उत्तर-प्रदेश: धर्मनगरी वाराणसी से एक ऐसा भावुक और मर्मस्पर्शी मामला सामने आया है, जिसने रिश्तों की अहमियत पर समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यहां एक मजबूर बेटी ने रूढ़िवादी परंपराओं को पीछे छोड़ते हुए न सिर्फ अपने स्वर्गीय पिता के शव को कंधा दिया, बल्कि श्मशान घाट पर उन्हें मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज भी निभाया। इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।

बता दें, यह पूरी घटना वाराणसी के अंधरापुल इलाके की है, जहां रंजन जायसवाल नाम के बुजुर्ग का निधन हो गया था। उनके परिवार में चार बेटे होने के बावजूद, पिता के देहांत के छह घंटे बाद तक कोई भी बेटा उनके शव के पास नहीं पहुंचा। मृतक की बेटी पूजा देवी अपने पिता के पार्थिव शरीर के पास अकेली बैठी रो रही थीं। इस बीच यूपी 112 पुलिस के माध्यम से सूचना पाकर स्थानीय समाजसेवी अमन कबीर मौके पर पहुंचे। जब उन्होंने बेबस पूजा से उनके परिवार और भाइयों के बारे में पूछा, तो उनका दर्द छलक पड़ा।
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पूजा ने रोते हुए बताया कि उनके चार भाई हैं, लेकिन इस संकट की घड़ी में कोई भी पिता को आखिरी विदाई देने नहीं आया। भावुक बेटी ने यह भी कहा कि उनके पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे तक नहीं हैं, लेकिन भाइयों के न आने पर वह खुद ही अपने पिता के लिए बेटी और बेटा दोनों बनेंगी। इसके बाद समाजसेवी अमन कबीर ने तत्परता दिखाते हुए आर्थिक और सामाजिक मदद की और शव को हरिश्चंद्र घाट ले जाने का प्रबंध किया।
हरिश्चंद्र घाट पर बेटी पूजा ने खुद आगे बढ़कर पिता की अर्थी को कंधा दिया और पूरे विधि-विधान के साथ मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार संपन्न किया। वाराणसी की इस घटना ने आज के आधुनिक समाज और पारिवारिक ढांचों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है कि क्या केवल बेटा होना ही काफी है, या असली रिश्ता वही है जो आखिरी सांस और अंतिम समय तक साथ निभाए?












