26 जनवरी 1950 की सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर दिल्ली के गवर्नमेंट हाउस के गुंबदनुमा दरबार हॉल में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गणतंत्र की घोषणा पढ़ी और चुपचाप अपना पद छोड़ दिया. वे भारत के आखिरी गवर्नरजनरल थे. कुछ ही मिनट बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने शपथ ली और देश के पहले राष्ट्रपति बने. इस मौके पर 31 तोपों की सलामी दी गई.

हर साल गणतंत्र दिवस पर हम इसी पल का जश्न मनाते हैं. लेकिन एक सवाल अक्सर अनछुआ रह जाता है. जब भारत 15 अगस्त 1947 को ही आजाद हो चुका था, तो ढाई साल बाद उस जनवरी की सुबह असल में क्या बदला?
आज़ाद था, लेकिन गणराज्य नहीं
साफ जवाब यह है कि बदलाव इस बात में आया कि भारत आखिरकार किसके प्रति जवाबदेह है. 1947 से 1950 के बीच भारत स्वतंत्र तो था, पर गणराज्य नहीं. उस दौर में उसका दर्जा “डोमिनियन” का था, यानी स्वशासित देश, लेकिन औपचारिक रूप से संवैधानिक राजतंत्र. कागजों में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्ठम ही भारत के भी राजा थे. उनके प्रतिनिधि के रूप में पहले लॉर्ड माउंटबेटन और फिर राजगोपालाचारी गवर्नरजनरल रहे.
देश का कामकाज तब तक गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के तहत चल रहा था. यह उसी औपनिवेशिक सरकार का बनाया कानून था, जिससे भारत आजादी पा चुका था. न भारत का अपना संविधान लागू था, न कोई भारतीय राष्ट्रपति था. औपचारिक रूप से अंतिम शब्द अब भी एक वंशानुगत ताज का था.
गणराज्य का असली मतलब
गणराज्य और राजतंत्र का फर्क यहीं समझ आता है. गणराज्य का मतलब आज़ादी नहीं है, वह भारत के पास पहले से थी. गणराज्य वह देश है जिसका सर्वोच्च पद विरासत में नहीं मिलता. वहां कोई सिर्फ़ इसलिए राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनता कि वह किस परिवार में जन्मा है. वह उस प्रक्रिया से इस पद तक पहुंचता है जिस पर जनता या उसके प्रतिनिधियों का नियंत्रण हो, चाहे वह चुनाव हो, नियुक्ति हो या संविधान के तय नियम. सिद्धांत रूप में उसे उसी तरह हटाया भी जा सकता है. राजतंत्र में सत्ता खून के रिश्ते से आगे बढ़ती है, गणराज्य में एक दस्तावेज़ से.
भारतीय संविधान.
संविधान लागू करने के लिए जानबूझकर इंतज़ार
संविधान सभा ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति के साथ मिलकर संविधान तैयार किया. इसे 26 नवंबर 1949 को अंगीकार कर लिया गया। इसके बाद भी इसे तुरंत पूरी तरह लागू नहीं किया गया. सभा ने दो महीने और इंतज़ार किया और 26 जनवरी को संविधान लागू किया.
यह तारीख यूं ही नहीं चुनी गई थी. 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में “पूर्ण स्वराज” दिवस मनाया गया था. कांग्रेस ने दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में रावी के किनारे पूर्ण स्वराज यानी संपूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य तय किया था. गणतंत्र के लिए उसी तारीख को चुनकर भारत ने ठीक बीस साल बाद वह चक्र पूरा किया.
ताज की जगह संविधान
उस सुबह के बाद संविधान ही देश की सर्वोच्च सत्ता बन गया. उसने पुराने औपनिवेशिक कानून और दूर बैठे ताज, दोनों की जगह ले ली. राजेंद्र प्रसाद संविधान द्वारा तय प्रक्रिया से राष्ट्रपति बने.
एक दिलचस्प बात यह भी है कि गणराज्य बनने के बाद भारत ने राष्ट्रमंडल में बने रहने का फैसला किया. इसके लिए 1949 में लंदन में हुए राष्ट्रमंडल सम्मेलन में एक समझौता हुआ. इसके तहत ब्रिटिश राजा को सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर “राष्ट्रमंडल का प्रमुख” माना गया, जबकि भारत पर उनका कोई संवैधानिक अधिकार नहीं रहा.
पंडित नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की रात अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था.
15 अगस्त और 26 जनवरी का फर्क
इस सबसे 15 अगस्त 1947 का महत्व कम नहीं होता. वह आज भी उस दिन के रूप में दर्ज है जब आज़ादी के आंदोलन की मूल मांग पूरी हुई. लेकिन 26 जनवरी 1950 ने एक ज़्यादा बुनियादी सवाल का जवाब दिया. अंग्रेज़ों के जाने के बाद आज़ादी किससे, और शासन किसके अनुसार? भारत ने खुद को जो जवाब दिया, वह था लिखित संविधान और निर्वाचित राष्ट्रपति पद, न कि अपनी पसंद का कोई नया राजा.
परेड के पीछे का असली संदेश
गणतंत्र दिवस की परेड में टैंक, लोक नर्तक और फ्लाईपास्ट में उड़ते लड़ाकू विमान देखकर उस असली मकसद को भूल जाना आसान है जिसे यह दिन दर्शाता है. यह परेड सिर्फ़ इस बात का जश्न नहीं कि भारत आज़ाद है. यह उस बात का जश्न है जो शांत है, पर शायद उससे कठिन कमाई है. इस दिन भारत में सत्ता का स्रोत ताज नहीं रहा, बल्कि वह दस्तावेज़ बना जिसकी शुरुआत “हम, भारत के लोग” से होती है.
अगली बार जब 26 जनवरी आए, तो बैंड की धुनों के बीच यह सवाल खुद से पूछना भी सार्थक होगा कि 1950 में किया गया वह वादा आज रोज़मर्रा के जीवन में कितना साकार है.