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गुरु अमरदास जी कैसे बने सिखों के तीसरे गुरु, पुत्रों को छोड़ दामाद को क्यों बनाया उत्तराधिकारी?​

सिख धर्म के इतिहास में गुरु अमर दास जी का जीवन निःस्वार्थ सेवा, विनम्रता, त्याग और अटूट भक्ति का सबसे अनूठा उदाहरण माना जाता है. उन्होंने समाज को संदेश दिया कि गुरु की गद्दी किसी पारिवारिक विरासत या जन्मसिद्ध अधिकार का विषय नहीं है, बल्कि यह केवल सच्ची सेवा, आध्यात्मिक योग्यता और प्रभुभक्ति से ही […]

सिख धर्म के इतिहास में गुरु अमर दास जी का जीवन निःस्वार्थ सेवा, विनम्रता, त्याग और अटूट भक्ति का सबसे अनूठा उदाहरण माना जाता है. उन्होंने समाज को संदेश दिया कि गुरु की गद्दी किसी पारिवारिक विरासत या जन्मसिद्ध अधिकार का विषय नहीं है, बल्कि यह केवल सच्ची सेवा, आध्यात्मिक योग्यता और प्रभुभक्ति से ही प्राप्त होती है. सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी का संपूर्ण जीवन यह प्रेरणा देता है कि उम्र कभी भी भक्ति और साधना के मार्ग में बाधा नहीं बनती. उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सच्चा नेतृत्व वही कर सकता है जिसने पहले सच्चे सेवक की तरह काम किया हो. पुत्रों के स्थान पर दामाद गुरु राम दास जी को गद्दी सौंपकर उन्होंने योग्यता, निष्पक्षता और आध्यात्मिक मूल्यों की श्रेष्ठता को अमर बना दिया.

आइए, गुरु अमरदास की पुण्य तिथि के बहाने समझते हैं कि गुरु अमर दास जी कैसे बने सिखों के तीसरे गुरु? दो पुत्रों के रहते दामाद को क्यों बनाया अपना उत्तराधिकारी?

आध्यात्मिक खोज

गुरु अमर दास जी का जन्म 5 मई 1479 को पंजाब के अमृतसर जिले के बासरके गिलान गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम तेजभान भल्ला और माता का नाम बख्त कौर था. वे एक धार्मिक और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे. अपनी युवावस्था और गृहस्थ जीवन में वे वैष्णव मत के पक्के अनुयायी थे. वे लगभग 21 वर्षों तक हर साल हरिद्वार जाकर गंगा स्नान और तीर्थ यात्राएं करते रहे. वे ईश्वर की खोज में निरंतर लगे रहे, परंतु उनके मन को वास्तविक आध्यात्मिक शांति नहीं मिल पा रही थी. एक सच्चे गुरु की तलाश उनके भीतर लगातार बनी रही.

गुरु अंगद देव जी.

जब गुरु अंगद देव जी से हुआ मिलन

एक सुबह अमर दास जी ने अपनी पुत्रवधू बीबी अमरो जी के मुख से गुरु नानक देव जी की रचित अमृतमयी वाणी सुनी. बीबी अमरो जी सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी की सुपुत्री थीं. उस वाणी के मधुर शब्दों ने अमर दास जी के हृदय को गहराई से छू लिया. उन्होंने बीबी अमरो जी से उस वाणी और उसके रचयिता के बारे में पूछा. जब उन्हें पता चला कि यह गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी गुरु अंगद देव जी की वाणी है, तो वे तुरंत उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठे. 60 वर्ष से अधिक की आयु में वे खडूर साहिब पहुंचे और गुरु अंगद देव जी के चरणों में नतमस्तक हो गए.

खडूर साहिब में कठिन सेवा का संकल्प

खडूर साहिब पहुंचने के बाद अमर दास जी ने गुरु घर को ही अपना सर्वस्व मान लिया. उन्होंने लगभग 12 वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ और अहंकार के गुरु अंगद देव जी की सेवा की. उनकी सबसे प्रमुख सेवा यह थी कि वे प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में ब्यास नदी से पानी की गगरी भरकर लाते थे. इसी जल से गुरु अंगद देव जी प्रतिदिन स्नान करते थे. चाहे भीषण सर्दी हो, तेज आंधी हो या मूसलाधार बारिश, अमर दास जी का यह नियम कभी नहीं टूटा. वे अपनी वृद्धावस्था की परवाह किए बिना रात के अंधेरे में नदी तक पैदल जाते और जल लेकर लौटते थे.

गुरु अमरदास जी.

जुलाहे के गड्ढे वाली प्रसिद्ध घटना

एक रात भयंकर तूफान और बारिश हो रही थी. चारों तरफ गहरा अंधेरा था. अमर दास जी सिर पर जल की गगरी लेकर लौट रहे थे. रास्ते में उनका पैर एक जुलाहे के गड्ढ़े में फंस गया और वे गिर पड़े. गिरने के बावजूद उन्होंने सिर पर रखे जल के घड़े को गिरने या गंदा नहीं होने दिया. शोर सुनकर जुलाहा और उसकी पत्नी जाग गए. जुलाहे की पत्नी ने तंज कसते हुए कहा कि इस अंधेरी रात में जिसका कोई ठिकाना न हो वही भटकेगा.

जब यह बात गुरु अंगद देव जी तक पहुंची, तो उन्होंने अमर दास जी को गले से लगा लिया. गुरु जी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि अमर दास निथावों का थान , निओटों की ओट और निमाणों का मान हैं. इसके तुरंत बाद 1552 ईस्वी में 73 वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव जी ने उन्हें सिखों का तीसरा गुरु घोषित कर दिया.

पुत्रों की जगह अमर दास जी को क्यों चुना?

गुरु अंगद देव जी के दो पुत्र थे. दासू जी और दातू जी. इसके बावजूद गुरु जी ने अपने पुत्रों को गद्दी न सौंपकर अपने अनन्य सेवक अमर दास जी को गुरु पद दिया. इस निर्णय के पीछे मुख्य कारण आध्यात्मिक योग्यता, अहंकार का अभाव और संपूर्ण समर्पण था.

गुरु अंगद देव जी के पुत्र सांसारिक मोह और गद्दी के अहंकार से मुक्त नहीं हो पाए थे. दूसरी ओर, अमर दास जी ने वृद्धावस्था में भी अहर्निश सेवा करके यह सिद्ध किया कि गुरु पद केवल आंतरिक पवित्रता, विनम्रता और निष्काम सेवा से ही अर्जित किया जा सकता है. गुरु नानक देव जी की परंपरा के अनुसार उत्तराधिकारी का चयन केवल योग्यता के आधार पर ही हुआ.

सामाजिक सुधार और लंगर प्रथा का विस्तार

तीसरे गुरु बनने के बाद गुरु अमर दास जी ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध कड़े कदम उठाए. उन्होंने सती प्रथा, पर्दा प्रथा और जातिगत छुआछूत का खुलकर विरोध किया. उन्होंने पहले पंगत, पाछे संगत का नियम अनिवार्य किया. इसका अर्थ था कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह राजा हो या रंक, पहले पंक्ति में बैठकर साधारण लंगर खाएगा, उसके बाद ही गुरु जी से मिल सकेगा. यहां तक कि जब मुगल बादशाह अकबर उनसे मिलने आया, तो उसने भी पहले जमीन पर बैठकर लंगर चखा.

गुरु राम दास जी.

भाई जेठा जी यानी गुरु राम दास जी का आगमन

गुरु अमर दास जी के समय लाहौर से एक अनाथ बालक भाई जेठा जी गोइंदवाल साहिब आए. वे बहुत गरीब थे और अपना जीवन यापन करने के लिए उबले हुए चने बेचा करते थे. भाई जेठा जी अत्यंत विनम्र, सेवाभावी और ईश्वरभक्त स्वभाव के थे. वे जो कुछ कमाते, उसका एक हिस्सा साधुसंतों और जरूरतमंदों में बांट देते थे. वे गोइंदवाल साहिब में चल रहे बावली के निर्माण कार्य में दिनरात मिट्टी ढोने की कठिन सेवा करते थे.

बीबी भानी जी से विवाह और दामाद बनना

गुरु अमर दास जी की सुपुत्री बीबी भानी जी भी अत्यंत धार्मिक और सेवाभावी विचारों की थीं. जब माता मनसा देवी जी ने बीबी भानी जी के विवाह के लिए योग्य वर खोजने की बात कही, तो गुरु अमर दास जी ने बाहर खेलने जा रहे भाई जेठा जी की ओर संकेत किया. गुरु जी ने कहा कि इस बालक जैसा केवल यही बालक है. इस प्रकार भाई जेठा जी का विवाह बीबी भानी जी के साथ हुआ और वे गुरु अमर दास जी के दामाद बने. विवाह के बाद भी भाई जेठा जी के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया. उन्होंने कभी स्वयं को गुरु का दामाद नहीं समझा, बल्कि एक साधारण सेवक की भांति गुरु घर की सेवा जारी रखी.

पुत्रों को छोड़कर दामाद को उत्तराधिकारी क्यों बनाया?

गुरु अमर दास जी के दो पुत्र थे. बाबा मोहन जी और बाबा मोहरी जी. जब उत्तराधिकारी चुनने का समय आया, तो गुरु जी ने वंशवाद के स्थान पर पुनः त्याग, सेवा और आध्यात्मिक गहराई को प्राथमिकता दी. बाबा मोहन जी अक्सर एकांत में ध्यान साधना में लीन रहते थे और उनमें संगठन चलाने व जनसाधारण का मार्गदर्शन करने की रुचि कम थी. वहीं बाबा मोहरी जी सांसारिक स्वभाव के थे. गुरु पद के लिए जिस अगाध धैर्य, विनम्रता और नेतृत्व क्षमता की आवश्यकता थी, वह केवल भाई जेठा जी में ही दिखाई दी.

क्या थी चबूतरों के निर्माण की कठिन परीक्षा?

उत्तराधिकार का निर्णय करने के लिए गुरु अमर दास जी ने एक परीक्षा रखी. उन्होंने अपने पुत्रों और भाई जेठा जी को एकएक चबूतरा बनाने का आदेश दिया. जब चबूतरे बनकर तैयार हुए, तो गुरु जी ने उन्हें देखकर कहा कि यह ठीक नहीं बना है, इसे तोड़कर दोबारा बनाओ. पुत्रों ने एकदो बार चबूतरा बनाया, लेकिन बारबार तोड़े जाने पर वे झुंझला गए और बोले कि गुरु जी वृद्ध हो गए हैं और व्यर्थ में कमियां निकाल रहे हैं. इसके विपरीत, भाई जेठा जी ने लगातार कई बार चबूतरा बनाया और तोड़ा. हर बार वे हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करते रहे कि वे नासमझ हैं और गुरु जी की आज्ञा के अनुसार सही निर्माण नहीं कर पा रहे हैं. उनकी इस असीम सहनशीलता, निरहंकारिता और आज्ञाकारिता ने यह सिद्ध कर दिया कि वे ही इस सर्वोच्च पद के वास्तविक अधिकारी हैं.

गुरु राम दास जी को गुरु गद्दी सौंपना

भाई जेठा जी की अटूट श्रद्धा और सेवा भाव को देखकर गुरु अमर दास जी ने 1574 ईस्वी में उन्हें सिखों का चौथा गुरु नियुक्त किया और उन्हें गुरु राम दास नाम दिया. गुरु अमर दास जी के छोटे पुत्र बाबा मोहरी जी ने पिता के इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार किया और गुरु राम दास जी के चरणों में शीश नवाया. इस निर्णय ने पुनः स्थापित किया कि सिख पंथ में गुरु का स्थान पारिवारिक रक्तसंबंधों से नहीं, बल्कि आत्मा के समर्पण और सेवा से तय होता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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