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₹62,500 करोड़ खर्च, ₹39 लाख करोड़ का उत्पादन… नई मोबाइल स्कीम से कैसे बदलेगी भारत की स्मार्टफोन इंडस्ट्री?​

केंद्र सरकार ने 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को नोटिफाई कर दिया है. इसका मकसद अगले पांच साल में भारत के मोबाइल फोन प्रोडक्शन को करीब 39 लाख करोड़ रुपये और एक्सपोर्ट को करीब 15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाना है. इससे करीब 60,000 डायरेक्ट रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. यह […]

केंद्र सरकार ने 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को नोटिफाई कर दिया है. इसका मकसद अगले पांच साल में भारत के मोबाइल फोन प्रोडक्शन को करीब 39 लाख करोड़ रुपये और एक्सपोर्ट को करीब 15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाना है. इससे करीब 60,000 डायरेक्ट रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. यह स्कीम अब सिर्फ भारत में फोन की असेंबलिंग पर फोकस नहीं करेगी. इसमें भारत में बने पार्ट्स, भारतीय IP, घरेलू डिजाइन, R&D और भारतीय मोबाइल ब्रांड्स को बढ़ावा दिया जाएगा.

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, 10 से 14 महीनों में यानी 2027 के मध्य तक भारत के पहले मजबूत और भारतीय मालिकाना हक वाले स्मार्टफोन ब्रांड सामने आ सकते हैं. एपल भी भारत में iPhone से आगे दूसरे प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ा सकता है. आइए इस स्कीम को डिटेल से समझते हैं. इसके सभी पहलुओं को जानते हैं.

39 लाख करोड़ रुपये का टारगेट

MPMS का बजट करीब 62,500 करोड़ रुपये है और यह 202627 से 203031 तक पांच वित्तीय वर्षों के लिए लागू होगी. यह 31 मार्च 2026 को खत्म हुई बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग की PLI स्कीम की जगह लेगी. सरकार का टारगेट पांच साल में मोबाइल फोन का कुल प्रोडक्शन करीब 39 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाना है. पिछली स्कीम में यह करीब 20 लाख करोड़ रुपये था. मोबाइल फोन एक्सपोर्ट का टारगेट भी करीब 15 लाख करोड़ रुपये रखा गया है, जो पिछली स्कीम के करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले लगभग दोगुना है.

दो कैटेगरी में मिलेगी मदद

MPMS में दो टारगेट कैटेगरी रखी गई हैं. TS1 के तहत बड़े मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज यानी EMS कंपनियों को शामिल किया गया है. इसके तहत 202728 में 2.75%, 202930 में 2.5% और 2031 में 2.25% इंसेंटिव मिलेगा. वहीं TS2 में भारतीय मालिकाना हक वाले मोबाइल ब्रांड्स को रखा गया है, जिनकी IP, डिजाइन और R&D भारत में हो. जो इसके लिए योग्य होंगे उन भारतीय ब्रांड्स को बिक्री पर 5% इंसेंटिव मिलेगा, जबकि भारतीय डिजाइन और R&D के लिए अतिरिक्त 3% इंसेंटिव का प्रावधान है. इसके अलावा प्रमुख पार्ट्स और सबअसेंबली की घरेलू सोर्सिंग पर 1.5% तक अतिरिक्त इंसेंटिव भी मिल सकता है.

फोन के पार्ट्स भी भारत में बनेंगे

स्कीम का बड़ा फोकस मोबाइल के पार्ट्स को भारत में बनाने पर है. इसमें डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मॉड्यूल, बॉडी, बैटरी, USB केबल और कनेक्टर जैसे पार्ट्स शामिल हैं. घरेलू सोर्सिंग का फायदा तभी मिलेगा, जब संबंधित पार्ट्स किसी कंपनी की ओर से एक वित्तीय वर्ष में बनाए गए कम से कम 25% मोबाइल फोन में इस्तेमाल किए जाएं. इसका मकसद सिर्फ फोन असेंबल करने के बजाय भारत में वैल्यू एडिशन बढ़ाना है. सरकार के मुताबिक भारत पहले ही करीब 2528% घरेलू वैल्यू एडिशन के स्तर को पार कर चुका है, जबकि विकसित मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी में यह करीब 3840% तक पहुंचा है.

भारतीय ब्रांड बनने के लिए क्या शर्तें?

  1. भारत में रजिस्टर्ड या इनकॉरपोरेटेड होना होगा.
  2. IP और ट्रेडमार्क भारत में होने चाहिए.
  3. मैनेजमेंट कंट्रोल भारतीय नागरिकों के पास होना चाहिए.
  4. 51% से ज्यादा भारतीय शेयरहोल्डिंग होनी चाहिए.
  5. भारत में अपनी डिजाइन और R&D क्षमता होनी चाहिए.
  6. 202526 में कम से कम 1,000 करोड़ रुपये का टर्नओवर होना चाहिए.

सरकार कंपनियों की डिजाइन और IP की जांच भी करेगी. यानी सिर्फ किसी विदेशी डिजाइन की कॉपी करके भारतीय ब्रांड का फायदा नहीं लिया जा सकेगा.

बड़ी कंपनियों के लिए 10,000 करोड़ रुपये का टर्नओवर जरूरी

TS1 में शामिल होने के लिए बड़े मोबाइल मैन्युफैक्चरर्स और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स का भारत में रजिस्टर्ड होना और 202526 में कम से कम 10,000 करोड़ रुपये का टर्नओवर होना जरूरी है. मौजूदा ब्रांड्स को 2026 की बिक्री के मुकाबले हर साल अतिरिक्त बिक्री का टारगेट भी पूरा करना होगा. यह टारगेट 2027 में 5,000 करोड़ रुपये, 2028 में 10,000 करोड़ रुपये, 2029 में 15,000 करोड़ रुपये, 2030 में 20,000 करोड़ रुपये और 2031 में 25,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त बिक्री का है. वहीं, नए ब्रांड को इस कैटेगरी में शामिल होने के लिए भारत में सालाना 10,000 करोड़ रुपये की बिक्री तक पहुंचना होगा.

Apple और Google की भारत में बढ़ सकती है मैन्युफैक्चरिंग

अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिया है कि Apple भारत में iPhone से आगे iPad और Mac जैसे दूसरे प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ा सकता है. सरकार को यह भी उम्मीद है कि Google अपने एक्सपोर्ट के लिए बनाए जाने वाले डिवाइस का बड़ा हिस्सा चीन से भारत शिफ्ट करेगा. इससे भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में और बड़ी भूमिका मिल सकती है. सरकार के मुताबिक भारत मात्रा के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर है. देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2% मोबाइल फोन भारत में ही बनते हैं.

असेंबली हब से आगे बढ़ने की कोशिश

PLI स्कीम ने भारत को बड़े पैमाने पर मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबलिंग का हब बनाने में मदद की. अब MPMS का फोकस अगली स्टेज पर है पार्ट्स, टेक्नोलॉजी, डिजाइन, IP और भारतीय ब्रांड्स का मालिकाना हक भारत में लाना मेन मकसद है. इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सचिव एस. कृष्णन के मुताबिक, इसका लक्ष्य टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता, ज्यादा आर्थिक वैल्यू और अपने प्रोडक्ट व IP तैयार करना है. अब इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय इसके लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी करेगा. इसके बाद कंपनियों से आवेदन मांगे जाएंगे और उनका चयन किया जाएगा.

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संपादकीय टीम

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