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तो क्‍या 500 रुपये लीटर बिकेगा पेट्रोल-डीजल? क्रूड ऑयल पर आई नई भव‍िष्‍यवाणी देख लीजिए​

कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नई भविष्यवाणी आई है. करेंसी स्‍ट्रेटज‍िस्‍ट उल्फ लिंडाल के मुताबिक, फरवरी 2027 के आखिर तक कच्चा तेल 140 डॉलर प्रति बैरल और 2030 तक 500 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. उन्‍होंने इसकी वजह भी बताई है. उनका कहना है क‍ि अमेरिकाईरान युद्ध के बाद तेल की सप्लाई […]

कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नई भविष्यवाणी आई है. करेंसी स्‍ट्रेटज‍िस्‍ट उल्फ लिंडाल के मुताबिक, फरवरी 2027 के आखिर तक कच्चा तेल 140 डॉलर प्रति बैरल और 2030 तक 500 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. उन्‍होंने इसकी वजह भी बताई है. उनका कहना है क‍ि अमेरिकाईरान युद्ध के बाद तेल की सप्लाई में कमी और दुनिया के तेल भंडार को दोबारा भरने की जरूरत से कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है. सवाल ये क‍ि अभी 100110 के पास कीमतें तो पेट्रोल डीजल भी 100 के आसपास, जब 500 होगा क्रूड का दाम तो क्‍या पेट्रोल डीजल भी 500 रुपये लीटर होगा?

क्रूड ऑयल 2030 तक 500 डॉलर पर जा सकता है.
कच्‍चे तेल की कीमतें 1020 डॉलर बढ़ती हैं तो आफत आ जाती है. पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने का डर लगने लगता है. लेकिन अब ऐसी भव‍िष्‍यवाणी आई है जो आफत बढ़ाने वाली है. अगर यह अनुमान सही न‍िकले तो पेट्रोल डीजल की कीमतें 100200 नहीं, बल्‍क‍ि कई गुना हो सकती हैं. यह भव‍िष्‍यवाणी करेंसी स्‍ट्रेटज‍िस्‍ट उल्फ लिंडाल ने की है. उनका कहना है कि कच्चे तेल का भाव फरवरी 2027 के आखिर तक 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. इतना ही नहीं, उन्होंने 2030 तक इसकी कीमत 500 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है.

सोच‍िए अभी भाव 100 के आसपास है तो पेट्रोल डीजल की कीमतें 100 तक है. उसमें भी एथेनॉल म‍िलाने के बाद. कंपन‍ियों के घाटा सहने के बाद… अब अगर क्रूड का दाम ही 500 डॉलर प्रत‍ि बैरल तक पहुंच गए तो क्‍या आफत होगी. सीधे सीधे कहें तो पेट्रोल डीजल के दाम भी पांच गुना तक हो सकते हैं. हालांक‍ि, यह स‍िर्फ अनुमान और आशंका है.

करेंसी रिसर्च एसोसिएट्स की 15 अक्टूबर को आई रिपोर्ट में तेल की कीमतों को लेकर यह अनुमान दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के बाद तेल की सप्लाई पर जो असर पड़ा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अगर सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है और उत्पादन जल्दी नहीं बढ़ पाता, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.

लिंडाल ने अपने अनुमान के लिए सोने और कच्चे तेल की कीमतों के बीच के अनुपात का भी सहारा लिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह अनुपात अभी करीब 43 है. उनका अनुमान है कि अगले चार महीनों में यह घटकर 30 तक आ सकता है.

अगर सोने की कीमत करीब 4,150 डॉलर प्रति औंस बनी रहती है और सोनेतेल का अनुपात 30 पर आ जाता है, तो इस हिसाब से तेल की कीमत करीब 138 डॉलर प्रति बैरल बैठती है. इसी गणना के आधार पर फरवरी 2027 के आखिर तक तेल के 140 डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. यह गणित कुछ अनुमानों पर आधार‍ित है. सोने का भाव बदलता है तो तेल की निकाली गई संभावित कीमत भी बदल सकती है. इसलिए 140 डॉलर को निश्चित भाव समझना सही नहीं होगा.

2030 तक 500 डॉलर का अनुमान, इतनी बड़ी छलांग कैसे?
लिंडाल का दूसरा अनुमान और भी चौंकाने वाला है. उनका मानना है कि 2030 तक कच्चे तेल की कीमत 500 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. उन्होंने अपने आकलन में तेल की कीमतों में लंबे समय के दौरान होने वाली बड़ी बढ़ोतरी और मौजूदा सप्लाई संकट के असर को अहम माना है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर 2020 के स्तर से एक दशक में तेल 500 डॉलर तक पहुंचता है, तो यह करीब 1,150% की बढ़ोतरी होगी. लिंडाल पहले भी इस तरह का अनुमान दे चुके हैं. साल 2024 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने 2030 तक तेल के 500 डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई थी.

लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि तेल की कीमतें सिर्फ युद्ध से तय नहीं होतीं. दुनिया में मांग कितनी है, तेल उत्पादक देश कितना उत्पादन कर रहे हैं, नए स्रोत कितनी जल्दी तैयार होते हैं और अर्थव्यवस्था की हालत कैसी रहती है, इन सभी बातों का असर पड़ता है. इसलिए 500 डॉलर वाला आंकड़ा एक बेहद आक्रामक अनुमान है, न कि बाजार की तय दिशा.

युद्ध के बाद तेल की सप्लाई में कितनी कमी आई?
रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा तेल की सप्लाई में हुई कमी से जुड़ा है. इसमें दावा किया गया है कि युद्ध शुरू होने के बाद 26 हफ्तों में करीब 167.5 करोड़ बैरल तेल की सप्लाई नहीं हो पाई. यानी इस अवधि में रोजाना औसतन 92 लाख बैरल तेल की कमी रही. यह 2025 में दुनिया की करीब 10.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन की तेल खपत का लगभग 9% बैठती है.

जब बाजार में तेल की सप्लाई कम पड़ती है, तो देश अपनी जरूरत पूरी करने के लिए जमा भंडार से तेल निकाल सकते हैं. इससे तत्काल कमी का असर कुछ हद तक संभल जाता है. लेकिन निकाला गया तेल वापस भरना भी जरूरी होता है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर देशों को एक साल में अपने भंडार में 167.5 करोड़ बैरल तेल वापस जमा करना है, तो इसके लिए रोजाना करीब 46 लाख बैरल अतिरिक्त सप्लाई चाहिए होगी. यानी सामान्य खपत के अलावा तेल की इतनी अतिरिक्त मात्रा बाजार में उपलब्ध करानी होगी.

भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इसका असर रुपये, महंगाई, पेट्रोलडीजल की कीमतों और माल ढुलाई के खर्च पर पड़ सकता है. हालांकि, 140 या 500 डॉलर तक तेल पहुंचने की अभी कोई गारंटी नहीं है. लेकिन सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट बनी रहती है और तेल के भंडार दोबारा भरने के लिए मांग बढ़ती है, तो कीमतों में तेजी का जोखिम बना रह सकता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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