मृत्यु के बाद इंसान के साथ क्या होता है? क्या शरीर छूट जाने के बाद भी भूखप्यास का अनुभव होता है? श्राद्ध और तर्पण के दौरान अन्नपानी अर्पित करने की परंपरा के पीछे क्या वजह है? ये वो सवाल हैं जो अक्सर लोगों के मन में उठते हैं. हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण के जरिए ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर स्वयं भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ से हुए संवाद में दिए हैं. आज हम मृत्यु के बाद किए जाने वाले पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण के पीछे की वजह जानते हैं.
गरुड़ पुराण में बताई है भूखप्यास की वजह
गरुड़ पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद जब जीव अपना शरीर छोड़कर यममार्ग की कठिन यात्रा पर निकलता है तो उसे भूखप्यास लगती है. उसे इस यात्रा को पूरा करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है, जो उसे परिजनों द्वारा किए गए पिंडदान से मिलती है. इसलिए मरने के बाद 10 दिनों तक दिया जाने वाले पिंड आत्मा को यमलोक तक का लंबा रास्ता पार करने की शक्ति देता है. इसलिए मरने के बाद 13 दिनों तक रोजाना ये अनुष्ठान परिजनों द्वारा किए जाते हैं.
इतना ही नहीं गरुड़ पुराण के अनुसार, 13वीं के बाद भी पितृलोक में गए पितरों को तृप्ति की जरूरत होती है इसलिए पितृ पक्ष में भी परिजन मृतक की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, ये अनुष्ठान पितरों की आत्मा की शांति के साथसाथ उनका ऋण चुकाने और उनकी आगे की यात्रा को आसान बनाने के लिए किए जाते हैं.
क्या है श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान?
श्राद्ध : ‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है, इसका मतलब है अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार जताना है. गरुड़ पुराण में दिए गए वर्णन के अनुसार, श्राद्ध के जरिए पितरों के लिए जो भोजन या अन्न निकाला जाता है वह सूक्ष्म रूप में पूर्वजों को पूरे साल तृप्त करता रहता है. जिससे वे प्रसन्न होकर परिवार को सुख, शांति, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.
तर्पण : तर्पण भी पितरों की तृप्ति के लिए किया जाता है. कुश, काले तिल और जौ को हाथों में लेकर पितरों को जल के साथ अर्पित किया जाता है. गरुड़ पुराण के अनुसार इस तरीके से अर्पित किया गया जल पितरों की प्यास बुझाता है.
पिंडदान : गया, हरिद्वार, प्रयाग आदि तीर्थों पर जाकर आत्मा की मोक्ष प्राप्ति या आगे की यात्रा को आसान बनाने के लिए पिंडदान किया जाता है. ताकि मृत आत्मा भौतिक बंधनों और मोह से मुक्त हो सके. कई जगहों पर ऐसी मान्यता है कि जिस पूर्वज या मृतक का पिंडदान हो जाता है उसका श्राद्ध और तर्पण करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है.