बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के साप्ताहिक डेरिवेटिव्स एक्सपायरी के दिन क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के दौरान भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त अस्थिरता देखने को मिली. गुरुवार को महज 2 मिनट के भीतर सेंसेक्स का इंडिकेटिव लेवल 2,137 अंक टूटकर 76,510 से 74,373 के निचले स्तर पर आ गया, जिसके तुरंत बाद 1,800 अंकों की तीखी रिकवरी हुई. इस तरह पलक झपकते ही इंडेक्स में करीब 4,000 अंकों का स्विंग दर्ज किया गया. 3 अगस्त से सेबी द्वारा लागू की गई नई CAS प्रणाली में लिक्विडिटी की भारी कमी, एकतरफा बड़े सेलिंग ऑर्डर्स और कैशडेरिवेटिव्स मार्केट के बेमेल टाइमिंग ने दलाल स्ट्रीट पर क्लोजिंग टाइम के दौरान अफरातफरी का माहौल बना दिया है.

वैसे सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा लागू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन प्रणाली अपने मूल उद्देश्य से भटकती दिख रही है. जिस प्रक्रिया को इंडेक्स में निष्पक्ष मूल्य खोज और अस्थिरता को कम करने के लिए लाया गया था, वही प्रणाली अब कम लिक्विडिटी, स्टॉपलॉस ऑर्डर्स के अभाव और कैश व डेरिवेटिव्स सेगमेंट की टाइमिंग में बेमेल के कारण अभूतपूर्व बिकवाली और ऑप्शन प्रीमियम में 500% तक के उछाल का कारण बन रही है. बाजार विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर निवेशकों के विश्वास को बनाए रखना है, तो सेबी और एक्सचेंजों को CAS फ्रेमवर्क को तुरंत रीसेट और पुनर्गठित करने की जरूरत है. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं…
CAS सिस्टम की कमियों से जुड़े पहलू
- महज 2 मिनट में 3,900 अंकों की उठापटक: एक्सपायरी के दिन दोपहर 3:18 बजे सेंसेक्स का इंडिकेटिव स्तर 76,510 था, जो 3:20 बजे तक 2,137 अंक गिरकर 74,373 पर आ गया. इसके बाद 1,800 अंकों की तेज रिकवरी हुई और अंततः सेंसेक्स 417 अंक की गिरावट के साथ 76,153 के स्तर पर बंद हुआ.
- ऑप्शन प्रीमियम में 500 फीसदी की तूफानी तेजी: 2 मिनट की इस गिरावट का असर डेरिवेटिव्स बाजार पर पड़ा, जहां सेंसेक्स के पुटऑप्शन के प्रीमियम कुछ ही मिनटों में 400 फीसदी से 500 फीसदी तक उछल गए.
- ऑर्डर बुक में लिक्विडिटी का सूखा: बीएसई के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन का अवरेज डेली टर्नओवर वॉल्यूम 54.34 करोड़ रुपए है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, खाली ऑर्डर बुक पर अचानक एक बड़ा मार्केट सेल ऑर्डर आने से शेयर सीधे सबसे निचले उपलब्ध बाइंग प्राइस पर गिर गए.
- स्टॉपलॉस का अभाव और टाइमिंग का बेमेल: CAS प्रोसेस के दौरान स्टॉपलॉस और आइसबर्ग ऑर्डर्स जैसे सेफ्टी टूल उपलब्ध नहीं रहते हैं. साथ ही, रेगुलर कैश मार्केट 3:15 बजे बंद हो जाता है जबकि इंडेक्स डेरिवेटिव्स 3:40 बजे तक चालू रहते हैं, जिससे मार्केट में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है.
- नीतिगत सुधार और सेबी के सामने विकल्प: सेबी को CAS के दौरान न्यूनतम लिक्विडिटी सीमा तय करनी चाहिए, क्लोजिंग ऑक्शन में स्टॉपलॉस मैकेनिज्म को लागू करना चाहिए और कैश तथा डेरिवेटिव्स सेगमेंट के बंद होने के समय में सामंजस्य स्थापित करना चाहिए.
कुछ ऐसा है सीएएस का खेल
- एल्गोरिदम का खेल: आधुनिक वित्तीय बाजारों में हाईफ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और एल्गोरिदम आधारित CAS सिस्टम पहले से तय स्टॉपलॉस और रिस्क थ्रेशोल्ड के आधार पर काम करते हैं. जैसे ही सेंसेक्स ने एक क्रिटिकल सपोर्ट लेवल तोड़ा, दुनिया भर के कंप्यूटरों ने मानवीय हस्तक्षेप के बिना खुदबखुद ऑटोसेल ऑर्डर की बौछार कर दी.
- मार्केट मेकर्स और लिक्विडिटी का अचानक गायब होना: 2 मिनट की इस सुनामी के दौरान बोली लगाने वाले पूरी तरह गायब हो गए. ऑटोमेटेड सेलिंग के अत्यधिक दबाव के कारण ऑर्डर बुक में लिक्विडिटी शून्य के करीब पहुंच गई, जिससे बड़े और मजबूत फंडामेंटल वाले दिग्गजों के शेयर भी बिना किसी बड़े खरीदार के गिर गए.
- ग्लोबल मैक्रो ट्रिगर्स का डोमिनो इफेक्ट: पश्चिम एशिया में बढ़ते भूराजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल बास्केट में आए उबाल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में अचानक उछाल ने अंतरराष्ट्रीय हेज फंडों के ऑटोमेटेड रिस्कऑफ मॉडल को एक्टिवेट किया, जिसका पहला निशाना भारतीय वायदा और कैश मार्केट बने.
खुदरा निवेशकों के लिए सबक
इतनी तीव्र गिरावट के बाद बाजार में निचले स्तरों से कुछ रिकवरी देखने को मिली, लेकिन इस घटना ने यह साबित कर दिया कि पैनिक में आकर पैनिकसेल करना रिटेल इनवेस्टर्स के लिए कितना नुकसानदेह हो सकता है. मार्केट रेगुलेटर SEBI और एक्सचेंज इस तरह के ‘फ्लैश क्रैश’ की जांच कर रहे हैं ताकि भविष्य में सर्किट लिमिट और अल्गोट्रेडिंग के सुरक्षा मानकों को और सख्त किया जा सके. यदि सेबी इस क्लोजिंग ऑक्शन सेशन फ्रेमवर्क में समय रहते आवश्यक नीतिगत बदलाव नहीं करता है, तो एल्गोरिदमबेस्ड यह सिस्टम फ्यूचर में भी बाजार के अंतिम मिनटों में निवेशकों के लिए अनिश्चितता और भारी वित्तीय नुकसान का कारण बनती रहेगी.