे मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले साझा किए गए कॉन्सेप्ट नोट में केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए राज्यों को अब मिशन मोड में काम करना होगा.

कागजी मंजूरियों में अटकीं 608 खदानें

सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो हालात की गंभीरता तुरंत समझ आती है. अलगअलग राज्यों ने अब तक कुल 733 मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की है. लेकिन अगस्त 2026 तक इनमें से सिर्फ 125 खदानों में ही काम शुरू हो पाया है. बाकी बची 608 खदानें अलगअलग स्तर की सरकारी मंजूरियों के फेर में फंसी हुई हैं. बड़े और क्रिटिकल मिनरल ब्लॉक्स के मामले में तो नीलामी से लेकर उत्पादन शुरू होने के बीच का समय सात साल से भी ज्यादा हो गया है. नियमों की पेचीदगी और क्लीयरेंस की लंबी प्रक्रिया इसकी सबसे बड़ी वजह है. इस देरी से देश को सीधा आर्थिक नुकसान हो रहा है. माइनिंग सेक्टर से सरकारी खजाने में हर साल 1.9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा आते हैं. खास बात ये है कि इस रकम का 90 फीसदी हिस्सा सीधे राज्यों को मिलता है.

तकनीक की कमी से गहराया संकट

भारत लिथियम, कोबाल्ट समेत 95 से ज्यादा खनिजों का उत्पादन करता है, लेकिन रफ्तार बेहद सुस्त है. क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में भारत को चीन की सप्लाई चेन और तकनीक पर निर्भर रहना पड़ता है. जमीन की ऊपरी सतह के खनिज अब खत्म हो रहे हैं. ऐसे में जमीन की गहराई में दबे खनिजों को निकालने के लिए डीपड्रिलिंग तकनीक चाहिए. भारत के पास अभी ये तकनीक शुरुआती स्तर पर ही है. विदेश से आधुनिक तकनीक मंगाना बहुत महंगा है. इसी वजह से निवेशक भी जोखिम उठाने से बच रहे हैं. इसके अलावा देश में उच्च शुद्धता वाले खनिजों को प्रोसेस करने की क्षमता भी काफी कम है. नए जमाने के उद्योगों को रेयर अर्थ एलिमेंट्स आसानी से मिल सकें, इसके लिए केंद्र ने राज्यों से समुद्र तट की रेत में मिलने वाले मोनाजाइट जैसे खनिजों को निकालने का ढांचा बनाने को कहा है. उधर, छोटे खनिजों के मामले में भी जीआईएस आधारित डेटा और स्पष्ट नियमों की कमी है. इससे अवैज्ञानिक तरीके से खनन हो रहा है, जो स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है.

जमीन अधिग्रहण बना सबसे बड़ा रोड़ा

खदानों के शुरू न हो पाने में कुल नौ स्तरों की चुनौतियां सामने आई हैं. इनमें जमीन अधिग्रहण सबसे बड़ी सिरदर्दी है. राज्यों में जमीन के अधूरे रिकॉर्ड, मालिकाना हक के विवाद, मुआवजे का जटिल हिसाब और विस्थापन के मुद्दों ने काम रोक रखा है. जमीन पर कब्जा लेने में भी भारी विरोध का सामना करना पड़ता है. जंगलों की कटाई के बदले पेड़ लगाने के लिए राज्यों के पास पहले से तय लैंड बैंक नहीं हैं. इस वजह से फॉरेस्ट क्लीयरेंस के प्रस्ताव लटक जाते हैं. इसके अलावा कानूनव्यवस्था की समस्या के चलते भी खनन और खनिजों की ढुलाई रुक जाती है. रेत और पत्थर के अवैध खनन से न सिर्फ नदियों का तल खराब हो रहा है, बल्कि सरकार को रॉयल्टी का भी भारी नुकसान हो रहा है.

टैक्स के जाल में उलझा माइनिंग सेक्टर

प्रशासनिक स्तर पर भी कम दिक्कतें नहीं हैं. राज्यों ने अपने स्तर पर कई तरह के सेस और टैक्स लगा रखे हैं. अलगअलग विभागों से एक के बाद एक मंजूरी लेनी पड़ती है. छोटे खनिजों के लिए सिंगलविंडो पोर्टल का न होना और जिला सर्वे रिपोर्ट में देरी से काम अटकता है. खदान से माल निकालने के बाद उसे सही जगह पहुंचाने के लिए लॉजिस्टिक्स का मजबूत ढांचा भी नहीं है. खदानों से मुख्य सड़क या रेलवे साइडिंग की कनेक्टिविटी, बंदरगाहों से जुड़ाव, स्टॉकयार्ड और ट्रांजिट परमिट सिस्टम में बड़े सुधार की जरूरत है. केंद्र ने राज्यों को सलाह दी है कि वे क्लीन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए एक संपूर्ण वैल्यू चेन अप्रोच अपनाएं. इसमें संसाधन से लेकर कमाई तक, नीलामी से लेकर खदान चालू करने तक और कचरे से कंचन बनाने तक का पूरा रोडमैप शामिल है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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