उत्तर प्रदेश में 16 अक्टूबर को 10 सीटों पर होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राज्य की सियासत गरमा गई है. समाजवादी पार्टी चुनाव में पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है. पार्टी के विधायकों का आंकड़ा भले ही जरूरत के हिसाब से कम हो, लेकिन समाजवादी पार्टी तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है. इनमें वर्तमान राज्यसभा सदस्य प्रो रामगोपाल यादव एवं पिछले चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार रहे पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को चुनाव में उम्मीदवार बनाया जा सकता है.

सूत्रों का कहना है कि आलोक रंजन रंजन के पास अखिलेश यादव का आज फोन गया था. ने उन्हें तैयार रहने के लिए कहा. हालांकि तीसरे उम्मीदवार को लेकर सस्पेंस बकरार है. आलोक रंजन के अनुसार अखिलेश यादव तीसरा उम्मीदवार उतारना चाहते हैं, लेकिन पार्टी नेताओं से बातचीत करने के बाद इस पर फैसला लिया जाएगा. अलोक रंजन पूर्व मुख्य सचिव और अखिलेश यादव के रणनीतिकार रह चुके हैं.
दरअसल, राज्यसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के जितने वोट हैं, उन वोटों की बदौलत दो उम्मीदवार तो आसानी से जीत जाएंगे. इसके बाद भी पार्टी के पास 25 और वोट बचेंगे. इस वजह से पार्टी तीसरे उम्मीदवार पर भी दांव खेलना चाहती है.
जानें क्या है राज्यसभा चुनाव का पूरा गणित
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की मौजूदा विधायकों की संख्या 397 है. ऐसे में एक उम्मीदवार को जीतने के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होगी. समाजवादी पार्टी के पास 101 विधायक हैं. कांग्रेस के दो विधायकों को साथ जोड़ने पर विपक्षी खेमे की संख्या 103 तक पहुंच सकती है. इस गणित के आधार पर सपा के दो उम्मीदवारों की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है. इसके बाद करीब 25 वोट बच सकते हैं.
यही अतिरिक्त वोट तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की सपा की रणनीति का आधार बन रहे हैं. हालांकि, तीसरी सीट हासिल करने के लिए पार्टी को अपने खेमे के बाहर से भी समर्थन जुटाना होगा.
तीसरे उम्मीदवार में सामाजिक समीकरण अहम
अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसके चयन में सामाजिक समीकरण की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती हैय पार्टी अति पिछड़ा या दलित समाज से किसी चेहरे को उम्मीदवार बनाने पर विचार कर सकती है.
सपा पिछले कुछ समय से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने वाले व्यापक सामाजिक समीकरण पर जोर देती रही है. ऐसे में राज्यसभा का तीसरा उम्मीदवार पार्टी के राजनीतिक संदेश को मजबूत करने का माध्यम भी बन सकता है.
तीसरे उम्मीदवार के मैदान में उतरने पर मुकाबला अंतिम सीट के लिए दिलचस्प हो सकता है. मौजूदा संख्या बल के आधार पर बीजेपीएनडीए सात सीटों और सपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है. इसके बाद बचने वाली सीट के लिए एनडीए के पास संख्या बल का फायदा है. ऐसे में तीसरी सीट के लिए सपा को अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती होगी. चुनाव में विपक्षी खेमे के बाहर के विधायकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है.
असंतुष्ट विधायकों पर सपा की नजर
सपा की नजर विपक्ष से बाहर के विधायकों के साथसाथ सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर संभावित असंतोष पर भी है. पार्टी के लिए पिछला राज्यसभा चुनाव इस लिहाज से अहम सबक रहा है. 2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग के कारण पार्टी के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन चुनाव हार गए थे और बीजेपी के संजय सेठ ने जीत दर्ज की थी.
इस बार अगर सपा तीन उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो राज्यसभा चुनाव केवल सीटों के गणित तक सीमित नहीं रहेगा. उम्मीदवारों का चयन, सामाजिक समीकरण, अतिरिक्त समर्थन और विधायकों की रणनीतिक भूमिका चुनाव की तस्वीर तय करने में अहम हो सकती है.