देशभर के अलगअलग हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज होती जा रही है. विपक्ष हो या कॉकरोच जनता पार्टी, दोनों अपनी मांग पर अड़ी हैं. इस बीच केरलम विधानसभा ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया है. यह अपने आप में पहला ऐसा प्रस्ताव है. इस पर भाजपा ने तंज कसते हुए कहा है कि क्या कांग्रेस की जीत गैरकानूनी थी.

अब सवाल है कि जब भारतीय संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की एक प्रक्रिया तय है तो क्या केरलम विधानसभा के प्रस्ताव पारित करने से क्या फर्क पड़ेगा, इस प्रस्ताव को लाने का मतलब क्या है और मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे पद से हटाया जाता है? आइए एक्सपर्ट से समझते हैं.
केरलम विधानसभा के प्रस्ताव का मतलब
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के वकील उमेश शर्मा का कहना है, केरल विधानसभा का प्रस्ताव मुख्य रूप से एक राजनीतिक और संस्थागत बयान है. इसका मकसद चुनाव आयोग के कामकाज को जनता की नजर में लाना और केंद्र सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव डालना है. इसमें वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों पर राज्य विधानसभा की आपत्तियां भी दर्ज की गई हैं.
हालांकि, इस प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की कोई शक्ति नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत दी गई प्रक्रिया का पालन करना होगा. जिसमें संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है. इसलिए, इस कदम का राजनीतिक महत्व तो है, लेकिन ज्ञानेश कुमार के पद पर इसका कोई तत्काल कानूनी असर नहीं होगा.
केरल विधानसभा.
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाते हैं?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट शशांक तिवारी कहते हैं, संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में राज्य विधानसभा की कोई भूमिका ही नहीं है. इसलिए यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने रहेंगे.
भारतीय संविधान.
दूसरा सवाल यह कि अगर कानूनी असर नहीं है, तो फिर ऐसा प्रस्ताव पारित क्यों किया जाता है? दरअसल, ऐसे प्रस्ताव राजनीतिक और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का माध्यम होते हैं. इनका मकसद संसद और जनता का ध्यान किसी मुद्दे की ओर खींचना होता है. प्रस्ताव पास करना विधानसभा के अधिकार में है, लेकिन उसे मानना किसी के लिए ज़रूरी नहीं है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार
तीसरा सवाल यह कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ महाभियोग से हटाया जा सकता है? हां, मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में अनुच्छेद 324 के साथ अनुच्छेद 124 की प्रक्रिया लागू होती है जो कहता है की ‘सिद्ध कदाचार या अक्षमता’ के आधार पर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए, जिसका अर्थ है सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दोतिहाई बहुमत. इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं. यही व्यवस्था मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 11 में भी दिखाई देती है. इसके अलावा, पदधारी चाहें तो स्वयं इस्तीफ़ा देकर पद छोड़ सकते हैं.