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2027 में राजा भैया की घेराबंदी! कुंडा से बाबागंज तक… अखिलेश की नई चाल​

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले प्रतापगढ़ की सियासत में नई हलचल है. निशाने पर हैं कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया और उनके प्रभाव वाला इलाका. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राजा भैया के करीबी माने जाने वाले शैलेंद्र पासी और बाबागंज के पूर्व बीजेपी प्रत्याशी केशव पासी […]

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले प्रतापगढ़ की सियासत में नई हलचल है. निशाने पर हैं कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया और उनके प्रभाव वाला इलाका. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राजा भैया के करीबी माने जाने वाले शैलेंद्र पासी और बाबागंज के पूर्व बीजेपी प्रत्याशी केशव पासी को पार्टी में शामिल कराकर नई चाल चल दी है. इससे पहले 2022 में सपा ने राजा भैया के सामने उनके पुराने करीबी गुलशन यादव को उतारा था.

कुंडा में राजा भैया के सामने सपा की नई रणनीति

प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा सीट… राजा भैया का गढ़ है. रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया 1993 से लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आए हैं. पहले निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और फिर अपनी पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के टिकट पर… 2022 में उन्होंने सातवीं बार जीत दर्ज की, लेकिन 2022 का चुनाव राजा भैया के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा. समाजवादी पार्टी ने उनके सामने गुलशन यादव को मैदान में उतारा था.

गुलशन यादव कभी राजा भैया के करीबी माने जाते थे, लेकिन बाद में दोनों के राजनीतिक रास्ते अलग हो गए. 2022 में राजा भैया को 99,612 वोट मिले, जबकि गुलशन यादव को 69,297 वोट हासिल हुए. राजा भैया 30,315 वोटों से जीते. पिछली बार टक्कर देने के बाद अब 2027 से पहले सपा की नई रणनीति चर्चा में है. इस बार पार्टी के साथ ऐसे चेहरे आए हैं, जिसकी वजह से राजा भैया की सियासी मुसीबत बढ़ सकती है.

शैलेंद्र पासी और केशव पासी की एंट्री क्यों अहम?

समाजवादी पार्टी में शामिल हुए शैलेंद्र पासी और केशव पासी की एंट्री को केवल दो नेताओं के दल बदलने के तौर पर नहीं देखा जा रहा. इसकी वजह है इन नेताओं का स्थानीय राजनीतिक संपर्क और पासी समाज से जुड़ाव. शैलेंद्र पासी का नाम राजा भैया के पुराने करीबियों में लिया जाता रहा है. वह कौशांबी से सांसद रह चुके हैं. दूसरी ओर, केशव पासी बाबागंज से बीजेपी के उम्मीदवार रह चुके हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में बाबागंज से वह जीत हासिल नहीं कर पाए थे.

कुंडा से सटी बाबागंज सीट भी क्यों है महत्वपूर्ण?

राजा भैया की सियासत की चर्चा हो और बाबागंज का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है. कुंडा के बगल में स्थित बाबागंज विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. यहां जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के विधायक विनोद कुमार का अपना चुनावी आधार रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में विनोद कुमार को 67,282 वोट मिले थे. समाजवादी पार्टी के गिरिश चंद्र को 51,515 वोट मिले, जबकि बीजेपी के केशव प्रसाद को 30,391 वोट हासिल हुए.

विनोद पासी लगातार चौथी बार विधायक हैं. इससे पहले उनके पिता विधायक रह चुके हैं, लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने बाबागंज में राजा भैया और विनोद पासी को घेरने की खास रणनीति बनाई है. बाबागंज में केशव पासी की सपा में एंट्री इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह पहले बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. माना जा रहा है कि इस बार यहां से पूर्व सांसद शैलेंद्र पासी को सपा चुनावी मैदान में उतार सकती है.

पासी और दलित वोटों पर किसकी नजर?

कुंडा और बाबागंज के सियासी समीकरण में दलित मतदाताओं की भूमिका अहम है. बाबागंज आरक्षित सीट है, जबकि कुंडा सामान्य सीट होने के बावजूद यहां दलित, यादव, मुस्लिम, ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूह चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को साथ लाने की बात कर रहे हैं. सपा की कोशिश है कि कुंडा और बाबागंज में PDA के जरिए ही जीत हासिल किया जाए.

क्या 2022 के नतीजे बदल सकते हैं 2027 का मुकाबला?

2022 के नतीजों में कुंडा और बाबागंज दोनों सीटों पर जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के उम्मीदवार जीते थे. कुंडा में राजा भैया ने 30,315 वोटों से जीत दर्ज की, जबकि बाबागंज में विनोद कुमार की जीत का अंतर 15,767 वोट था. वहीं कुंडा में गुलशन यादव ने 69 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे, जबकि बाबागंज में सपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे. लोकसभा चुनाव के दौरान सपा के पुष्पेंद्र सरोज ने दोनों विधानसभा सीटों पर लीड दर्ज की थी. हालांकि, राजा भैया ने पुष्पेंद्र सरोज का सपोर्ट भी किया था.

अदावत की शुरुआत कहां से हुई?

राजा भैया और अखिलेश यादव के रिश्तों में दरार की सबसे बड़ी वजह 2018 का राज्यसभा चुनाव माना जाता है. इससे पहले राजा भैया समाजवादी पार्टी की सरकारों में मंत्री रह चुके थे और मुलायम सिंह यादव के साथ उनके अच्छे संबंध माने जाते थे. अखिलेश यादव की सरकार में भी राजा भैया, कैबिनेट मंत्री बने थे. 2018 में सपा ने जया बच्चन को राज्यसभा भेजने के लिए उम्मीदवार बनाया था, जबकि बसपा की ओर से भीमराव आंबेडकर मैदान में थे.

सपाबसपा के बीच राजनीतिक तालमेल के तहत अखिलेश यादव ने बसपा उम्मीदवार का समर्थन किया. उस समय निर्दलीय विधायक राजा भैया ने साफ किया कि वह अखिलेश यादव के साथ हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह मायावती या बसपा के साथ हैं. मतदान में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट दिया. इसके बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई. इसी साल राजा भैया ने जनसत्ता दल लोकतांत्रिक का गठन किया.

कुंडा में पहली बार सीधी चुनावी चुनौती

2022 में समाजवादी पार्टी ने लंबे अंतराल के बाद कुंडा सीट पर राजा भैया के खिलाफ उम्मीदवार उतारा. पार्टी ने उनके पूर्व करीबी रहे गुलशन यादव को टिकट दिया. इससे पहले सपा लंबे समय तक कुंडा में राजा भैया के खिलाफ उम्मीदवार उतारने से बचती रही थी. अखिलेश यादव ने चुनाव प्रचार के दौरान कुंडा में बदलाव की अपील करते हुए ‘कुंडी बंद कर दो’ वाला तंज भी किया. इसके जवाब में राजा भैया ने सार्वजनिक रूप से अखिलेश यादव पर निशाना साधा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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