ईरान युद्ध का असर दुनिया के पेट्रोलडीजल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है. कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ने से कई देशों में पेट्रोल की कीमतों में तेज उछाल आया है, लेकिन इस ग्लोबल संकट के बीच भारत में पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी कई दूसरे देशों की तुलना में कम रही है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पेट्रोल की कीमत करीब 8% बढ़ी है, जबकि चीन में 17%, रूस में 13% और अमेरिका में करीब 49% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. सवाल है कि कच्चा तेल दुनिया भर में महंगा होने के बावजूद भारत में इसका असर इतना कम क्यों दिखा?

इसकी सबसे बड़ी वजह सरकार की फ्यूल प्राइस पॉलिसी रही है. भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत में कच्चे तेल के अलावा एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकारों का वैट और दूसरे चार्ज शामिल होते हैं. ऐसे में जब इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड महंगा हुआ, तो सरकार ने टैक्स के जरिए बढ़ते बोझ का कुछ हिस्सा खुद उठाने की कोशिश की. मार्च 2026 में कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. सरकार ने 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाकर सरकारी तेल कंपनियों की बढ़ी हुई लागत और अंडररिकवरी का कुछ भार कम किया.
कितना बढ़ा है पेट्रोल का रेट
भारत ने डायवर्सिफाई किया रूट
भारत को दूसरा फायदा अपने क्रूड सप्लाई स्रोतों से मिला. रूस लंबे समय से भारत के लिए बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है. ईरान युद्ध के बाद जब मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी, तब भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई. जून और जुलाई में भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी क्रूड खरीदा. जुलाई 2026 में रूस से भारत का क्रूड इंपोर्ट रिकॉर्ड स्तर के आसपास पहुंच गया था. उस समय रूसी तेल पर डिस्काउंट भी मिला, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसकी खरीद आकर्षक रही. इसके अलावा भारत ने यूएई और अमेरिका से भी तेल खरीदना शुरू किया. यही नहीं देश ने गैस के लिए भी अमेरिका पर निर्भरता काफी बढ़ाई है. एलपीजी सप्लाई का बूम रिकॉर्ड रहा है.
भारत के पास अपनी रिफाइनिंग क्षमता भी है
भारत सिर्फ कच्चा तेल खरीदकर सीधे इस्तेमाल नहीं करता. देश में बड़ी रिफाइनरियां क्रूड को पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट में बदलती हैं. इससे भारत के पास ग्लोबल सप्लाई में बदलाव के बीच फ्यूल मैनेजमेंट की कुछ अतिरिक्त गुंजाइश रहती है. यही वजह है कि भारत जरूरत के हिसाब से अलगअलग देशों से क्रूड खरीद सकता है और घरेलू जरूरत के लिए पेट्रोलडीजल उपलब्ध रख सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत युद्ध के असर से पूरी तरह सुरक्षित है. भारत अपनी जरूरत के करीब 90% कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए लंबे समय तक महंगा क्रूड रहने पर इंपोर्ट बिल और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है. मगर रिफाइनिंग मजबूत होना उसे डैमेज कंट्रोल करने में मदद करता है.
अमेरिका में इतना ज्यादा असर क्यों?
अब सवाल यह भी है कि जब भारत में तेल के दाम में सिर्फ 8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है तो अमेरिका में करीब 50 फीसदी दाम क्यों बढ़ गए? भारत की फ्यूल प्राइस व्यवस्था काफी अलग है. अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैसोलीन उत्पादक देश है, लेकिन वहां पेट्रोल की कीमतें ग्लोबल क्रूड मार्केट से प्रभावित होती हैं.
Axios के मुताबिक अमेरिकी संघीय सरकार ने खुदरा पेट्रोल कीमतों पर भारत जैसी कीमत सीमा या सब्सिडी व्यवस्था लागू नहीं की है. इसलिए क्रूड और रिफाइंड फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिकी ग्राहकों तक ज्यादा सीधे पहुंच सकता है. इसके अलावा रूस में यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचने की वजह से मोटर फ्यूल, खासकर डीजल की सप्लाई पर भी असर पड़ा है. इससे वहां फ्यूल मार्केट पर अलग से दबाव बना है.
चीन और पाकिस्तान पर ज्यादा दबाव
पाकिस्तान जैसे देश जहां ईंधन के लिए आयात पर काफी निर्भरता है, वहां ग्लोबल सप्लाई संकट का असर ज्यादा तेजी से दिखाई दे सकता है. चीन में भी पेट्रोल की कीमतों में भारत की तुलना में ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. Axios के मुताबिक, अलगअलग देशों में फ्यूल कीमतों की बढ़ोतरी एक जैसी नहीं है और आयात पर निर्भर देशों में दबाव ज्यादा हो सकता है. हालांकि, भारत के लिए भी खतरा खत्म नहीं हुआ है. अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों से सप्लाई प्रभावित रहती है और रूस से मिलने वाला डिस्काउंट कम होता है, तो भारत के लिए सस्ता क्रूड हासिल करना मुश्किल हो सकता है.
इससे आगे चलकर पेट्रोलडीजल की कीमतों, महंगाई और सरकार के बजट पर दबाव बढ़ सकता है. यानी अभी भारत में पेट्रोल के दामों की बढ़ोतरी कम दिखने के पीछे सरकारी टैक्स राहत, फ्यूल कीमतों को नियंत्रित रखने की नीति, रूसी तेल की खरीद और मजबूत रिफाइनिंग क्षमता जैसे कई कारण हैं, लेकिन ग्लोबल क्रूड महंगा बना रहा तो भारत भी इससे लंबे समय तक पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता है.