1998 में भारत के परमाणु परीक्षण यानि पोखरण-2 के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. विदेशी निवेशक देश से भागने लगे. रुपया तेजी से टूट रहा था. सरकार और एसबीआई ने मिलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया फॉरेन करेंसी बांड्स जारी किए. इसके जरिए दुनियाभर के प्रवासियों से डॉलर मांगे गए.

नतीजा उम्मीद से कहीं ज्यादा था. करीब $5.5 अरब भारत आए. इस भारी डॉलर इन्फ्लो ने रुपए को न केवल गिरने से बचाया, बल्कि भारत का फॉरेक्स रिजर्व भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया.
मई 2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया कि वह अपने डॉलर छापने के प्रोग्राम को धीमा करेगा. इससे पूरी दुनिया के उभरते बाजारों से डॉलर वापस भागने लगे. भारत के रुपए को 5 सबसे कमजोर मुद्राओं में गिना जाने लगा. रुपया ₹54 से टूटकर ₹68.80 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया. सितंबर 2013 में डॉ. रघुराम राजन ने RBI गवर्नर का पद संभाला. उन्होंने आते ही एक आक्रामक स्कीम पेश की – स्पेशल डिपॉजिट स्कीम. उन्होंने विदेशी बैंकों को आकर्षित करने के लिए डॉलर जमा करने पर हेजिंग कॉस्ट को बहुत सस्ता कर दिया.
ये कोशिश इतिहास की सबसे सफल कोशिशों में गिनी जाती है. केवल 3 महीनों के भीतर भारत में $34 अरब की भारी-भरकम विदेशी मुद्रा आ गई. रुपया न केवल संभला, बल्कि अगले कुछ ही हफ्तों में ₹68 से सुधरकर ₹61-62 के स्तर पर वापस आ गया. सटोरियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
मौजूदा समय और आरबीआई ने फिर कसी कमर
ईरान युद्ध के हालात और कच्चे तेल के $109 प्रति बैरल पहुंचने से रुपया इस समय फिर संवेदनशील स्थिति में है. वह इतिहास के सबसे निचले स्तर ₹96.14 पर जाकर संभलने की कोशिश में लगा है. आरबीआई गिरते रुपए को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा बाय-सेल स्वैप नीलामी और बांड खरीद जैसे कदम उठा रहा है. रुपया 18 मई को डॉलर के मुकाबले 95.40 प्रति डॉलर रहा.
– RBI ने बाजार से 10.9 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रुपये) के बांड खरीदने की घोषणा की है.
– RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार के स्रोतों में डायवर्सिफिकेशन उपाय किए, जिससे वैश्विक बाजार स्थितियों का प्रभाव कम होता है
– RBI 2013 में इस्तेमाल किए गए खास फॉर्मूले को फिर से लागू करने पर विचार कर रहा है.
कैसे बैटिंग करता है रिजर्व बैंक
क्या आपको मालूम है कि ऐसे में रिजर्व बैंक किस तरह मैदान में उतरकर रुपए के लिए खेलता है. आगे हम उन्हीं पांच बातों या यूं समझ लीजिए आरबीआई के पांच पॉवरफुल शाट्स के बारे में बताएंगे.
1. बाजार में सीधे डॉलर बेचना
रुपए के गिरने का सीधा मतलब है कि बाजार में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा है. डॉलर कम पड़ रहे हैं. ऐसे में आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार का संदूक खोलता है. सरकारी बैंकों के जरिए बाजार में अरबों डॉलर बेचना शुरू कर देता है. बाजार में डॉलर आते ही उसकी कमी दूर होती है. रुपए की गिरावट पर ब्रेक लग जाता है.
2. ब्याज दरों में बढ़ोतरी
यदि गिरावट बहुत गंभीर हो, तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ा देता है. ब्याज दरें बढ़ने से देश में लोन महंगे होते हैं. बाजार में रुपए की लिक्विडिटी (तरलता) कम होती है. जब बाजार में रुपए की उपलब्धता कम होगी, तो उसकी वैल्यू बढ़ेगी. ऊंची ब्याज दरें विदेशी निवेशकों को भारत में पैसा लगाने के लिए आकर्षित करती हैं.
3. एनआरआई डिपॉजिट और विदेशी कर्ज नियमों में ढील
रिजर्व बैंक अनिवासी भारतीयों को भारत में पैसा जमा करने पर ज्यादा ब्याज या टैक्स छूट देने की व्यवस्था करता है. इसके अलावा भारतीय कंपनियों के लिए विदेशों से डॉलर में कर्ज लेने के नियम आसान बना दिए जाते हैं ताकि देश में किसी भी तरह डॉलर का फ्लो बढ़ सके.
4. डॉलर-रुपया स्वैप विंडो
तेल कंपनियों को कच्चे तेल के भुगतान के लिए बहुत बड़े पैमाने पर डॉलर की जरूरत होती है. जब वे बाजार से एक साथ डॉलर खरीदने उतरती हैं, तो रुपया अचानक क्रैश हो जाता है. आरबीआई इन कंपनियों के लिए एक विशेष स्वैप विंडो खोल देता है, जहां वे सीधे रिजर्व बैंक से डॉलर ले सकती हैं, जिससे खुले बाजार पर दबाव नहीं पड़ता.
5. सट्टेबाजी पर लगाम
फॉरेक्स मार्केट में कई ट्रेडर्स रुपए के और गिरने की शर्त लगाकर मुनाफा कमाते हैं. RBI बैंकों और ब्रोकर्स पर कड़े नियम लागू कर देता है ताकि रुपए के खिलाफ होने वाली इस सट्टेबाजी को रोका जा सके.
राहत की बात क्या
1991 के संकट के विपरीत, आज भारत के पास एक मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और फॉरवर्ड बुक है. भारत अपनी अधिकांश खाद्य सामग्री खुद पैदा करता है, इसलिए रुपए की इस गिरावट का असर आम जनजीवन की खाद्य मुद्रास्फीति पर बहुत सीमित पड़ता है.
आरबीआई फिर किस टीम के साथ खेलता है
आरबीआई रुपए को संभालने के लिए एक ऐसी टीम के साथ खेलता है, जो इकोसिस्टम के साथ मिलकर काम करती है.
1. वित्त मंत्रालय – रिजर्व बैंक से तालमेल करके बड़े फैसले लेता है. निवेश के नियम तय करता है. टैक्स नीति बदलता है. नई स्पेशल स्कीम लांच करता है.
2. सरकारी बैंक – ये RBI के हाथ-पांव का काम करते हैं. सरकारी बैंकों के ज़रिए डॉलर बेचे जाते हैं. एजेंट की तरह काम करते हैं
3. सेबी – विदेशी निवेशकों के नियम तय करता है. पैसा बाहर जा रहा हो तो नियम कड़े कर सकता है. शेयर बाज़ार स्थिर हो तो रुपये पर दबाव कम होता है
4. तेल कंपनियां – जब रुपया गिरता है, RBI इन्हें कहता है – एक साथ तेल मत धीरे-धीरे खरीदो. इससे डॉलर की मांग में अचानक उछाल नहीं आता
5. IMF और विदेशी केंद्रीय बैंक – ये आखिरी सहारा बनते हैं. गंभीर संकट में IMF से स्पेशल ड्राइंग राइट्स मिल सकते हैं. दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों से करेंसी स्वैप लाइन एक्टिवेट हो सकती है. भारत का जापान से ऐसा ही समझौता है
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6. निर्यातक कंपनियां – ये डॉलर कमाती हैं और रुपये में बदलती हैं. RBI इन्हें प्रोत्साहित करता है कि विदेश में जमा डॉलर जल्दी वापस लाएं. इससे बाज़ार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ती है.





