इस समय दुनिया में जिस तरह से एनर्जी क्राइसिस की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने इकोनॉमी को स्टेबल रखने की बड़ी चुनौती है. RBI गवर्नर की बड़ी अग्निपरीक्षा होने वाली है क्योंकि ग्लोबल टेंशन से पैदा हुआ संकट सीधे सरकार या RBI के कंट्रोल में नहीं है. ट्रंप और ईरान के बीच जंग जारी रहती है तो हालात और गंभीर हो सकते हैं. पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने की भी आशंका है. ऐसे माहौल में 3 से 5 जून के बीच होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी बैठक में RBI क्या फैसला लेता है, इसका सीधा असर आम लोगों की EMI पर पड़ेगा.
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ईटी की ओर से किए गए एक सर्वे के मुताबिक, 15 में से 11 इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि 3-5 जून को होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होगा. वहीं चार इकोनॉमिस्ट्स ने 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है. ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI जून की बैठक में पॉलिसी रेट को बिना बदलाव के रख सकता है. इसकी वजह भू-राजनीतिक तनाव और खराब मौसम के अनुमान हैं, जिनसे इकोनॉमिक ग्रोथ पर असर पड़ सकता है और महंगाई बढ़ सकती है. हालांकि आगे चलकर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है.
साल भर में बढ़ सकते हैं रेट
इन्हीं 15 में से 13 इकोनॉमिस्ट्स ने पूरे वित्त वर्ष में कुल 50-75 बेसिस पॉइंट तक रेट बढ़ने की उम्मीद जताई है. बाकी दो का मानना है कि RBI पूरे साल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा. अप्रैल की बैठक में MPC ने रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखा था. जून की बैठक ऐसे समय में हो रही है जब फ्यूल की कीमतें बढ़ रही हैं और अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण रुपया तेजी से कमजोर हुआ है. साथ ही अल नीनो की स्थिति का खतरा भी बना हुआ है, जिससे मानसून प्रभावित हो सकता है. इसका असर खाद्य उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है.
जो इकोनॉमिस्ट्स रेट में बदलाव न करने के पक्ष में हैं, उनका मानना है कि मौजूदा महंगाई का दबाव मुख्य रूप से सप्लाई से जुड़ा हुआ है. इसलिए ऊंची ब्याज दरों का इस पर ज्यादा असर नहीं होगा. उनका कहना है कि ऐसे समय में उधार महंगा करने से महंगाई पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन इकोनॉमिक ग्रोथ जरूर धीमी हो सकती है.
महंगाई पर फोकस
IDFC First Bank की मुख्य इकोनॉमिस्ट गौरा सेन गुप्ता ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से सप्लाई साइड पर बड़ा झटका लगा है. उनके अनुसार, इस स्थिति से निपटने के लिए मॉनेटरी पॉलिसी सबसे प्रभावी तरीका नहीं है क्योंकि यह मुख्य रूप से डिमांड पर असर डालती है. ऐसे में रेट बढ़ाने से मांग और कमजोर हो सकती है. हालांकि जिन इकोनॉमिस्ट्स को रेट बढ़ने की उम्मीद है, उनका कहना है कि मॉनेटरी पॉलिसी का मुख्य फोकस महंगाई की उम्मीदों को कंट्रोल में रखना होना चाहिए. पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद FY27 में महंगाई 5% से 5.5% के बीच रहने का अनुमान है. फ्यूल की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना भी जताई जा रही है. ऐसे में RBI को भविष्य का इंतजार करने के बजाय अभी कदम उठाने पर विचार करना चाहिए.
स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में भारत आर्थिक रिसर्च प्रमुख अनुभूति सहाय को भी 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है. उनका अनुमान है कि RBI FY27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 4.9% कर सकता है. उनका कहना है कि रुपये में तेज गिरावट से महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है, जिससे रेट बढ़ाने की जरूरत और मजबूत हो जाती है. RBI ने अप्रैल में अनुमान लगाया था कि FY27 में औसत महंगाई 4.6% रहेगी और इकोनॉमी 6.9% की दर से बढ़ेगी. कुछ इकोनॉमिस्ट्स को उम्मीद है कि RBI ऐसे कदमों की घोषणा कर सकता है जो रुपये पर दबाव डाल रही विदेशी पूंजी निकासी की समस्या को कम करने में मदद करें.
कितनी हो सकती है बढ़ोतरी?
MUFG, Canara Bank और Nomura जैसे संस्थानों को उम्मीद है कि लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) की सीमाओं को सख्त किया जा सकता है और फॉरवर्ड हेजिंग से जुड़े अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने एक नोट में कहा कि रुपये पर बढ़ता दबाव वैश्विक अनिश्चितता के दौर में लगातार नीतिगत समर्थन की जरूरत को दर्शाता है. FY26 में रुपया करीब 11% कमजोर हुआ था और FY27 में अब तक 3% से ज्यादा गिर चुका है.
वहीं, बार्कलेज की मुख्य भारत इकोनॉमिस्ट आस्था गुडवानी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि RBI ने फरवरी 2025 से ब्याज दरों में कटौती शुरू की थी और कुल 125 बेसिस पॉइंट की कमी कर रेपो रेट को 5.25% तक लाया गया था. दिसंबर 2025 में आखिरी कटौती के बाद MPC लगातार यथास्थिति बनाए हुए है. उनका मानना है कि भले ही CPI महंगाई RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है, लेकिन MPC इसे सप्लाई शॉक मानते हुए अपनी “न्यूट्रल पॉज” यानी फिलहाल इंतजार और निगरानी की नीति पर कायम रह सकती है.
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