लंबे समय तक बैठे रहने की आदत, कम फिजिकल एक्टिविटी और बदलती लाइफस्टाइल से बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है. बॉडी पर लगातार काम का स्ट्रेस या सीटिंग जॉब की वजह से मांसपेशियों में अकड़न या दूसरी दिक्कतें होने लगती हैं. चोट लगने पर ही नहीं दूसरी वजहों से मांसपेशियों में हुई दिक्कत को दूर करने के लिए फिजियोथेरेपी ली जाती है. पर क्या आप जानते हैं कि 8 सितंबर को मनाए जाने वाले विश्व फिजियोथेरेपी दिवस 2026 का फोकस इस बार केवल हड्डियों और मांसपेशियों तक सीमित नहीं है.

वर्ल्ड फिजियोथेरेपी डे की इस साल की थीम दिल की बीमारी और स्ट्रोक की रोकथाम, मैनेजमेंट और रिहैबिलिटेशन में फिजियोथेरेपी और शारीरिक गतिविधि की भूमिका पर केंद्रित है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डॉ. इंद्रमणि उपाध्याय के अनुसार फिजियोथेरेपी को लोग अक्सर केवल कमर, घुटने या कंधे के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है. उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी समस्या कम मूवमेंट वाली लाइफस्टाइल है. ऑफिस में घंटों बैठना, स्क्रीन टाइम बढ़ना, वाहन पर डिपेंड होना और व्यायाम की कमी शरीर को धीरेधीरे कमजोर कर रही है.
नियमित और सही तरीके से की गई फिजिकल एक्टिविटी से दिल की अच्छी सेहत, मांसपेशियों की ताकत, बैलेंस और शरीर की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने में हेल्प मिलती है. ऐसा ही कुछ फिजियोथेरेपी के साथ भी है.
स्ट्रोक के बाद जल्द शुरू हो रिहैबिलिटेशन
स्ट्रोक के बाद मरीज में हाथपैर की कमजोरी, चलने में परेशानी, संतुलन बिगड़ना और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत हो सकती है. विशेषज्ञ के अनुसार, मरीज की स्थिति के अनुरूप फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन से मूवमेंट, बैलेंस और स्वतंत्र रूप से दैनिक गतिविधियां करने की क्षमता को बेहतर करने में मदद मिल सकती है. डॉ. उपाध्याय ने कहा, स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखना चाहिए. मरीज और परिवार को घर पर भी सुरक्षित तरीके से एक्सरसाइज और मूवमेंट जारी रखने की आदत विकसित करनी चाहिए.
फिजियोथेरेपी में टेक्नोलॉजी का बढ़ता इस्तेमाल
फिजियोथेरेपी भी अब तेजी से टेक्नोलॉजी आधारित हो रही है. मोशन एनालिसिस, सेंसरबेस्ड मॉनिटरिंग, वियरेबल डिवाइस, डिजिटल एक्सरसाइज प्रोग्राम और रोबोटिक रिहैबिलिटेशन जैसी तकनीकें मरीज की प्रगति को ट्रैक करने और रिहैबिलिटेशन को अधिक व्यक्तिगत बनाने में मदद कर रही हैं.
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक फिजियोथेरेपिस्ट का विकल्प नहीं है. मरीज की उम्र, बीमारी, ताकत, संतुलन और लक्ष्य के आधार पर सही एक्सरसाइज का चयन अब भी विशेषज्ञ के क्लिनिकल आकलन पर निर्भर करता है.
दर्द के डर से बिल्कुल निष्क्रिय न रहें
घुटने या कूल्हे की समस्या वाले कई लोग दर्द के डर से चलनाफिरना कम कर देते हैं. डॉ. उपाध्याय के मुताबिक यह हमेशा सही रणनीति नहीं है. सही जांच के बाद कम प्रभाव वाली एक्सरसाइज, मांसपेशियों की मजबूती और नियंत्रित मूवमेंट मरीज को सक्रिय रखने में मदद कर सकते हैं. उनका कहना है कि हर उम्र में ज्यादा मूवमेंट और कम बैठे रहना स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा होना चाहिए. विश्व फिजियोथेरेपी भी 2026 अभियान में लोगों को कम बैठने और अधिक सक्रिय रहने का संदेश दे रहा है.