भारत के शहरों में करीब एक करोड़ मकान खाली पड़े हैं, लेकिन इसके बावजूद लोगों को सस्ते किराये के घर नहीं मिल रहे हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मेट्रो, शहरी और अर्धशहरी इलाकों में कुल 57 करोड़ मकानों की कमी का अनुमान है. इसमें मेट्रो शहरों में 23 करोड़ और अन्य शहरी इलाकों में 1.52 करोड़ मकानों की कमी शामिल है. वहीं, 2011 की जनगणना के मुताबिक, शहरी भारत के करीब 27% परिवार किराये के मकानों में रहते थे.

NAREDCO की रिपोर्ट के मुताबिक, किराये पर रहने वाले परिवारों में करीब 80% आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग से आते हैं. मकान मालिकों को किराये से कम कमाई, किरायेदारी से जुड़े कानूनी विवादों और मकान खाली कराने में होने वाली परेशानियों का डर रहता है. यही वजह है कि कई मकान मालिक अपने खाली घर किराये पर देने से बचते हैं. दूसरी तरफ, जमीन और निर्माण की बढ़ती लागत से नए सस्ते मकान बनाना भी मुश्किल हो रहा है. सरकार ने प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों के लिए अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स योजना शुरू की, लेकिन इसके क्रियान्वयन की रफ्तार धीमी रही है.
एक करोड़ मकान खाली, लेकिन किराये पर क्यों?
NITI Aayog की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के शहरी इलाकों में करीब एक करोड़ मकान खाली हैं. इसके बावजूद किराये के मकानों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है. इसके पीछे तीन प्रमुख वजहें हैं
- मकान मालिकों को किराये से कम कमाई होना.
- किरायेदारी से जुड़े कानूनी विवादों का डर.
- किरायेदार के मकान खाली नहीं करने और किराया नहीं देने का जोखिम.
एक महत्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि भारत के ज्यादातर शहरों में मकान किराये पर देने से सालाना केवल 23% रेंटल यील्ड मिलती है. यानी प्रॉपर्टी की कुल कीमत के मुकाबले उससे किराये के रूप में होने वाली कमाई काफी कम है. ऐसे में कई मकान मालिक घर किराये पर देने के बजाय उसे खाली रखना या भविष्य में बेचने के लिए अपने पास रखना बेहतर समझते हैं.
मकानों की कमी कितनी बड़ी है?
PRS की 202627 की रिपोर्ट में NITI Aayog के दिसंबर 2025 के आकलन का हवाला दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, मेट्रो, शहरी और अर्धशहरी इलाकों में आवास की कमी का अनुमान इस तरह है:
| क्षेत्र | अनुमानित आवास की कमी |
| मेट्रो शहर | 23 करोड़ |
| शहरी क्षेत्र | 1.52 करोड़ |
| अर्धशहरी क्षेत्र | 1.5 करोड़ |
| कुल | 57 करोड़ |
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. ये आंकड़े सिर्फ किराये के मकानों की कमी नहीं, बल्कि व्यापक आवास की कमी का अनुमान हैं. इसमें उन परिवारों की जरूरत भी शामिल है, जिनके पास अपना घर नहीं है. रिपोर्ट में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे को मेट्रो शहरों में रखा गया है.
किराये पर रहने वाले कितने लोग हैं?
2011 की जनगणना के मुताबिक, शहरी भारत के करीब 27% परिवार किराये के मकानों में रहते थे. वहीं, NAREDCO की रिपोर्ट के मुताबिक, किराये पर रहने वाले परिवारों में करीब 80% EWS और LIG वर्ग से आते हैं. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों से रोजगार की तलाश में शहरों में आने वाले प्रवासी मजदूर, कामगार और दूसरे लोग भी किराये के मकानों की मांग बढ़ाते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है, जिनकी आमदनी सीमित है और जो महंगे मकान खरीदने या ऊंचा किराया देने की स्थिति में नहीं हैं. यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. जिन लोगों को सबसे ज्यादा सस्ते किराये के मकानों की जरूरत है, क्या बाजार में उन्हीं के लिए मकान सबसे कम उपलब्ध हैं?
सरकारी योजना के बावजूद किराये के मकान क्यों नहीं बढ़े?
सरकार ने सितंबर 2020 में Affordable Rental Housing Complexes योजना शुरू की थी. इसका उद्देश्य शहरी गरीबों, प्रवासी मजदूरों, कामगारों और महिलाओं को सस्ते किराये के मकान उपलब्ध कराना था. इस योजना के तहत दो मॉडल रखे गए. पहले मॉडल में खाली पड़े सरकारी मकानों को किराये के आवास में बदलना और दूसरे में सरकारी व निजी संस्थाओं के जरिए नए किराये के मकान बनाना शामिल था.
PRS की रिपोर्ट के मुताबिक, 75,000 खाली सरकारी मकानों को ARHC में बदलने का लक्ष्य रखा गया था. मार्च 2025 तक सात राज्यों में 82,273 नए ARHC यूनिट मंजूर किए गए थे. वहीं, फरवरी 2023 तक केवल 5,648 सरकारी मकान इस योजना के तहत बदले गए थे, जिनमें से 4,470 मकानों पर लोगों का कब्जा था. यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. 82,273 यूनिट की मंजूरी का मतलब उनका निर्माण पूरा होना या लोगों को आवंटित होना नहीं है. इसी तरह, सरकारी मकानों को योजना में शामिल करना और उनमें लोगों का रहना, दोनों अलगअलग चरण हैं. ऐसे में सवाल है कि सरकारी योजना के तहत सस्ते किराये के मकान बनाने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने की रफ्तार इतनी धीमी क्यों रही?
मकान बनाना इतना महंगा क्यों है?
NITI Aayog और PRS की रिपोर्ट में जमीन की कीमत को सस्ते मकान बनाने की बड़ी बाधा बताया गया है. मेट्रो और शहरी इलाकों में जमीन की कीमत मकान की कुल लागत का 63% तक हो सकती है. इसके अलावा शहरों में जमीन की सीमित उपलब्धता, बिल्डिंग निर्माण के नियम, FAR/FSI की पाबंदियां और निर्माण सामग्री व मजदूरी की बढ़ती लागत भी मकान बनाने का खर्च बढ़ाती हैं. डेवलपर्स के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग में मुनाफा भी अपेक्षाकृत कम रहता है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश की रफ्तार प्रभावित होती है.
NITI Aayog के मुताबिक, मेट्रो शहरों में 85% परिवार सब्सिडी मिलने के बाद भी 30 वर्ग मीटर का मकान खरीदने में सक्षम नहीं हैं. इससे साफ है कि समस्या सिर्फ मकानों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन्हें आम लोगों की पहुंच में लाने की भी है. जमीन और निर्माण की ऊंची लागत के कारण सस्ते मकान बनाना मुश्किल है, जबकि किराये से कम कमाई और कानूनी जोखिम के चलते मकान मालिक खाली घर किराये पर देने से बचते हैं. ऐसे में एक तरफ शहरों में लाखों मकान खाली हैं, तो दूसरी तरफ कम आय वाले परिवारों के लिए सस्ता किराये का घर पाना बड़ी चुनौती बना हुआ है.