सरकारी अस्पताल के मुकाबले प्राइवेट में इलाज कराना लोगों को 8 से 15 गुना ज्यादा महंगा पड़ रहा है. नेशनल सैंपल सर्वे के 80वें राउंड के आंकड़ों के आधार पर LocalCircles ने ये रिपोर्ट जारी की है. आंकड़े कहते हैं कि आम परिवारों को सरकारी के मुकाबले प्राइवेट में औसतन 50508 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. जबकि सरकारी में ये खर्च महज 6631 रुपये है. देखा जाए तो प्राइवेट में इलाज कराना करीब 8 गुना ज्यादा है. इस हिसाब से भारत में इलाज का खर्च आम आदमी के लिए बहुत बड़ी टेंशन बनता जा रहा है.

इस सर्वे में उन परिवारों का एक्सपीरियंस शामिल है जिन्होंने बीते 3 सालों में हॉस्पिटल के खर्चे उठाए. सर्वे के मुताबिक कुछ मामलों में खर्च का ये फर्क करीब 15 गुना ज्यादा तक पहुंच सकता है. जानें क्या कहती है रिपोर्ट….
लोकलसर्किल्स ने सर्वे के आधार पर देश के 306 जिलों के करीब 24000 लोगों से बात की. प्राइवेट हॉस्पिटल में बिलिंग, टेस्ट और मरीज के बेड से जुड़े सभी खर्चों इस रिपोर्ट में शामिल किए गए.
बिलिंग में ट्रांसपेरेंसी की कमी
प्राइवेट हॉस्पिटल में की जाने वाली बिलिंग भी लोगों की मुसीबतें बढ़ाती है. सर्वे में लोगों ने बताया कि उनसे बिल के अंदर गैरजरूरी डॉक्टर कंसल्टेशन चार्जिस लिए जाते हैं. करीब 40 फीसदी ने बताया कि डॉक्टरों की फीस भी जरूरत से ज्यादा ली जाती है. साथ ही लोग कहते हैं कि दवा और कंज्यूमेबल्स की मात्रा मनमुताबिक ली जाती है और ये ओवरबिलिंग की टेंशन बढ़ाती है. प्राइवेट हॉस्पिटल में डॉक्टर की फीस, टेस्ट, कमरे का किराया और दूसरी चीजों को फाइनल बिल में काफी बढ़ा दिया जाता है.
कमरे और हॉस्पिटल के बेज का किराए में एकरूपता नहीं है और इसका कुल खर्च तेजी से बढ़ता है. इस कारण मरीज और उसका परिवार ये तय ही नहीं कर पाता है कि उसे कितने पैसे आखिर में भरने पड़ेंगे. बच्चे के जन्म के लिए प्राइवेट अस्पताल में खर्च औसतन 37630 रहा जबकि सरकारी में इसका खर्च सिर्फ 2299 रुपये रहा.
ये चीजें बढ़ा देती हैं फाइल बिल में खर्च
सर्वे कहता है कि लोगों प्राइवेट हॉस्पिटल में डॉक्टर की फीस और सर्जरी को ही बड़ा खर्चा मानते हैं. इसमें रूम का रेंट, नर्सिंग चार्च, डॉक्टर की विजिट, दवा, टेस्ट, आईसीयू और हॉस्पिटल के कई दूसरी सेवाओं के अलगअलग चार्ज भी शामिल हो सकते हैं.
बीमा के बाद भी जेब पर बोझ
आजकल लोग हेल्थ इंश्योरेंस लेकर चलते हैं ताकि उन्हें प्राइवेट में इलाज कराते समय पैसा खर्च करना न पड़े. सर्वे कहता है कि इसके बावजूद मरीजों का आउटऑफपॉकेट खर्च कम नहीं हो रहा. इंश्योरेंस की मदद भी तब मिल पाती है जब मरीज को कम से कम 24 घंटे के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया जाए. इसके अलावा ओपीडी, डायग्नोस्टिक टेस्ट और महंगीमहंगी दवाओं पर खर्च खुद मरीज को ही करना पड़ता है.
इसलिए प्राइवेट और सरकारी में इलाज का खर्च कहीं गुना ज्यादा हो जाता है. नेशनल सैंपल सर्वे 2025 के मुताबिक देश में हेल्थ बीमा का दायरा भी बढ़ा है. ये ग्रामीण इलाकों में 47.4 फीसदी और शहरी इलाकों में करीब 44.3 फीसदी तक पहुंचा है.
छोटे क्लीनिक का बढ़ता चलन
भारत में बड़े अस्पताल तेजी से बढ़ रहे हैं और ये मेडिकल टूरिज्म से भी खूब पैसा कमा रहे हैं. लेकिन आम आदमी या परिवारों की छोटे क्लीनिक पर निर्भरता भी बढ़ी है. भारत के हेल्थ सेक्टर का बड़ा हिस्सा छोटे क्लीनिक, नर्सिंग होम और डायग्नोस्टिक सेंटर्स पर भी डिपेंड है.
सर्वे कहता है कि 60 फीसदी से ज्यादा इनपेशेंट केयर और करीब 70 फीसदी आउटपेशेंट केयर इसी नेटवर्क से जुड़ी है. इनकी कीमतों और दूसरी सर्विस से जुड़ी चीजों की निगरानी करना आसान नहीं है.