Nobel Peace Prize Controversy History:शांति के नोबेल पुरस्कार की घोषणा हो चुकी है. भारतीय मूल की नावनेथम नावी पिल्लई को यह पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है. इस साल शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 उम्मीदवार थे, इनमें 208 व्यक्ति तथा 79 संगठन हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भले ही इस साल भी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया हो लेकिन पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को जब शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था तो आलोचना हुई थी. यह पुरस्कार कई बार विवादों में भी आता रहा है. आइए, जानते हैं कि अब तक विवादित विजेताओं में कौनकौन सी हस्तियां शामिल रही हैं? विवाद के पीछे क्या तर्क दिए गए?

नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है. लेकिन इसके हर फैसले पर सर्वसम्मति नहीं बनती. कई बार पुरस्कार ऐसे नेताओं को मिला, जिनके पिछले काम या बाद के फैसले शांति के विचार से टकराते दिखे. कुछ विजेताओं के मामले में सवाल यह था कि उन्हें सम्मान बहुत जल्दी दे दिया गया. कुछ पर आरोप था कि उनके राजनीतिक या सैन्य कदम शांति के संदेश के अनुकूल नहीं थे.
इस पुरस्कार के चयन का काम नॉर्वे की संसद द्वारा नियुक्त पांच सदस्यीय समिति करती है. समिति के फैसले का असर दुनिया की राजनीति और सार्वजनिक बहस पर पड़ता है. इसलिए विजेता का चयन सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि का मूल्यांकन नहीं रहता. वह शांति की परिभाषा, राजनीतिक समय और अंतरराष्ट्रीय उम्मीदों पर भी सवाल खड़े करता है.
बराक ओबामा.
बराक ओबामा: उम्मीदों को मिला सम्मान
बराक ओबामा को 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के कुछ ही समय बाद नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया. समिति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और लोगों के बीच सहयोग मजबूत करने के प्रयासों के लिए चुना. उस समय राष्ट्रपति बने केवल नौ महीने हुए थे. नामांकन की समयसीमा भी उनके शपथ लेने के करीब 12 दिन बाद समाप्त हो गई थी. यहीं से विवाद शुरू हुआ.
आलोचकों ने कहा कि ओबामा को उनके हासिल किए गए ठोस परिणामों के बजाय भविष्य की उम्मीदों के लिए पुरस्कार दिया गया. ओबामा खुद भी पुरस्कार मिलने पर हैरान थे. आलोचना का एक दूसरा आधार उनकी विदेश नीति बनी. उनके राष्ट्रपति रहते अमेरिका अफगानिस्तान, इराक और सीरिया जैसे संघर्षों में सैन्य रूप से शामिल रहा. समर्थकों के लिए यह पुरस्कार बदलाव और बातचीत की उम्मीद का संदेश था. आलोचकों के लिए यह ऐसा सम्मान था, जो उपलब्धियों से पहले दे दिया गया. नोबेल संस्थान के पूर्व निदेशक ने बाद में इस फैसले पर समिति के पछतावे का उल्लेख किया था.
फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात.
यासिर अराफ़ात: बातचीत और सशस्त्र संघर्ष की विरासत
फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को 1994 में इजराइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और विदेश मंत्री शिमोन पेरेस के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार मिला. यह सम्मान ओस्लो समझौते से जुड़ी शांति प्रक्रिया के लिए दिया गया था. समझौते ने इजराइल और फिलिस्तीन के बीच बातचीत का एक नया रास्ता खोला था. विवाद इसलिए हुआ क्योंकि अराफ़ात का अतीत सशस्त्र संघर्ष और छापामार गतिविधियों से जुड़ा था.
आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे व्यक्ति को शांति का सम्मान दिया जाना चाहिए. समिति के भीतर भी इस फैसले पर मतभेद था. समिति के सदस्य कारे क्रिस्टियानसन ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था. इस मामले में विवाद का केंद्र यह था कि क्या शांति प्रक्रिया में शामिल होना, किसी नेता के पुराने संघर्षों को पीछे छोड़ने के लिए पर्याप्त आधार है.
हेनरी किसिंजर.
हेनरी किसिंजर: युद्धविराम के साथ युद्ध की छाया
अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर और उत्तर वियतनामी नेता ले डक थो को 1973 का नोबेल शांति पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया. यह पुरस्कार वियतनाम युद्ध में युद्धविराम के प्रयासों के लिए था. ले डक थो ने पुरस्कार स्वीकार नहीं किया. उस समय किसिंजर के चयन की तीखी आलोचना हुई.
आलोचकों ने वियतनाम युद्ध और कंबोडिया में अमेरिकी बमबारी में उनकी भूमिका की ओर ध्यान दिलाया. दक्षिण अमेरिका की सैन्य सरकारों को अमेरिकी समर्थन को लेकर भी सवाल उठे. पुरस्कार की घोषणा के बाद समिति के दो सदस्यों ने इस्तीफा दिया. इस फैसले ने एक कठिन सवाल सामने रखा. क्या युद्धविराम कराने में भूमिका निभाने वाले नेता को सम्मानित किया जा सकता है, जबकि उसकी नीतियां दूसरे संघर्षों से भी जुड़ी हों?
आंग सान सू ची.
आंग सान सू ची: लोकतंत्र की लड़ाई से रोहिंग्या संकट तक
म्यांमार की नेता आंग सान सू ची को 1991 में सैन्य शासन के खिलाफ अहिंसक संघर्ष के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला. उस समय वह लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का प्रमुख चेहरा थीं. उन्हें लंबे समय तक नजरबंदी में रखा गया था. बाद में उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों के मामले में उनके रुख को लेकर सवाल उठे.
आलोचकों ने कहा कि उन्होंने रोहिंग्या समुदाय के साथ हुई हिंसा की पर्याप्त निंदा नहीं की. 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार की सेना का बचाव करने के बाद भी उनकी भूमिका चर्चा में रही. कई लोगों ने उनसे पुरस्कार वापस लेने की मांग की. इस मामले ने पुरस्कार के एक व्यावहारिक नियम को भी सामने रखा. नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने के बाद वापस नहीं लिया जाता. समिति का तर्क यह रहा है कि पुरस्कार विजेता के बाद के कामों के लिए समिति जिम्मेदार नहीं होती.
अबी अहमद.
अबी अहमद: इरीट्रिया से मेलमिलाप और टिगरे युद्ध
इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को 2019 में इरीट्रिया के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला. उनके शुरुआती सुधारों और पड़ोसी देश के साथ मेलमिलाप को क्षेत्र में शांति की बड़ी संभावना के रूप में देखा गया. लेकिन 2020 में टिगरे क्षेत्र में संघर्ष शुरू होने के बाद उनके पुरस्कार पर सवाल उठे. अबी अहमद की सरकार ने टिगरे में सैन्य कार्रवाई की. संघर्ष के दौरान नागरिकों को विस्थापन, भोजन और दवाओं की कमी तथा हिंसा का सामना करना पड़ा. आलोचकों ने कहा कि पुरस्कार देने के समय समिति ने शांति प्रक्रिया की संभावनाओं को बहुत जल्दी सफलता मान लिया था.
पर्यावरण कार्यकर्ता वंगारी मथाई.
वंगारी मथाई: सम्मानित पर्यावरण अभियान और विवादित दावा
केन्या की पर्यावरण कार्यकर्ता वंगारी मथाई को 2004 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला. वह यह पुरस्कार पाने वाली पहली अफ्रीकी महिला थीं. उन्हें ग्रीन बेल्ट मूवमेंट और पर्यावरण संरक्षण के काम के लिए सम्मानित किया गया. इस आंदोलन ने पेड़ लगाने और समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा दिया.
मथाई के एचआईवी और एड्स से जुड़े एक दावे को लेकर विवाद हुआ. उन्होंने कहा था कि वायरस को जैविक हथियार के रूप में बनाया गया था. इस दावे के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे. आलोचना उनके पर्यावरण संबंधी काम के बजाय इस बयान पर केंद्रित थी. यह मामला याद दिलाता है कि किसी विजेता की एक सार्वजनिक टिप्पणी भी पुरस्कार और उसकी विश्वसनीयता पर बहस खड़ी कर सकती है.
नोबेल प्राइज.
पुरस्कार पर विवाद होता क्यों है?
नोबेल शांति पुरस्कार अक्सर ऐसे समय दिया जाता है, जब किसी संघर्ष का भविष्य साफ नहीं होता. समिति किसी नेता या आंदोलन को प्रोत्साहन देना चाह सकती है. लेकिन उम्मीद और हासिल की गई उपलब्धि के बीच फर्क करना हमेशा आसान नहीं होता. नेता के एक फैसले को शांति का कदम माना जा सकता है, जबकि दूसरे फैसले को हिंसा या दमन के समर्थन के रूप में देखा जा सकता है. इसी वजह से शांति पुरस्कार के फैसले राजनीतिक बहस से अलग नहीं रह पाते. कुछ आलोचक समिति पर जल्दबाजी का आरोप लगाते हैं.
कुछ कहते हैं कि पुरस्कार का इस्तेमाल किसी खास राजनीतिक संदेश को देने के लिए किया गया. समिति के समर्थक इसके उलट तर्क देते हैं कि सम्मान बातचीत और शांति की कोशिशों को मजबूत कर सकता है. साल 2025 में मारिया कोरीना मचाडो को पुरस्कार दिए जाने के बाद भी चयन और उसके राजनीतिक संदर्भ पर चर्चा हुई. इससे स्पष्ट है कि विवाद सिर्फ पुराने विजेताओं तक सीमित नहीं है.