क्या आप जानते हैं कि खान-पान में बदलाव करके अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी न्यूरोलॉजिकल दिमागी बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में कीटो डाइट (Ketogenic Diet) को लेकर कुछ सकारात्मक और शुरुआती संकेत मिले हैं। वजन घटाने के लिए लोकप्रिय मानी जाने वाली कीटो डाइट (Ketogenic Diet) केवल वजन कम करने तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं का मानना है कि कीटो डाइट से मिलने वाले कीटोन्स दिमाग की कोशिकाओं को ऊर्जा दे सकते हैं। हालांकि, मेडिकल एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों का कहना है कि ये नतीजे अभी शुरुआती स्तर पर हैं और आम लोगों को बिना न्यूरोलॉजिस्ट या डॉक्टर की सलाह के ऐसी किसी भी सख्त डाइट को खुद से शुरू नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसके दूसरे गंभीर हेल्थ जोखिम हो सकते हैं।

पुर्तगाल के यूनिवर्सिटी ऑफ कोइंब्रा के शोधकर्ताओं ने इस विषय पर की गई कई रिसर्च की समीक्षा की और पाया कि कीटो डाइट मस्तिष्क की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार कई न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों में दिमाग ग्लूकोज का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता। ऐसे में कीटोन्स मस्तिष्क के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत का काम कर सकते हैं। अध्ययन में बताया गया कि अल्जाइमर रोग में कीटोन्स न्यूरॉन्स को ऊर्जा देते हैं और उनकी कार्यक्षमता और स्थिरता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। आइए रिसर्च से जानते हैं कि कीटो डाइट क्या है और इस डाइट से किस तरह दिमागी बीमारियों में मदद मिलती है।
क्या होती है कीटो डाइट?
कीटो डाइट एक ऐसी डाइट है जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स का सेवन बहुत कम कर दिया जाता है और फैट तथा प्रोटीन का सेवन बढ़ाया जाता है। सामान्य डाइट में शरीर ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) का उपयोग करता है। कीटो डाइट में कार्ब की मात्रा बहुत कम यानी दिन में लगभग 20-50 ग्राम कर दी जाती है。 जब शरीर को पर्याप्त ग्लूकोज नहीं मिलता, तो वह ऊर्जा के लिए लीवर में जमा Fats को तोड़ना शुरू कर देता है, जिससे ‘कीटोन्स’ (Ketones) बनते हैं। यही कीटोन्स शरीर और दिमाग को ऊर्जा प्रदान करते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक कीटोन शरीर में सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। पशुओं पर किए गए कुछ अध्ययनों में पार्किंसंस और मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियों में सूजन कम होने के संकेत मिले हैं। इसके अलावा कीटो डाइट ऑटोफैगी नामक प्रक्रिया को भी बढ़ावा दे सकती है। यह शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रणाली है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाने में मदद करती है।
आंतों और दिमाग के बीच संबंध
शोधकर्ताओं ने बताया कि कीटो डाइट आंतों में मौजूद कुछ गुड बैक्टीरिया को बढ़ावा दे सकती है। ये बैक्टीरिया बेहतर ब्रेन हेल्थ और मानसिक कार्यक्षमता से जुड़े हुए माने जाते हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक आंत और मस्तिष्क के बीच मजबूत संबंध होता है, जिसे “गट-ब्रेन एक्सिस” कहा जाता है।
क्या कीटो डाइट को इलाज के रूप में अपनाया जा सकता है?
शोधकर्ताओं का कहना है कि कीटो डाइट भविष्य में न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के इलाज का पूरक विकल्प बन सकती है। यह बीमारी-विशिष्ट उपचारों के साथ मिलकर मरीजों में लक्षणों को कंट्रोल और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। हालांकि अभी इसे पूर्ण उपचार के रूप में नहीं माना जा सकता। अध्ययन में शामिल अधिकांश शोध जानवरों पर किए गए थे। इसलिए यह स्पष्ट करने के लिए कि इंसानों में इसके प्रभाव कितने कारगर हैं, बड़े स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल की आवश्यकता है।
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कीटो डाइट के कुछ नुकसान भी हैं
एक्सपर्ट के मुताबिक ये डाइट ब्रेन हेल्थ के लिए फायदेमंद है लेकिन इसके बॉडी के लिए कुछ साइड इफेक्ट भी हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक इस डाइट का सेवन करना आसान नहीं होता। कई लोगों में इससे कब्ज, नींद की समस्या, थकान और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने जैसी परेशानियां देखी गई हैं। कई पुरानी रिसर्च बताती हैं कि लंबे समय तक कीटो डाइट का पालन करने से टाइप-2 डायबिटीज और दिल के रोगों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इसके संभावित लाभों और जोखिमों दोनों को ध्यान में रखना जरूरी है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक कीटो डाइट दिमागी बीमारियों से जुड़े कुछ जैविक कारणों को प्रभावित कर सकती है और मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता रखती है लेकिन इसे चमत्कारी उपाय नहीं माना जा सकता। इसके वास्तविक फायदे और जोखिमों को समझने के लिए इंसानों पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख एक वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है। किसी भी नई डाइट या उपचार पद्धति को अपनाने से पहले डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।












