पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 4 रुपये प्रति लीटर का इजाफा हुआ है. इस बढ़ोतरी से आम आदमी का बजट प्रभावित होना तय है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर होगा? स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ताज़ा ‘इकोरैप’ रिपोर्ट ने इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की है. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भले ही आपकी जेब पर तात्कालिक बोझ बढ़ा हो, लेकिन देश के राजकोषीय स्थिति (फिस्कल हेल्थ) पर इस बढ़ोतरी का कोई सीधा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है. आइए समझते हैं कि इस 4 रुपये की बढ़ोतरी के पीछे अर्थशास्त्र का कौन सा नियम काम कर रहा है.

महंगाई का मीटर थोड़ा तेज घूमेगा
एसबीआई की रिपोर्ट साफ करती है कि तेल के दाम बढ़ने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई दर में तुरंत उछाल देखने को मिलेगा. मई-जून 2026 के दौरान महंगाई दर में 0.15 से 0.20 प्रतिशत (15-20 बेसिस पॉइंट्स) की वृद्धि होने की आशंका है. इसी वजह से वित्तीय वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए महंगाई दर का अनुमान बढ़ाकर 4.7% कर दिया गया है. दिलचस्प बात यह है कि जब भी तेल के दाम बढ़ते हैं, शुरुआत में लोग खपत कम कर देते हैं. लेकिन कुछ ही समय बाद यह खपत वापस सामान्य स्तर पर आ जाती है. सालाना आधार पर पेट्रोल-डीजल की बिक्री में कोई खास कमी दर्ज नहीं होती.
तेल कंपनियों का भारी भरकम घाटा
आखिर यह बढ़ोतरी की क्यों गई? इसका जवाब पेट्रोलियम कंपनियों के बही-खातों में छिपा है. लंबे समय से खुदरा कीमतें स्थिर रहने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम चढ़े हुए थे. इससे तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था. केंद्रीय मंत्री के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि इन कंपनियों को हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है. सालाना हिसाब लगाएं तो यह रकम 3.6 लाख करोड़ रुपये बैठती है. 3 रुपये प्रति लीटर की इस ताज़ा बढ़ोतरी से कंपनियों को 52,700 करोड़ रुपये की राहत मिलेगी. यह रकम वित्तीय वर्ष 2027 में होने वाले उनके कुल अनुमानित नुकसान का महज 15 फीसदी हिस्सा है.
टैक्स खत्म हुआ तो सरकारी खजाने पर असर
अगर सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए टैक्स में कटौती का रास्ता चुनती है, तो समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. वर्तमान में पेट्रोल पर 11.9% व डीजल पर 7.8% उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) लगता है. यदि सरकार इसे घटाकर बिल्कुल शून्य कर देती है, तो सरकारी राजस्व को करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान होगा. सरकार अगर अपने खर्चों में कटौती नहीं करती है, तो इससे देश का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 0.5% तक बढ़ सकता है. मार्च में की गई 10 रुपये की ड्यूटी कटौती के शुद्ध नुकसान को भी मिला लिया जाए, तो चालू वित्त वर्ष में सरकार का कुल घाटा 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. फिलहाल मौजूदा 3 रुपये की बढ़ोतरी से 15% नुकसान की भरपाई हो रही है, जबकि ड्यूटी शून्य करने पर 53% की भरपाई होगी.
Khabar Monkey
राज्यों की कमाई का पूरा गुणा-भाग
केंद्र की नीतियों का राज्यों के खजाने पर सीधा असर पड़ता है. एसबीआई के अनुमान के मुताबिक, अगर केंद्र अपना उत्पाद शुल्क शून्य करता है, तो राज्य सरकारों को सीधे तौर पर 80,000 करोड़ रुपये (0.8 लाख करोड़) का झटका लगेगा. हालांकि, तेल की बढ़ी हुई कीमतों के कारण राज्यों को करीब 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा भी होगा. ऐसे में राज्यों को होने वाला कुल शुद्ध नुकसान 50,000 करोड़ रुपये का रहेगा.
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