उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने एक बार फिर अपना प्रदेश अध्यक्ष बदल दिया है. हालांकि इस बदलाव से चुनाव में पार्टी की संभावनाओं पर किसी खास असर की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. पिछले कई चुनावों में उत्तर प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष बदलते रहे हैं, लेकिन चुनाव दर चुनाव नतीजों ने पार्टी को निराश किया. 2027 के विधानसभा चुनाव के चंद महीने पहले आराधना मिश्रा पर पार्टी ने भरोसा जताया है. 2007 में रीता बहुगुणा प्रदेश अध्यक्ष थीं. 2012 में निर्मल खत्री को आगे किया गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में राज बब्बर अध्यक्ष थे. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को अजय कुमार लल्लू से उम्मीद थी. 2022 में बृजलाल खाबरी और 2024 के लोकसभा चुनाव के समय प्रदेश की कमान अजय राय के हाथों में थी.

घटती गईं लोकसभा की सीटें
उत्तर प्रदेशदेश का सबसे बड़ा राज्य है. लोकसभा में उसकी अस्सी सीटें हैं. माना जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है. 1984 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 85 में 83 सीटें कांग्रेस ने जीतीं थीं, लेकिन 1989 में तस्वीर बदल गई. कांग्रेस प्रदेश की 15 सीटों पर सिमट गई. 1991और 1996 में सीटें घटकर पांच पर पहुंच गई. 1998 में पार्टी का खाता नहीं खुला.
1999 में सोनिया गांधी के सक्रिय होने के बाद यह संख्या दस थी. 2004 में पार्टी को नौ, 2009 में इक्कीस , 2014 में दो , 2019 में एक और 2024 में छह सीटें हासिल हुईं थीं. 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने सपा से गठबंधन में लड़ा था. उसे इसका फायदा भी मिला था. अटकलें इस बार भी दोनों पार्टियों के गठबंधन की है, लेकिन कांग्रेस लगभग डेढ़ सौ सीटों पर लड़ना चाहती है. क्या सपा अपने प्रभाव क्षेत्र के एक मात्र राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से इतनी बड़ी हिस्सेदारी करना चाहेगी ?
1989 से उत्तर प्रदेश की सत्ता से दूर
कांग्रेस की सीटों की मांग 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के आधार पर है. सपा के साथ गठबंधन में इस चुनाव में कांग्रेस ने छह सीटें जीतींं थीं. प्रदेश में 1989 से कांग्रेस सत्ता से दूर है. राज्य में पार्टी के शिखर राजनीतिक परिवार के सदस्यों सोनिया, राहुल और प्रियंका की मौजूदगी और सक्रियता के बाद भी चुनाव दर चुनाव पार्टी पिछड़ती चली गईं. 1989 से 1996 तक अविभाजित उत्तर प्रदेश की विधानसभा की सदस्य संख्या 425 थी. कांग्रेस को 1989 में 94 , 1991 में 46 ,1993 में 28 और 1996 में 33 सीटें हासिल हुईं थीं. 2000 में अलग राज्य उत्तराखंड बन जाने के बाद विधानसभा की सदस्य संख्या 403 रह गई. 2002 के चुनाव में कांग्रेस को 25, 2007 में 22 , 2012 में 28 , 2017 में 7 और 2022 में सिर्फ 2 सीटें प्राप्त हुईं. इन दो सीटों में एक रामपुर खास से आराधना मिश्र, जिन्हें पार्टी ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी है. उन्होंने लगातार तीसरी बार इस सीट जीत दर्ज की है. असलियत में यह सीट उनके पिता प्रमोद तिवारी के प्रभाव की है, जिस पर 1980 से लगातार उनका वर्चस्व रहा. फिलहाल प्रमोद तिवारी राज्य सभा के सदस्य हैं.
प्रियंका का जादू नहीं चला
राहुलप्रियंका की मौजूदगी और सक्रियता वाले राज्य में पार्टी की प्रदेश की कमान किसके हाथों में है, यह सवाल खास मायने नहीं रखता है. प्रियंका के रायबरेली और अमेठी तक सीमित रहने के दौरान पार्टी के कार्यकर्ता उन्हें करिश्माई चेहरा मानते थे. जोर शोर से उनकी अन्य क्षेत्रों में भी मांग होती थी. 2019 में प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया गया. इस साल हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को इकलौती कामयाबी रायबरेली में सोनिया गांधी की जीत के जरिए मिली थी. इस चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी हार गए थे. 2019 के चुनाव के चंद महीने पहले प्रियंका मैदान में आईं थीं. इसलिए उम्मीद की गई कि आगे जब वे पूरी जिम्मेदारी लेंगी तो पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है.
2022 में 399 में 387 पर जमानत जब्त
2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रियंका गांधी वाड्रा की लोकप्रियता की असली परीक्षा था. उन्होंने चुनाव अभियान की अगुवाई की. महिलाओं को केंद्र में रखकर लड़की हूं, लड़ सकती हूं का नारा दिया. लगभग 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का बड़ा फैसला लिया. व्यापक चुनाव प्रचार किया. इस बड़े चुनावी अभियान के नतीजे कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक रहे. पार्टी ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. केवल दो सीटें जीतीं. महज चार उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे. छह ऐसे थे जो तीसरे या अन्य स्थान पर थे, लेकिन जमानत बचाने में सफल रहे. 387 की जमानत जब्त हुई. पार्टी को सिर्फ 2.33 फीसद वोट हासिल हुए.
बिना सहयोगी लाचार
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों का साफ संदेश था कि फिलहाल कांग्रेस अपने बूते किसी खास कामयाबी की हालत में नहीं है. उसे कामचलाऊ प्रदर्शन के लिए भी सहयोगी की बैसाखी की जरूरत है. 2017 का विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव इसकी पुष्टि करते हैं. इन दोनों चुनावों में पार्टी का सपा से गठबंधन था. 2017 में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ रहते 114 सीटों पर चुनाव लड़ा. उसे कुल 54,16,540 वोट यानी 6.25 प्रतिशत मत मिले और सात सीटें हासिल हुईं थीं. दूसरी ओर 2022 में जब पार्टी अकेले मैदान में उतरी तो उसके 399 उम्मीदवारों के कुल वोटों का जोड़ 21,51,234 यानी 2.33 फीसद था. 2022 के परिणाम कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में उसके चुनावी इतिहास का सबसे कमजोर प्रदर्शन था. सपा से गठबंधन कांग्रेस के लिए कितना मुफीद रहता है, इसे 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों के जरिए समझा जा सकता है. सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में कांग्रेस को 17 सीटों पर लड़ने का अवसर दिया. कांग्रेस को 6 पर सफलता मिली. उसके सत्रह प्रत्याशियों को कुल 83,15,527 अर्थात 9.46% फीसद वोट हासिल हुए.
सपा को चाहिए कमजोर कांग्रेस का साथ
सपा अभी भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन कांग्रेस से उसके दिल्ली जैसे रिश्ते लखनऊ में नजर नहीं आते, हालांकि संकेत दोनों ओर से 2027 के चुनाव गठबंधन में लड़ने के हैं, लेकिन सीटों की हिस्सेदारी को लेकर खींचतान है. कांग्रेस लगभग डेढ़ सौ सीटों पर लड़ना चाहती है. सपा इतनी उदारता के लिए तैयार नहीं दिखती. सपा को भाजपा को हराना है. वोटों का बिखराव रोकने के लिए वह कांग्रेस का साथ चाहेगी, लेकिन प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने का खतरा उठाने को सपा तैयार नहीं है. उसके वोट बैंक का बड़ा हिस्सा कभी कांग्रेस की पूंजी थी. अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत और उसमें जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन करके प्रतिद्वंद्वी भाजपा से ज्यादा सहयोगी कांग्रेस को अपनी ताकत का संदेश दिया. कांग्रेस को अखिलेश की पहल चुभी. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा , हम भी सैफई, कन्नौज जा सकते हैं. शिवपाल यादव ने पलटवार में कहा जा सकते हैं लेकिन कांग्रेस को वोट नहीं मिलेंगे.
राहुलप्रियंका की 2027 में एक और परीक्षा
सपा से गठबंधन की संभावनाओं के बीच कांग्रेस विपरीत हालात के लिए खुद को तैयार कर रही है. पार्टी फिर से अपना खोया जनाधार वापस चाहती है. उत्तर प्रदेश की राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग साधने के लिए उसने दलित राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी बना रखा है. ब्राह्मणों को लुभाने के लिए अब आराधना मिश्रा मोना को आगे किया है. प्रदेश में मुस्लिम वोटर आमतौर पर सपा के साथ रहता है, लेकिन कांग्रेस ने सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बना, मुस्लिमों की वापसी की उम्मीद लगाई है.
कुछ अन्य पदाधिकारियों के बदलाव में भी जातीय गणित का ख्याल रखा है. क्या प्रदेश संगठन में बदलाव कांग्रेस को कुछ ताकत दे पाएगा? पिछले कुछ प्रदेश अध्यक्षों के कार्यकाल के नतीजे उत्साहप्रद संकेत नहीं देते. 2007 में रीता बहुगुणा जोशी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 22 विधानसभा सीटें और 8.61 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे.
2012 में निर्मल खत्री के दौर में सीटें बढ़कर 28 हुईं. वोट प्रतिशत 11.65 तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद गिरावट तेज हुई. 2017 में राज बब्बर के नेतृत्व में कांग्रेस सात सीटों पर सिमट गई. 2022 के चुनाव के समय अजय कुमार लल्लू प्रदेश अध्यक्ष थे. पार्टी घटकर दो सीटों पर पहुंच गई। प्रदेश अध्यक्षों की सूची लंबी है. असली सवाल है कि कांग्रेस को जरूरत प्रदेश अध्यक्ष के नए चेहरे की है या बीमारी उससे कहीं अधिक गहरी है? वोटर को पता है कि कांग्रेस का चेहरा कौन है ? 2027 में उसके सामने आराधना मिश्रा का नहीं बल्कि राहुल प्रियंका के चेहरे एक बार फिर होंगे. सफलता की दशा में जीत उनकी. असफलता मिली तो एक और नए प्रदेश अध्यक्ष की खोज शुरू होगी.