भारतीय शेयर बाजार में पिछले दो सालों का दौर निवेशकों के लिए आसान नहीं रहा है. एकमुश्त रकम लगाने वाले निवेशकों को नुकसान झेलना पड़ा है, जबकि एसआईपी के जरिए पैसा लगाने वालों को भी बेहद मामूली रिटर्न मिला है. इस सुस्त माहौल के बीच आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर व सीआईओ एस नरेन ने बाजार की जमीनी हकीकत सामने रखी है. उनका कहना है कि इस समय पूरी दुनिया में अमेरिकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एकतरफा तेजी हावी है. इसी वजह से भारत जैसे विकासशील बाजारों से विदेशी पूंजी खिंचकर उधर जा रही है. लेकिन ये स्थिति हमेशा ऐसी ही नहीं रहेगी. जैसे ही अमेरिकी कंपनियों का ये एआई बूम सुस्त पड़ेगा, विदेशी निवेशकों की नजरें एक बार फिर मजबूत आर्थिक विकास वाले भारत पर टिक जाएंगी.

अमेरिकी एआई बूम के असर से बदले ग्लोबल हालात
वैश्विक स्तर पर शेयर बाजार इस वक्त काफी महंगे दौर में कारोबार कर रहे हैं. इतिहास गवाह है कि जब बाजार जरूरत से ज्यादा महंगे हो जाते हैं, तो उनमें कभी न कभी गिरावट या करेक्शन आना तय होता है. एस नरेन का मानना है कि दुनिया भर का बड़ा निवेश इस समय अमेरिका के एआई सेक्टर की तरफ लगा हुआ है. इसके साथ ही दुनिया में कई जगह तनाव भी बना हुआ है. यही वजह है कि भारत समेत कई उभरते बाजारों में विदेशी निवेशक खुलकर खरीदारी नहीं कर पा रहे हैं. ये दबाव सिर्फ भारत पर ही नहीं है, बल्कि ताइवान और कोरिया जैसे बड़े बाजारों से भी विदेशी पैसा बाहर निकला है. अगर अमेरिकी एआई सेक्टर की ये रफ्तार ऐसे ही जारी रही, तो भारतीय बाजार पर कुछ समय और दबाव बना रह सकता है. लेकिन जैसे ही वहां रफ्तार थमेगी, भारत में विदेशी निवेशकों का रुझान तेजी से पलटेगा.
आईपीओ की भारी भीड़, स्मॉलकैप में बढ़ता फ्लो
शेयर बाजार में इस समय नए आईपीओ की मानो बाढ़ आई हुई है. नरेन ने इस ट्रेंड पर सतर्क करते हुए कहा कि कई नए आईपीओ बाजार की पुरानी और जमीजमाई कंपनियों के मुकाबले काफी ज्यादा कीमत पर आ रहे हैं. ऐसा लगता है कि मुख्य बाजार के मुकाबले आईपीओ में कहीं बड़ा बुल रन चल रहा है. वहीं दूसरी तरफ स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों को लेकर भी उन्होंने यही राय रखी है. इन कंपनियों में निवेशकों का पैसा लगातार आ रहा है, जिसकी वजह से इनके शेयर अब सस्ते नहीं बचे हैं. हालांकि ये भी सच है कि इनमें से कई कंपनियां तेजी से बढ़ रही हैं और कुछ की रफ्तार तो लार्जकैप कंपनियों से भी तेज है, लेकिन बहुत महंगे भाव पर सिर्फ उम्मीदों के सहारे बने रहना जोखिम भरा हो सकता है.
प्राइवेट बैंक, इंश्योरेंस सेक्टर में निवेश के मौके
मौजूदा माहौल में नरेन कॉन्ट्रेरियन निवेश की रणनीति पसंद कर रहे हैं, यानी उन सेक्टरों पर दांव लगाना जो अभी शांत हैं लेकिन मजबूत हैं. उनका कहना है कि जिन सेक्टरों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है और जो पीछे छूट गए हैं, उनके बीच का फासला काफी बढ़ चुका है. इस समय प्राइवेट सेक्टर के बैंकों में ग्रोथ को लेकर कोई रुकावट नहीं दिख रही है. इसके साथ ही इंश्योरेंस सेक्टर भी काफी आकर्षक नजर आ रहा है. हाल के दिनों में इंश्योरेंस सेक्टर के लिए जो नए नियम सामने आए हैं, वे लंबी अवधि में इस कारोबार को बड़ा सहारा देंगे. म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का अनुभव यही बताता है कि जब भी नियम ग्राहकों के भले के लिए बनते हैं, तो पूरा उद्योग तेजी से बढ़ता है. इसके उलट आईटी और एफएमसीजी सेक्टर में अभी कंपनियों की ग्रोथ एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विदेशी निवेशकों की वापसी काफी हद तक अमेरिकी ब्याज दरों पर टिकी है. अमेरिका के सरकारी बॉन्ड में अभी बिना किसी करेंसी रिस्क के 5.3 से 5.5 फीसदी का शानदार ब्याज मिल रहा है. जब तक दुनिया में ब्याज दरें घटने का माहौल नहीं बनेगा, तब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों का बड़ा पैसा भारत लौटना मुश्किल है. हालांकि नरेन का मानना है कि अमेरिकी ब्याज दरें अब अपनी ऊंचाई के बेहद करीब हैं और शायद एक या दो बढ़ोतरी के बाद ये सिलसिला थम जाएगा.
ऐसे माहौल में आम निवेशकों को क्या करना चाहिए? नरेन की दो टूक सलाह है कि सिर्फ किसी एक सेक्टर या सिर्फ इक्विटी के पीछे भागने के बजाय एसेट एलोकेशन पर ध्यान दें. सोने को अपने पोर्टफोलियो में जरूर शामिल रखें, क्योंकि ये उतारचढ़ाव में सहारा देता है. साथ ही, विदेशी बाजारों में सिर्फ हालिया रिटर्न देखकर पैसा लगाने की होड़ से बचें. जब कोई बाजार पहले ही बहुत ज्यादा बढ़ चुका होता है, तब वहां नए सिरे से पैसा झोंकना सबसे ज्यादा जोखिम भरा साबित हो सकता है.