मध्य पूर्व में हालिया भूराजनीतिक अस्थिरता और ईरानअमेरिका युद्ध के कारण उत्पन्न हुए वैश्विक ऊर्जा संकट ने भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल ढुलाई में उत्पन्न कठिनाइयों ने भारत को आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। वर्तमान में भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का केवल 10 प्रतिशत ही घरेलू स्रोतों से पूरा कर पाता है, जबकि शेष 90 प्रतिशत के लिए उसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। 2011 की तुलना में घरेलू तेल उत्पादन में लगभग आधी गिरावट दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र में तत्काल सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

इस ऊर्जा चुनौती का सामना करने के लिए केंद्र सरकार ने एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की है, जिसके तहत घरेलू तेल अन्वेषण गतिविधियों को बड़े पैमाने पर विस्तारित किया जाएगा। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, सरकार अब देश के उन 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज शुरू करेगी, जहाँ अभी तक कोई अन्वेषण कार्य नहीं किया गया है। इन नए इलाकों में व्यापक सर्वेक्षण और ड्रिलिंग की जाएगी ताकि घरेलू आपूर्ति में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सके। इस महात्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार ने 10 अरब डॉलर यानी लगभग 95,000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है।
इस योजना के तहत भारत सरकार ने ‘समुद्र मंथन’ यानी नेशनल डीप वाटर एक्सप्लोरेशन मिशन को गति देने का निर्णय लिया है। सरकार की विशेष नजर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के समुद्री क्षेत्रों पर है, जहाँ भूगर्भीय संकेतों के अनुसार तेल और गैस के असीमित भंडार होने की प्रबल संभावना है। हाल ही में जून महीने में वहां एक कुएं की टेस्टिंग के दौरान गैस की लपटें जलती देखी गई थीं, जिसने सरकार के इस विश्वास को और अधिक पुष्ट कर दिया है। चूंकि समुद्र की अत्यधिक गहराइयों से तेल निकालना एक अत्यंत जटिल और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण कार्य है, इसलिए भारत सरकार ने वैश्विक तेल दिग्गज कंपनियों जैसे एक्सॉनमोबिल, शेल और बीपी के साथ रणनीतिक साझेदारी की है। इन कंपनियों की विशेषज्ञता और अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर भारत अपने गहरे समुद्री भंडारों का दोहन सुनिश्चित करेगा।
भारत की तेल मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है, जो 2021 के दैनिक 50 लाख बैरल से बढ़कर वर्तमान में 56 लाख बैरल तक पहुंच गई है और जल्द ही 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए केवल आयात पर निर्भर रहना आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से जोखिम भरा है। ईरानअमेरिका तनाव के दौरान भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता दिखाते हुए तेल आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 27 से बढ़ाकर 41 कर दी थी, जिसमें रूस, ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीद शामिल रही। हालांकि, लंबी अवधि के लिए घरेलू अन्वेषण ही ऊर्जा सुरक्षा का एकमात्र स्थायी समाधान है। यह मिशन न केवल भारत की आयात निर्भरता को कम करेगा, बल्कि देश को भविष्य के किसी भी वैश्विक ऊर्जा संकट से सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।




