आज के समय में अस्पताल का खर्च लगातार बढ़ रहा है. छोटी सी बीमारी से लेकर बड़ी सर्जरी तक, इलाज का बिल कई बार इतना ज्यादा हो जाता है कि परिवार की सालों की बचत खत्म हो सकती है. इसी वजह से लोग खुद और परिवार को सुरक्षित रखने के लिए हेल्थ इंश्योरेंस लेते हैं. अब तो ऑनलाइन हेल्थ इंश्योरेंस खरीदना भी काफी आसान है. मोबाइल से पॉलिसी देखें, कवर चुनें और पेमेंट करें बस पॉलिसी आपके पास.

लेकिन यहां एक गलती कई लोग कर देते हैं. वे पॉलिसी का पूरा नियम नहीं पढ़ते. पॉलिसी में लिखी छोटीछोटी शर्तें बाद में बहुत बड़ा फर्क डाल सकती हैं. खासकर अस्पताल में भर्ती होने के समय इनका पता चलता है.
इसलिए पॉलिसी खरीदने से पहले इन 5 बातों को जरूर समझ लें
कैशलेस का मतलब यह नहीं कि कोई पैसा नहीं देना होगा
कई लोगों को लगता है कि सुविधा मिलने का मतलब है कि अस्पताल में उन्हें अपनी जेब से कुछ भी नहीं देना पड़ेगा. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है.कैशलेस का मतलब है कि पॉलिसी में कवर होने वाले खर्च का भुगतान बीमा कंपनी और अस्पताल के बीच हो सकता है. हर खर्च का भुगतान कंपनी करेगी, यह जरूरी नहीं है.
उदाहरण के लिए, कुछ छोटी चीजों जैसे दस्ताने, सिरिंज, मास्क, PPE किट या दूसरे Consumables का पैसा पॉलिसी में शामिल नहीं हो सकता.कुछ मामलों में अस्पताल किसी इलाज के लिए सामान्य से ज्यादा फीस भी ले सकता है. अगर वह खर्च पॉलिसी के नियमों के हिसाब से उचित नहीं माना जाता, तो उसका कुछ हिस्सा आपको खुद देना पड़ सकता है.इसलिए कैशलेस देखकर यह न मानें कि अस्पताल का पूरा बिल कंपनी ही चुकाएगी.
Room Rent की सीमा को जरूर देखें
खरीदते समय कमरे के किराये की लिमिट जरूर जांचें. यह छोटी सी शर्त बाद में आपके क्लेम पर बड़ा असर डाल सकती है.मान लीजिए आपकी पॉलिसी में कमरे का किराया एक तय सीमा तक ही दिया जाना है, लेकिन आप उससे महंगा कमरा चुन लेते हैं. ऐसे में सिर्फ कमरे के किराये का अतिरिक्त पैसा ही नहीं, कुछ दूसरे अस्पताल खर्चों में भी कटौती हो सकती है. इसे Proportionate Deduction कहा जाता है.
इसके अलावा कुछ पॉलिसियों में नई तकनीक से होने वाले इलाज, जैसे रोबोटिक सर्जरी, के लिए भी अलग लिमिट हो सकती है. इसलिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि आपकी पॉलिसी 5 या 10 लाख रुपये की है. यह भी देखें कि अलगअलग इलाज पर कितनी सीमा लगी हुई है.
एजेंट की बात को ही अंतिम सच न मानें
पॉलिसी खरीदते समय एजेंट आपको कई बातें समझाता है. वह आपको बता सकता है कि पॉलिसी में क्याक्या मिलेगा. लेकिन सिर्फ बातचीत में कही गई बातों के भरोसे पॉलिसी न खरीदें.क्लेम के समय सबसे जरूरी होता है कि पॉलिसी के दस्तावेज में क्या लिखा है. इसलिए जो भी बात आपको बताई जा रही है, उसे पॉलिसी के कागजों में जरूर देखें.अगर किसी खास बीमारी, इलाज या सुविधा के कवर को लेकर सवाल है, तो उसे लिखित में स्पष्ट करवाना बेहतर है.
पुरानी बीमारी की जानकारी न छिपाएं
यह सबसे जरूरी बातों में से एक है.अगर आपको पहले से कोई बीमारी है, जैसे BP, डायबिटीज या थायरॉयड, तो पॉलिसी लेते समय इसकी सही जानकारी दें.
कुछ लोग प्रीमियम बढ़ने या पॉलिसी मिलने में परेशानी के डर से पुरानी बीमारी छिपा देते हैं. लेकिन बाद में क्लेम के समय अस्पताल के रिकॉर्ड से पुरानी बीमारी की जानकारी सामने आ सकती है. ऐसी स्थिति में क्लेम को लेकर विवाद हो सकता है और कंपनी पॉलिसी के नियमों के आधार पर कार्रवाई कर सकती है.इसलिए शुरुआत में ही अपनी मेडिकल हिस्ट्री की सही जानकारी देना सबसे सुरक्षित तरीका है.
सिर्फ कम प्रीमियम देखकर पॉलिसी न खरीदें
ऑनलाइन पॉलिसी देखते समय सबसे सस्ता प्लान देखकर उसे खरीद लेना आसान लगता है. लेकिन जरूरी नहीं कि सबसे सस्ती पॉलिसी आपके लिए सबसे अच्छी भी हो.कम प्रीमियम वाली पॉलिसी में कोपेमेंट, सबलिमिट या वेटिंग पीरियड जैसी शर्तें हो सकती हैं.
कोपेमेंट का मतलब है कि क्लेम का कुछ हिस्सा आपको अपनी जेब से देना होगा. वहीं सब लिमिट का मतलब है कि किसी खास बीमारी या इलाज के लिए कंपनी ने अलग से अधिकतम रकम तय कर रखी है. वेटिंग पीरियड में कुछ बीमारियों के इलाज का खर्च एक तय समय पूरा होने के बाद ही मिल सकता है. इसलिए पॉलिसी खरीदते समय सिर्फ प्रीमियम नहीं, बल्कि उसकी पूरी शर्तें और कवरेज भी देखें.
पॉलिसी लेने से पहले क्या करें?
हेल्थ इंश्योरेंस खरीदना अच्छी वित्तीय सुरक्षा हो सकती है, लेकिन सही पॉलिसी चुनना उतना ही जरूरी है.पॉलिसी लेने से पहले कैशलेस सुविधा, कमरे के किराए की लीमिट, इलाज की सबलीमिट, वेटिंग पीरियड, को पेमेंट और बीमारी से जुड़ी शर्तों को ध्यान से पढ़ें. सबसे जरूरी बात जो जानकारी कंपनी को देनी है, वह पूरी और सही दें.
क्योंकि इंश्योरेंस खरीदते समय थोड़ी सावधानी बरतना आसान है, लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के बाद पॉलिसी की शर्तों को समझना काफी मुश्किल हो सकता है.