फ्रांस में स्टूडेंट्स का प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. एक छोटे से स्कूल से शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरे देश में विस्तार ले चुका है. राजधानी पेरिस भी इससे अछूती नहीं है. प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड और प्लेस डे ला रिपब्लिक जैसी जगह स्टूडेंट्स आंदोलन से चर्चा में आईं. ये छात्र स्कूलों में शिक्षकों की पर्याप्त संख्या, अच्छे स्कूल भवनों और शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता की मांग कर रहे हैं. फ्रांस का इतिहास बेहद रोचक रहा है. यहां प्रदर्शनों का सिलसिला भी लंबा चला है. एक बार तो राष्ट्रपति को इस्तीफा तक देना पड़ा है. नए चुनाव हुए तब जाकर दोबारा नई सरकार बनी.

आइए, वर्तमान आंदोलनों के बहाने जानते हैं प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड यानी फ्रांस के खूनी चौक की कहानी, जहां हो रहे हैं प्रदर्शन, कभी यहीं राजा को मृत्युदंड दिया गया था.
फ्रांस के राजा के मृत्युदंड का गवाह है प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड
पेरिस के केंद्र में एक विशाल चौक है. इसका नाम है प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड. फ्रांसीसी भाषा में कॉनकॉर्ड का अर्थ है सहमति या मेलमिलाप. आज यह चौक अपनी खूबसूरत सड़क, फव्वारों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए जाना जाता है. लेकिन इसका अतीत बहुत हिंसक रहा है. यहां कभी फ्रांस के राजा को मृत्युदंड दिया गया था. फ्रांसीसी क्रांति के दौरान यह जगह सार्वजनिक फांसी का प्रमुख स्थल बन गई थी.
पेरिस का प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड. फोटो: Getty Images
हजारों लोग यहां इकट्ठा होकर मौत की सजा देखते थे. इसी कारण इसे लंबे समय तक फ्रांस के सबसे खूनी चौकों में से एक गिना गया. आज भी इस चौक पर प्रदर्शन होते हैं. लोग यहां राजनीतिक फैसलों, सामाजिक मुद्दों और सरकार के विरोध में अपनी आवाज उठाते हैं. इस तरह यह जगह फ्रांस के इतिहास और वर्तमान, दोनों से जुड़ी हुई है.
प्लेस डे ला चौक की शुरुआत कब हुई?
प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था. उस समय फ्रांस पर राजा लुई पंद्रहवें का शासन था. चौक का निर्माण राजा की प्रतिष्ठा दिखाने के लिए किया गया. इसके बीचोंबीच राजा की एक मूर्ति लगाई गई थी. उस समय इस जगह का नाम प्लेस लुई पंद्रहवां था. यह नाम राजा के सम्मान में रखा गया था.
चौक के आसपास सुंदर इमारतें और खुला मैदान बनाया गया. इसका उद्देश्य पेरिस को भव्य और प्रभावशाली रूप देना था. लेकिन कुछ ही दशकों में फ्रांस की राजनीति बदल गई. देश में आर्थिक संकट बढ़ा. आम लोगों पर भारी करों का बोझ था. भोजन की कमी और महंगाई ने जनता का जीवन कठिन कर दिया. दूसरी ओर, राजपरिवार और अमीर वर्ग ऐशोआराम से रह रहे थे. लोगों में असंतोष बढ़ता गया. आखिरकार यह असंतोष एक बड़ी क्रांति में बदल गया.
फ्रांसीसी क्रांति और राजशाही का अंत
फ्रांसीसी क्रांति 1789 में शुरू हुई. लोगों ने पुराने शासन और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई. क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता, समानता और नागरिक अधिकारों की मांग की. राजा लुई सोलहवें और रानी मेरी आंतोआनेत पर जनता का गुस्सा बढ़ता गया. राजशाही को देश की समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना गया.
1792 में फ्रांस को गणराज्य घोषित किया गया. राजपरिवार की राजनीतिक शक्ति समाप्त हो गई. राजा लुई सोलहवें पर देशद्रोह का मुकदमा चला. उन्हें दोषी ठहराया गया और मृत्युदंड दिया गया. 21 जनवरी 1793 को उन्हें उसी चौक में गिलोटिन से मार दिया गया, जिसे पहले उनके पूर्वज के नाम पर रखा गया था.
गिलोटिन उस समय मृत्युदंड देने का एक आम तरीका था. इसमें एक भारी धारदार ब्लेड ऊपर से गिराया जाता था. क्रांतिकारियों का दावा था कि यह तरीका तेज और समान रूप से लागू किया जा सकता है. लेकिन जनता के लिए यह भय और हिंसा का प्रतीक बन गया.
प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था. फोटो: Getty Images
राजा को मृत्युदंड के बाद नाम पड़ा प्लेस डे ला रिवोल्यूशन
राजा को मृत्युदण्ड के बाद चौक का नाम बदलकर प्लेस डे ला रिवोल्यूशन रखा गया. इसका अर्थ है क्रांति का चौक. यहां कई लोगों को मृत्युदंड दिया गया. इनमें रानी मेरी आंतोआनेत भी शामिल थीं. उन्हें अक्टूबर 1793 में फांसी दी गई. राजनीतिक विरोधियों, पुराने शासन के समर्थकों और क्रांति के आलोचकों को भी यहां लाया गया. कई बार एक ही दिन में बड़ी संख्या में लोगों को सजा दी जाती थी.
भीड़ चौक के चारों ओर जमा होती थी. कुछ लोग इसे न्याय का उत्सव मानते थे. दूसरों के लिए यह डरावना दृश्य था. क्रांति के दौरान सत्ता तेजी से बदल रही थी. एक समय के क्रांतिकारी नेता भी अपने विरोधियों के निशाने पर आ जाते थे. हजारों लोगों को अलगअलग स्थानों पर मृत्युदंड दिया गया. प्लेस डे ला रिवोल्यूशन इस समय का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया. यहां हुई फांसियों ने फ्रांस को गहरे रूप में प्रभावित किया. लोगों ने स्वतंत्रता के नाम पर शुरू हुई क्रांति में भय और बदले की राजनीति भी देखी.
नाम में मेलमिलाप और इतिहास में संघर्ष की गवाही
1795 में चौक का नाम बदलकर प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड कर दिया गया. यह नाम देश में शांति और मेलमिलाप का संदेश देने के लिए चुना गया था. फ्रांस लंबे समय से राजनीतिक उथलपुथल से गुजर रहा था. नया नाम इस उम्मीद को दिखाता था कि देश हिंसा से आगे बढ़ सकेगा. हालांकि, नाम बदलने से अतीत मिटा नहीं. चौक फ्रांस की क्रांति, राजशाही के पतन और सार्वजनिक मृत्युदंड की याद दिलाता रहा. बाद के वर्षों में फ्रांस में सत्ता कई बार बदली. कभी राजतंत्र लौटा, कभी गणतंत्र मजबूत हुआ.
चौक का रूप भी समय के साथ बदलता गया. 1830 के दशक में इसे नया रूप दिया गया. मिस्र से लाया गया एक प्राचीन ओबेलिस्क चौक के केंद्र में स्थापित किया गया. यह पत्थर हजारों वर्ष पुराना है. इसके दोनों ओर फव्वारे लगाए गए. चौक में मूर्तियां और सजावटी तत्व भी जोड़े गए. आज यह ओबेलिस्क प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड की सबसे पहचानी जाने वाली निशानी है. यह मिस्र और फ्रांस के पुराने सांस्कृतिक संबंधों की याद भी दिलाता है.
आज का प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड
आज प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड पेरिस के बड़े सार्वजनिक स्थानों में से एक है. यह सीन नदी, शॉम्प्सएलिसे और ट्यूलरी उद्यान के पास स्थित है. यहां से शहर की कई प्रसिद्ध जगहों तक पहुंचना आसान है. पर्यटक यहां ओबेलिस्क, फव्वारे और आसपास की ऐतिहासिक इमारतें देखने आते हैं. चौक का खुला विस्तार इसे बड़े आयोजनों और सार्वजनिक जमावड़ों के लिए उपयुक्त बनाता है.
यहां समयसमय पर प्रदर्शन और रैलियां भी होती हैं. लोग सरकार की नीतियों, सामाजिक अधिकारों और आर्थिक फैसलों पर अपना विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतरते हैं. प्रदर्शन लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी का हिस्सा हैं. लेकिन बड़े जमावड़ों के दौरान यातायात और सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी हो जाती है. जब लोग आज इस चौक पर प्रदर्शन करते हैं, तो वे एक ऐसी जगह पर खड़े होते हैं जहां फ्रांस के इतिहास के निर्णायक पल घटे थे. यही बात इसे केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रहने देती. यह नागरिक आवाज, राजनीतिक बदलाव और सार्वजनिक स्मृति का प्रतीक भी है.
कई सवाल उठाता है प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड इतिहास
प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड का इतिहास कई सवाल उठाता है. क्या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव को हिंसा के बिना हासिल किया जा सकता है? जब जनता किसी शासन से नाराज होती है, तो न्याय और बदले के बीच सीमा कैसे तय होती है? और किसी देश को अपने हिंसक अतीत को कैसे याद रखना चाहिए?
फ्रांसीसी क्रांति ने दुनिया भर में स्वतंत्रता और समानता की बहस को प्रभावित किया. उसने यह भी दिखाया कि जनता की शक्ति बहुत बड़ी होती है. लेकिन उसने यह चेतावनी भी दी कि भय और बदले की राजनीति नए अन्याय पैदा कर सकती है. इस चौक का नाम भले ही मेलमिलाप और सहमति है लेकिन उसका इतिहास संघर्ष से भरा है. यह जगह बताती है कि शहरों के खुले मैदान केवल इमारतों और सड़कों का हिस्सा नहीं होते. वे लोगों की यादों, संघर्षों और उम्मीदों को भी अपने भीतर रखते हैं. प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड में कभी राजा को मृत्युदंड दिया गया था. बाद में यहां शांति का प्रतीकात्मक नाम रखा गया. आज यहां लोग अपनी बात कहने के लिए जुटते हैं. इस तरह यह चौक फ्रांस के अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल बना हुआ है.