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दादा धीरुभाई अंबानी के बाद पोते आकाश और पोती ईशा ने भी दोहराया वहीं इतिहास, JIO के जरिए ऐसे रचा कीर्तिमान​

भारत में शेयर बाजार को लंबे समय तक अमीरों, बड़े कारोबारियों और वित्तीय विशेषज्ञों की दुनिया माना जाता था. आम आदमी के लिए निवेश का मतलब बैंक में पैसा जमा करना, सोना खरीदना या जमीनजायदाद में निवेश करना होता था. लेकिन इस सोच को बदलने में एक भारतीय कारोबारी समूह की बड़ी भूमिका रही—Reliance Industries. […]

भारत में शेयर बाजार को लंबे समय तक अमीरों, बड़े कारोबारियों और वित्तीय विशेषज्ञों की दुनिया माना जाता था. आम आदमी के लिए निवेश का मतलब बैंक में पैसा जमा करना, सोना खरीदना या जमीनजायदाद में निवेश करना होता था. लेकिन इस सोच को बदलने में एक भारतीय कारोबारी समूह की बड़ी भूमिका रही—Reliance Industries.

1977 में धीरूभाई अंबानी ने Reliance Textile Industries का IPO लाकर आम लोगों को कंपनी का हिस्सेदार बनने का मौका दिया. उस समय कंपनी के सार्वजनिक इश्यू को करीब 58,000 निवेशकों का समर्थन मिला और लगभग 2.8 करोड़ रुपये जुटाए गए. करीब पांच दशक बाद, आकाश अंबानी के नेतृत्व में Jio Platforms का IPO एक नए दौर की शुरुआत कर रहा है. इस इश्यू का आकार 30,213 करोड़ रुपए है.

लेकिन कहानी सिर्फ दो IPO की नहीं है. यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें एक कंपनी के शेयर आम भारतीय परिवारों की निवेश संबंधी बातचीत का हिस्सा बने और भारत में इक्विटी निवेश की संस्कृति विकसित हुई. आखिर Reliance ने ऐसा क्या किया कि लाखों लोग शेयर बाजार की तरफ आकर्षित हुए? और क्या Jio का IPO भी वैसा ही इतिहास बना सकता है? आइए विस्तार से समझते हैं.

1977: जब Reliance ने आम लोगों को बनाया कंपनी का हिस्सेदार

1977 में जब धीरूभाई अंबानी अपनी कंपनी को शेयर बाजार में लेकर आए, तब भारत में शेयर खरीदना आज की तरह आसान नहीं था. न मोबाइल ऐप थे, न ऑनलाइन ट्रेडिंग और न ही कुछ क्लिक में IPO के लिए आवेदन करने की सुविधा.

शेयरों के कागजी सर्टिफिकेट होते थे. निवेशकों को ब्रोकरों के जरिए लेनदेन करना पड़ता था और प्रक्रिया में समय लगता था. ऐसे माहौल में Reliance ने आम लोगों से पूंजी जुटाने का रास्ता चुना.

इस IPO की कुछ खास बातें थीं:

  • इश्यू का आकार: करीब 2.8 करोड़ रुपए.
  • निवेशकों की संख्या: पहले साल में लगभग 58,000 शेयरधारक.
  • इश्यू को मिला रिस्पॉन्स: करीब सात गुना सब्सक्रिप्शन.
  • शेयर का अंकित मूल्य: 10 रुपए प्रति शेयर.

इस कदम का महत्व सिर्फ इतना नहीं था कि कंपनी को कारोबार बढ़ाने के लिए पैसा मिल गया. इससे छोटे निवेशकों को भी यह समझने का अवसर मिला कि वे किसी बड़ी कंपनी के कारोबार में हिस्सेदारी खरीद सकते हैं.धीरूभाई की रणनीति ने निवेशकों और कंपनी के बीच एक ऐसा रिश्ता बनाया, जिसमें आम लोग सिर्फ ग्राहक नहीं, बल्कि कारोबार की वृद्धि में हिस्सेदार भी बन सकते थे.

Reliance की AGM कैसे बन गईं शेयरधारकों का बड़ा आयोजन?

  1. आज कंपनियों की सालाना आम बैठक यानी AGM में शामिल होना या उसकी जानकारी ऑनलाइन देखना सामान्य बात है. लेकिन धीरूभाई अंबानी के दौर में Reliance की AGM एक अलग ही पहचान रखती थी.
  2. 1985 तक बैठक में आने वाले शेयरधारकों की संख्या इतनी बढ़ गई कि सामान्य हॉल में सभी को बैठाना मुश्किल होने लगा. इसके बाद मुंबई के Cooperage Football Grounds में AGM आयोजित की गई, जहां करीब 12,000 शेयरधारक पहुंचे थे.
  3. Reliance की इन बैठकों में निवेशकों को कंपनी की योजनाओं, विस्तार और भविष्य की दिशा के बारे में जानकारी मिलती थी. बोनस शेयर जैसे प्रस्तावों ने भी शेयरधारकों के बीच कंपनी की लोकप्रियता बढ़ाने में भूमिका निभाई.
  4. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी था. निवेशकों को महसूस होता था कि कंपनी उन्हें महत्व देती है और वे उसके विकास का हिस्सा हैं.
  5. यही Reliance की खासियत थी—उसने शेयर बाजार को सिर्फ पैसों के लेनदेन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कंपनी और उसके छोटे निवेशकों के बीच एक मजबूत जुड़ाव बनाया.

Reliance का शेयर आम परिवारों की संपत्ति कैसे बना?

  1. Reliance की लोकप्रियता केवल प्रचार या बड़ी AGM तक सीमित नहीं रही. कंपनी ने टेक्सटाइल से आगे बढ़कर पेट्रोकेमिकल्स, रिफाइनिंग और दूसरे बड़े उद्योगों में विस्तार किया.
  2. जैसेजैसे कारोबार बढ़ा, वैसेवैसे कंपनी की बाजार में मौजूदगी भी मजबूत होती गई. निवेशकों को एक ऐसा उदाहरण मिला, जिसमें किसी कंपनी के शुरुआती दौर में शेयर खरीदकर लंबे समय तक निवेश बनाए रखने से संपत्ति बनाने की संभावना दिखाई दी.
  3. हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है. किसी एक कंपनी के शेयर से मिला शानदार रिटर्न इस बात की गारंटी नहीं है कि हर कंपनी का शेयर भी वैसा ही प्रदर्शन करेगा. निवेश में कंपनी की कमाई, कर्ज, कारोबार की गुणवत्ता और शेयर खरीदने की कीमत अहम होती है.
  4. फिर भी Reliance की कहानी ने भारत में इक्विटी निवेश को लेकर लोगों की सोच बदलने में योगदान दिया. शेयर खरीदना धीरेधीरे केवल ट्रेडिंग करने वालों का काम नहीं, बल्कि लंबी अवधि की संपत्ति बनाने का एक विकल्प भी बनने लगा.

2006 में Reliance Petroleum IPO ने फिर दिखाई निवेशकों की ताकत

  1. धीरूभाई अंबानी के दौर में शुरू हुआ निवेशकों का जुड़ाव बाद के वर्षों में भी दिखाई दिया. 2006 में Reliance Petroleum के IPO ने बाजार में जबरदस्त दिलचस्पी पैदा की.
  2. इस इश्यू के लिए 21 लाख से अधिक आवेदन आए और IPO कुल मिलाकर करीब 51.22 गुना सब्सक्राइब हुआ. रिटेल निवेशकों के हिस्से को भी करीब 15 गुना आवेदन मिले.
  3. तब तक Reliance एक जानापहचाना नाम बन चुका था. निवेशकों को कंपनी के कारोबार, ब्रांड और विस्तार की योजनाओं के बारे में जानकारी थी. इससे Reliance से जुड़े नए इश्यू में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी.
  4. लेकिन इस दौर में शेयर बाजार में एक बड़ा बदलाव भी हो रहा था. तकनीक और नियामकीय सुधारों ने निवेश करना पहले से आसान बनाना शुरू कर दिया था.

शेयर बाजार में आम लोगों की भागीदारी कैसे बढ़ी?

भारत में इक्विटी निवेश का विस्तार केवल Reliance की वजह से नहीं हुआ. समय के साथ बाजार के ढांचे, तकनीक और निवेश की प्रक्रियाओं में भी बड़े बदलाव आए.

  • 1996: डीमैट व्यवस्था की शुरुआत : कागजी शेयर सर्टिफिकेट की जगह इलेक्ट्रॉनिक रूप में शेयर रखने की सुविधा ने निवेश की प्रक्रिया को आसान और अधिक व्यवस्थित बनाया.
  • ASBA: IPO आवेदन में सुविधा : इस व्यवस्था के तहत IPO के लिए आवेदन करने पर पैसा बैंक खाते में ब्लॉक रहता है. आवंटन होने पर ही संबंधित रकम डेबिट होती है.
  • UPI और मोबाइल ऐप : डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन ब्रोकिंग ने छोटे निवेशकों के लिए IPO आवेदन और शेयरों की खरीदबिक्री अधिक सुलभ बना दी.

इन बदलावों का असर निवेशकों की संख्या पर भी दिखा. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, CDSL और NSDL में दर्ज डीमैट खातों की संख्या 2016 के 2.69 करोड़ से बढ़कर 23 करोड़ से अधिक हो गई थी. हालांकि, एक व्यक्ति के कई डीमैट खाते हो सकते हैं, इसलिए खातों की संख्या को अलगअलग निवेशकों की संख्या नहीं माना जा सकता. यानी आज भारत में शेयर बाजार की पहुंच बढ़ने के पीछे तीन बड़ी ताकतें हैं—कंपनियों में निवेश को लेकर बढ़ती जागरूकता, वित्तीय व्यवस्था में सुधार और डिजिटल तकनीक.

अब आकाश अंबानी के सामने Jio IPO की चुनौती

2026 में कहानी एक बार फिर Reliance परिवार के इर्दगिर्द है. इस बार केंद्र में Jio Platforms है, जो टेलीकॉम से आगे बढ़कर डिजिटल सेवाओं, क्लाउड और एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में विस्तार करना चाहता है.Jio ने 2016 में अपनी शुरुआत के बाद सस्ते डेटा और वॉयस सेवाओं के जरिए भारत के टेलीकॉम बाजार को बदल दिया. कंपनी के 50 करोड़ से अधिक ग्राहक हैं, जो उसे बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने का आधार देते हैं. Jio Platforms के IPO से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

  • IPO का आकार ₹30,213 करोड़
  • रिपोर्ट में बताई गई अधिकतम वैल्यूएशन $108.3 अरब
  • इश्यू खुलने की तारीख 21 अक्टूबर 2026

रिपोर्ट के मुताबिक, IPO खुलने के दो घंटे के भीतर पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया था. लेकिन कुल सब्सक्रिप्शन को देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि छोटे निवेशकों ने भी उतनी ही तेजी से आवेदन किया. शुरुआती चरण में संस्थागत निवेशकों की मांग ज्यादा मजबूत थी.

यहां आकाश अंबानी के सामने असली चुनौती केवल IPO को सफल बनाना नहीं, बल्कि Jio को एक ऐसी कंपनी के रूप में स्थापित करना है जो लंबे समय तक कमाई और निवेशकों को अच्छा रिटर्न दे सके.

Jio के IPO में निवेशकों के लिए अवसर और जोखिम क्या हैं?

Jio के पास बड़ी ग्राहक संख्या, मजबूत ब्रांड और डिजिटल सेवाओं के विस्तार की संभावनाएं हैं. लेकिन किसी कंपनी का लोकप्रिय होना और उसका शेयर निवेश के लिहाज से आकर्षक होना दो अलग बातें हैं.

संभावित अवसर प्रमुख जोखिम
टेलीकॉम ग्राहकों का बड़ा आधार टेलीकॉम कारोबार पर अधिक निर्भरता
टैरिफ बढ़ने से प्रति ग्राहक कमाई में सुधार की संभावना प्रतिस्पर्धा और ग्राहक वृद्धि की धीमी रफ्तार
क्लाउड, एंटरप्राइज और डिजिटल सेवाओं का विस्तार नई तकनीकों में भारी निवेश की जरूरत
AI और डेटा सेंटर जैसे नए कारोबार अनुमान से कम कमाई होने पर वैल्यूएशन का दबाव

ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, Jio की कमाई का 90% से अधिक हिस्सा अब भी टेलीकॉम कारोबार से आता है. इसलिए कंपनी को यह दिखाना होगा कि उसकी डिजिटल विस्तार योजनाएं भविष्य में टिकाऊ कमाई में बदल सकती हैं. निवेशकों के लिए इसका सीधा मतलब है कि केवल Reliance ब्रांड, IPO की लोकप्रियता या लिस्टिंग के दिन संभावित मुनाफे के आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए. इश्यू की कीमत, कंपनी की कमाई, भविष्य की विकास दर और जोखिम का आकलन जरूरी है.

धीरूभाई की विरासत और आकाश अंबानी की परीक्षा में क्या फर्क है?

धीरूभाई अंबानी ने ऐसे दौर में आम लोगों को शेयर बाजार से जोड़ा, जब निवेश के साधन सीमित थे और जानकारी तक पहुंच आसान नहीं थी. उन्होंने निवेशकों को कंपनी के विकास में हिस्सेदार बनने का अवसर दिया.

आकाश अंबानी के सामने स्थिति अलग है. आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, डीमैट खाते और मोबाइल ऐप के कारण निवेश करना आसान है. लेकिन निवेशक भी पहले से अधिक जानकारी रखते हैं और कंपनियों से कमाई, पारदर्शिता तथा बेहतर रिटर्न की अपेक्षा करते हैं.

इसलिए दोनों दौर के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है:

  • 1977 में चुनौती: आम लोगों को शेयर बाजार में निवेश करने के लिए प्रेरित करना.
  • 2026 में चुनौती: निवेशकों को यह भरोसा दिलाना कि कंपनी की वैल्यूएशन उसके भविष्य के कारोबार और मुनाफे के अनुरूप है.

Reliance ने भारत में इक्विटी निवेश की संस्कृति को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन Jio के मामले में अंतिम फैसला IPO की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि लिस्टिंग के बाद कंपनी के वास्तविक प्रदर्शन से होगा.

Reliance ने शेयर बाजार को घरघर पहुंचाया, अब Jio की बारी

धीरूभाई अंबानी के 1977 के IPO से लेकर आकाश अंबानी के Jio Platforms IPO तक, Reliance की कहानी भारत में शेयर बाजार के विकास की कहानी भी है. शुरुआती दौर में हजारों शेयरधारकों से शुरू हुआ सफर अब करोड़ों डीमैट खातों और डिजिटल निवेश के युग तक पहुंच चुका है.

Reliance ने आम निवेशकों को यह समझाने में मदद की कि वे किसी कंपनी की वृद्धि में हिस्सेदार बन सकते हैं. वहीं, Jio के सामने अब यह साबित करने की चुनौती है कि उसका बड़ा ग्राहक आधार और डिजिटल कारोबार आने वाले वर्षों में लगातार मुनाफा और निवेशकों के लिए टिकाऊ रिटर्न पैदा कर सकते हैं.

आखिरकार, किसी IPO की असली सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने लोगों ने पैसा लगाया, बल्कि इससे तय होती है कि कंपनी भविष्य में कितना अच्छा कारोबार करती है और निवेशकों के लिए कितनी वैल्यू बनाती है.

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संपादकीय टीम

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