प्रवर्तन निदेशालय ने देशभर में फैले कथित साइबर फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की जांच के दौरान मुंबई एयरपोर्ट से एक वकील को गिरफ्तार किया है। करीब 28,000 करोड़ रुपये के बैंकिंग लेनदेन से जुड़े इस मामले में आरोपी पर रिश्वत के जरिए साइबर ठगी से जुड़े बैंक खातों को अनफ्रीज कराने में मदद करने का आरोप है। इस गिरफ्तारी के साथ मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या सात हो गई है।

ED के पणजी जोनल कार्यालय ने मुंबई निवासी अधिवक्ता रशेष भरतकुमार उपाध्याय उर्फ रशेष शाह को 24 अक्टूबर 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत गिरफ्तार किया। एजेंसी के अनुसार, आरोपी मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दिल्ली जाने वाली उड़ान पकड़ने की कोशिश कर रहा था। उसे बोर्डिंग गेट पर रोका गया। इस कार्रवाई में मुंबई कस्टम्स और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ने ED की मदद की। आरोपी को पणजी ले जाकर PMLA की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 29 अक्टूबर तक ED की हिरासत में भेज दिया गया।
ED के अनुसार, रशेष उपाध्याय कथित साइबर अपराध नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी था। साइबर फ्रॉड की शिकायतों के बाद जब जांच एजेंसियां नेटवर्क से जुड़े बैंक खातों को फ्रीज करती थीं, तब आरोपी कथित तौर पर बिचौलियों के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को नकद रिश्वत दिलाकर उन खातों को अनफ्रीज कराने की व्यवस्था करता था। एजेंसी का आरोप है कि वह रिश्वत की रकम तय करने, नकदी एकत्र करने के स्थान निर्धारित करने और संबंधित लोगों तक भुगतान पहुंचाने में भूमिका निभाता था। इस नेटवर्क में नकदी के लेनदेन के लिए अंगड़ियों का इस्तेमाल किए जाने का भी आरोप है।
ED ने अदालत को बताया कि आरोपी ने कथित तौर पर विभिन्न एजेंटों के लिए करीब 100 बैंक खातों को अनफ्रीज कराने की व्यवस्था की थी। एजेंसी के मुताबिक, एक मामले में कथित भुगतान 60 लाख रुपये से अधिक था। जांच एजेंसी का आरोप है कि फ्रीज किए गए खातों को दोबारा चालू कराने से नेटवर्क को कथित साइबर ठगी की रकम का लेनदेन जारी रखने में मदद मिली।
जांच के दौरान ED ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने एजेंसी की तलाशी कार्रवाई के बाद भी ऐसी गतिविधियां जारी रखीं। इनमें ED द्वारा स्वयं फ्रीज किए गए खाते भी शामिल थे। एजेंसी के अनुसार, मुंबई से निकलने की कोशिश करने से पहले आरोपी ने सहआरोपियों के साथ अपनी चैट डिलीट कर दी थीं और अपने सभी ज्ञात मोबाइल नंबर बंद कर दिए थे।
ED के मुताबिक, आरोपी अधिवक्ता के रूप में नामांकित था, लेकिन उसने कथित तौर पर किसी भी सहआरोपी या उनकी कंपनियों की ओर से अदालत में पैरवी नहीं की और न ही कोई वकालतनामा दाखिल किया। एजेंसी का आरोप है कि उसने अपनी पेशेवर पहचान का इस्तेमाल रिश्वत की व्यवस्था कराने और कथित साइबर ठगी से जुड़ी रकम वाले खातों को अनफ्रीज कराने के लिए किया। जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि किसी गैरकानूनी उद्देश्य को आगे बढ़ाने या अपराध अथवा धोखाधड़ी को प्रदर्शित करने वाले संवादों को अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच गोपनीयता का संरक्षण प्राप्त नहीं होता।
इस मामले की जांच गोवा पुलिस द्वारा 9 जून 2025 को दर्ज की गई FIR के आधार पर शुरू हुई थी। मामला गोवा की एक महिला के साथ कथित डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी से जुड़ा है। ED के अनुसार, 21 मई 2025 से 2 जून 2025 के बीच साइबर ठगों ने महिला को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर निशाना बनाया और उससे कई म्यूल बैंक खातों में 2.60 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए।
जांच में सामने आया कि ठगी की रकम को करीब 400 म्यूल बैंक खातों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया। ये खाते कमोडिटी, ट्रैवल और विदेशी मुद्रा से जुड़ी कंपनियों के थे, जिन्हें कथित तौर पर डमी निदेशकों के जरिए संचालित किया जाता था। ED के अनुसार, इन खातों में जमा रकम बाद में नकदी के रूप में निकाली गई और भारतीय रिजर्व बैंक से लाइसेंस प्राप्त मनी चेंजर के माध्यम से विदेशी मुद्रा में बदली गई।
ED की जांच के मुताबिक, कथित नेटवर्क से करीब 28,000 करोड़ रुपये के बैंकिंग लेनदेन हुए और लगभग 2,900 करोड़ रुपये नकद जमा किए गए। नेटवर्क से जुड़े बैंक खाते 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में दर्ज 300 से अधिक पीड़ितों की शिकायतों और 160 से अधिक FIR में सामने आए हैं। इन मामलों में दर्ज वित्तीय नुकसान 400 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है। ये आंकड़े पूरे कथित नेटवर्क की जांच से संबंधित हैं, जबकि गोवा की महिला से ठगी गई 2.60 करोड़ रुपये की रकम उस मामले का हिस्सा है, जिससे जांच शुरू हुई थी।
रशेष उपाध्याय की गिरफ्तारी से पहले ED इस मामले में छह लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थी। इनमें कथित नेटवर्क के दो संचालक फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद भी शामिल हैं। अन्य आरोपियों पर नेटवर्क को बैंकिंग लेनदेन की सुविधा उपलब्ध कराने और फ्रीज किए गए खातों को अनफ्रीज कराने की व्यवस्था में शामिल होने के आरोप हैं।
ED अब उन अधिकारियों की पहचान करने में जुटी है, जिन्होंने कथित तौर पर रिश्वत ली। इसके साथ ही अंगड़ियों और अन्य बिचौलियों की भूमिका की जांच की जा रही है तथा अपराध से अर्जित पूरी रकम का पता लगाने के प्रयास जारी हैं। करीब 28,000 करोड़ रुपये के लेनदेन, सैकड़ों शिकायतों और कई राज्यों में दर्ज FIR से जुड़े इस मामले में सातवीं गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा और महत्वपूर्ण हो गया है। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच जारी है और उनका अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगा।