
हिंदू धर्म में पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। अधिक मास में पड़ने वाली पूर्णिमा को ‘अधिक पूर्णिमा’ कहा जाता है। अधिक मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है क्योंकि अधिकमास 3 वर्ष में आता है, इस बार ज्येष्ठ का महीना अधिकमास है। अधिक मास की शुरुआत 17 मई को हुई और इसका समापन 15 जून को होगा। इस बार अधिक पूर्णिमा कल यानी 31 मई 2026, रविवार को मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में माना जाता है कि यह पूर्णिमा आम पूर्णिमा से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली और फलदायी मानी जाती है।
क्या है अधिक पूर्णिमा?
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच 11 दिनों का अंतर होता है। इसी संतुलन बनाए रखने के लिए हर तीसरे साल ( लगभग ढाई से तीन वर्ष के अंचराल पर) एक अतिरिक्त महीना होता है। इसको अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा को अधिक पूर्णिमा कहा जाता है।
भगवान विष्णु से है सीधा संबंध
धार्मिक ग्रंथों में भगवान विष्णु को पुरुषोत्तम नाम से भी संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है कि सभी पुरुषों में श्रेष्ठ। मान्यता है कि अधिमास या पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए इसे विशेष रूप से पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। जब पूर्णिमा तिथि इस पवित्र माह में आती है, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा-अर्चना से भक्तों को श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, साथ ही माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी मिलता है। इसी वजह से पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा को अत्यंत पुण्यदायी और विशेष फलदायी माना जाता है।
क्यों कहलाती है ‘सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा’?
धार्मिक ग्रंथों जैसे कि स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण और भविष्यपुराण में अधिक मास की पूर्णिमा को ‘सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा’ के रूप में दर्शाया गया है। आम पूर्णिमा पर जहां चंद्र देव और लक्ष्मी जी की पूजा होती है, वहीं अधिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। यह पूर्णिमा आपके जीवन के सभी कष्टों को दूर करके सिद्धियों के द्वार खोलती है।
मिलते हैं ये लाभ
– धार्मिक पुराणों के अनुसार, इस दिन दान, जप, व्रत और कथा श्रवण करने से 100 यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
– भगवान विष्णु की विशेष आराधना करने से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का शमन किया जा सकता है और व्यक्ति को मोक्ष की तरफ बढ़ता है।
– धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन किए गए सभी कार्यों का फल कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए अधिक पूर्णिमा को अक्षय पुण्य करने की तिथि कही जाती है।
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