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वो 5 वजहें, जिनके चलते अजय राय को यूपी कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया गया?​

अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर की खींचतान को लेकर चर्चाएं तेज हैं. 11 अक्टूबर को लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान हुए विवाद के बाद से अजय राय ने खुद को सार्वजनिक गतिविधियों से दूर रखा […]

अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर की खींचतान को लेकर चर्चाएं तेज हैं. 11 अक्टूबर को लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान हुए विवाद के बाद से अजय राय ने खुद को सार्वजनिक गतिविधियों से दूर रखा है. पिछले 72 घंटे से उनके बातचीत नहीं करने की चर्चा है. हालांकि, मंगलवार को उन्होंने वाराणसी के कुछ मीडिया कर्मियों से ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत की थी.

अजय राय के करीबी लोगों के मुताबिक, उन्होंने फिलहाल कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने की संभावना से इनकार किया है. बताया गया कि वह बीजेपी में वापस नहीं जाएंगे और सपा या बसपा में जाने का भी कोई इरादा नहीं है. इस बीच, अजय राय के समर्थकों ने उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की कथित नाराजगी के तीन कारण गिनाए हैं. वहीं, उनके विरोधियों ने संगठन की कमजोरी और समाजवादी पार्टी के साथ रिश्तों को लेकर दो सवाल उठाए हैं.

1. तिलक और दर्शनपूजन से पार्टी के भीतर असहजता?

अजय राय के करीबियों का दावा है कि प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उनके धार्मिक कार्यक्रमों और मंदिरों में दर्शन को लेकर पार्टी के कुछ नेताओं को आपत्ति थी. समर्थकों के मुताबिक, अजय राय ने अपने कार्यकाल में 11 बार अयोध्या में रामलला के दर्शन किए और नौ बार मथुरा में बांके बिहारी मंदिर पहुंचे. उन्होंने गोवर्धन की सात कोस की परिक्रमा भी नंगे पैर की.

अजय राय के समर्थकों का आरोप है कि प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम को उनके इस तरीके पर आपत्ति थी. उनका मानना था कि कांग्रेस भी बीजेपी की राजनीतिक पिच पर खेलती नजर आ रही है. समर्थकों का कहना है कि अजय राय के लिए दर्शनपूजन निजी आस्था का विषय था, लेकिन इसे पार्टी की राजनीतिक लाइन से जोड़कर देखा गया.

2. अल्पसंख्यक मुद्दों पर सक्रियता से भी बढ़ी नाराजगी?

अजय राय के करीबियों का दूसरा दावा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मस्जिदों और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों में उनकी सक्रियता ने पार्टी के भीतर नए राजनीतिक समीकरण पैदा किए. समर्थकों के मुताबिक, सहारनपुर, रामपुर, बरेली और मुरादाबाद में अजय राय ने संबंधित मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाई. उनका दावा है कि इन घटनाओं के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से में अजय राय की स्वीकार्यता बढ़ी.

समर्थकों ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस के कुछ मुस्लिम नेताओं और समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं को उनकी बढ़ती लोकप्रियता असहज करने लगी थी. सहारनपुर की घटना के बाद कांग्रेस नेता इमरान मसूद के साथ उनके मतभेद बढ़ने का भी दावा किया गया है.

3. जरूरत से ज्यादा मुखर होना पड़ा भारी?

अजय राय के समर्थकों का तीसरा तर्क उनकी कार्यशैली से जुड़ा है. उनका कहना है कि अजय राय औपचारिकताओं से ज्यादा जमीनी राजनीति पर जोर देते थे. वह कार्यकर्ताओं को आगे रखने और सीधे जनता के बीच जाकर मुद्दे उठाने के पक्षधर थे. समर्थकों के मुताबिक, अजय राय सरकार के खिलाफ खुलकर बोलते थे और पार्टी के हित को प्राथमिकता देते थे. उनका आरोप है कि उनकी यही मुखर शैली पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को पसंद नहीं आई.

विरोधियों के दो सवाल: संगठन कहां है और सपा से टकराव क्यों?

4. तीन साल में बूथ स्तर पर संगठन क्यों नहीं खड़ा हुआ?

अजय राय के विरोधियों का पहला सवाल प्रदेश कांग्रेस के संगठन को लेकर है. एक जमाने में कांग्रेस के बड़े नेता रहे और अजय राय की वजह से पार्टी छोड़कर बीजेपी में गए राजेश मिश्रा ने TV9 डिजिटल से बातचीत में दावा किया कि अजय राय करीब तीन साल तक प्रदेश अध्यक्ष रहे, लेकिन इस दौरान कांग्रेस जमीन पर मजबूत संगठन खड़ा नहीं कर पाई.

राजेश मिश्रा के मुताबिक, कांग्रेस का संगठन बूथ स्तर तक प्रभावी रूप से दिखाई नहीं देता और अजय राय मीडिया में बयान देने तक सीमित रहे. यह उनके विरोधी का राजनीतिक आकलन है. संगठन की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए पार्टी की बूथ समितियों, जिला इकाइयों, सदस्यता और चुनावी प्रदर्शन के आंकड़ों को भी देखना होगा.

5. अखिलेश यादव से टकराव ने कांग्रेससपा के रिश्ते बिगाड़े?

अजय राय के विरोधियों का दूसरा आरोप समाजवादी पार्टी के साथ उनके संबंधों को लेकर है. उनका दावा है कि अखिलेश यादव के साथ व्यक्तिगत मतभेदों के कारण अजय राय कई बार बीजेपी से ज्यादा सपा पर हमलावर दिखाई दिए. इससे कांग्रेस और सपा के बीच राजनीतिक तालमेल प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ा था. ऐसे में दोनों दलों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बनी रहती है. विरोधियों का तर्क है कि अजय राय की बयानबाजी गठबंधन के रिश्तों के अनुकूल नहीं थी और इससे पार्टी नेतृत्व के सामने मुश्किलें पैदा हो सकती थीं.

कांग्रेस छोड़ेंगे या पार्टी में ही रहेंगे अजय राय?

प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने और लखनऊ मुख्यालय के विवाद के बाद अजय राय के अगले कदम पर नजर है. उनके करीबियों के मुताबिक, वह फिलहाल कांग्रेस में बने रहना चाहते हैं और बीजेपी में वापसी की संभावना से इनकार करते हैं. सपा और बसपा में जाने की चर्चा को भी उनके समर्थक खारिज करते हैं. अजय राय आज दिल्ली गए हैं, जहां उनकी राहुल गांधी समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात प्रस्तावित बताई जा रही है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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