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​​​​​​​​​​वैलेंटाइन डे के नाम पर दरिंदगी बर्दाश्त नहीं … `लड़की दोस्त है तो क्या जबरन संबंध बनाओगे?’

​​​​​​​​​​वैलेंटाइन डे के नाम पर दरिंदगी बर्दाश्त नहीं … `लड़की दोस्त है तो क्या जबरन संबंध बनाओगे?’
​​​​​​​​​​वैलेंटाइन डे के नाम पर दरिंदगी बर्दाश्त नहीं … `लड़की दोस्त है तो क्या जबरन संबंध बनाओगे?’


वैलेंटाइन डे प्यार और भरोसे का दिन होता है, लेकिन जब इसी दिन को बहाना बनाकर किसी लड़की की सहमति को कुचल दिया जाए तो सवाल सिर्फ एक केस का नहीं रहता, पूरे समाज की सोच पर खड़ा हो जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट की नई टिप्पणी इसी कड़वी सच्चाई को सामने लाती है। कोर्ट ने साफ कहा है कि दोस्ती का मतलब अधिकार नहीं होता। लड़की अगर बात करती है, मिलती है तो इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी लड़का जबरन संबंध बना सकता है। यह पैâसला सिर्फ एक आरोपी की जमानत खारिज करने का नहीं, बल्कि उन सभी मानसिकताओं को झटका देने का है, जो ‘प्रâेंडली’ शब्द को गलत तरीके से समझते हैं। छोटे-छोटे इशारों को सहमति मान लेना और फिर उसे जबरन रिश्ते में बदल देना अब कानून इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि `वैलेंटाइन डे’ जैसे दिन का हवाला देकर किसी भी तरह की जबरदस्ती को सही नहीं ठहराया जा सकता। पीड़िता का लगातार एक जैसा बयान, कोर्ट में उसकी मौजूदगी और जमानत का विरोध। ये सभी बातें साफ संकेत देती हैं कि मामला सहमति का नहीं था। आरोपी के इस तर्क को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया कि संबंध आपसी सहमति से बने थे। यह पैâसला उन सभी मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां ‘सहमति’ को तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश की जाती है। यह मामला २०२५ में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी, इससे वह करीब एक साल से फोन पर संपर्क में थी, ने उसे अपने घर बुलाया। वहां उसने जबरन उसकी मांग में सिंदूर भरा और फिर उसकी इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी ने अदालत में दावा किया कि संबंध सहमति से बने और लड़की बालिग थी, लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
सहमति ही सबसे बड़ा कानून
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है। यह एक मजबूत संदेश है कि किसी भी रिश्ते में सहमति सर्वोपरि है। `वैलेंटाइन डे’ हो या कोई और दिन किसी भी स्थिति में जबरदस्ती स्वीकार्य नहीं है। कानून अब और सख्त नजरिए से ऐसे मामलों को देख रहा है।

`वैलेंटाइन डे’ जैसे दिन का हवाला देकर किसी भी तरह की जबरदस्ती को सही नहीं ठहराया जा सकता। पीड़िता का लगातार एक जैसा बयान, कोर्ट में उसकी मौजूदगी और जमानत का विरोध। ये सभी बातें साफ संकेत देती हैं कि मामला सहमति का नहीं था।

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