नई दिल्ली: हॉलीवुड की 2008 में एक फिल्म ‘वॉल-ई’ आई थी, जिसमें प्रलय के बाद धरती को बंजर जमीन के रूप में दिखाया गया था। उस फिल्म में पूरी मानव सभ्यता नष्ट हो गई थी। धरती पर बस रोबोट बच गए थे। रोबोट का इकलौता प्रलय के बाद जिंदा बचा साथी था कॉकरोच, जिसे हिंदी में तिलचट्टा भी कहा जाता है।

फिल्म में उस मिथक की ओर इशारा किया है कि कॉकरोच हम इंसानों से ज्यादा समय तक प्रलय के बाद भी जिंदा रहने में सक्षम हैं। कॉकरोच की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि देश-दुनिया में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की चर्चा जोरों पर है। इसकी स्थापना 30 साल के पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट अभिजीत दीपके ने की है। दरअसल, यह पार्टी तब बनी जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बीते 15 मई को उन कुछ बेरोजगार युवाओं के लिए’कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ वाली टिप्पणी की थी, जो बात की गंभीरता समझे बिना सिस्टम को कोसते रहते हैं।
कॉकरोच: घिनौने मगर बेहद सहनशील
PERSUIT पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉकरोच वैसे तो दिखने में काफी घिनौने लगते हैं। मगर, ये रेंगने वाले जीव अपनी सहनशीलता के लिए जाने जाते हैं। शायद इसी वजह से यह धारणा बनी कि वे परमाणु बम विस्फोट और उसके बाद विकिरण के संपर्क में आने से भी बच सकते हैं।
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मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि 30 करोड़ साल से धरती पर मौजूद कॉकरोच से जुड़ा यह मिथक हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु बम विस्फोटों के बाद कीटों की बढ़ती संख्या की अफवाहों से उपजा है।
ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में स्कूल ऑफ पॉपुलेशन एंड ग्लोबल हेल्थ के प्रोफेसर टिलमैन रफ के अनुसार, मैंने अभी तक ऐसा कोई दस्तावेजी सबूत नहीं देखा है कि मलबे में तिलचट्टे रेंग रहे थे। प्रोफेसर टिलमैन रफ परमाणु विस्फोटों के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय परिणामों का अध्ययन करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता हैं।
मैंने हिरोशिमा में घायल लोगों की ऐसी तस्वीरें देखी हैं जिनमें उनके आसपास बहुत सारी मक्खियां थीं और आप कल्पना कर सकते हैं कि कुछ कीड़े बच गए होंगे। लेकिन वे भी प्रभावित हुए होंगे, भले ही वे मनुष्यों की तुलना में अधिक प्रतिरोधी दिखाई देते हों।
कॉकरोच: ज्यादा रेडिएशन पर क्या हुआ असर
अमेरिकी टीवी श्रृंखला ‘मिथबस्टर्स’ ने 2012 में कॉकरोच के जीवित रहने के सिद्धांत का परीक्षण किया। उस दौरान प्रयोग के दौरान कॉकरोच को रेडियोएक्टिव पदार्थों के संपर्क में लाया गया। यह देखा गया कि कॉकरोच इंसानों की तुलना में ज्यादा वक्त जीवित रहे। हालांकि, जब विकिरण का लेवल ज्यादा बढ़ा तो सभी मर गए।
कॉकरोच: दूसरे एक्सपर्ट ने कहा-ये नतीजे अधूरे
मेलबर्न यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज के विकासवादी जीवविज्ञानी प्रोफेसर मार्क एल्गर कहते हैं कि ‘मिथबस्टर्स’ परीक्षण के परिणाम अधूरे हैं क्योंकि उन्होंने केवल यह देखा कि विकिरण के संपर्क में आने के बाद कॉकरोच कितने दिन जीवित रहे। उन्होंने कॉकरोच की अंडे देने की क्षमता का अध्ययन नहीं किया, जिससे प्रजाति का निरंतर अस्तित्व सुनिश्चित हो सके।
कॉकरोच की जंगली प्रजातियों ने बाकियों को किया बदनाम
विकिरण के संपर्क में आए कीड़ों पर किए गए पिछले परीक्षणों में पाया गया कि कॉकरोच इंसानों की तुलना में छह से पंद्रह गुना अधिक रेडिएशन प्रतिरोधी हैं। इसके बावजूद कॉकरोच साधारण फल मक्खी से भी बदतर स्थिति में होंगे। प्रोफेसर एल्गर कहते हैं कि कॉकरोच की जंगली अमेरिकी और जर्मन प्रजातियों ने बाकी प्रजातियों को बदनाम कर दिया है, जिन्हें आप शायद अपनी रसोई के कोनों में देख सकते हैं।
कॉकरोच कितने दिन बिना खाना-पानी के रह सकते हैं
कॉकरोच बिना भोजन के आश्चर्यजनक रूप से लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। औसतन वे बिना खाए एक महीने तक जीवित रह सकते हैं। ऐसा उनके ठंडे रक्त वाले स्वभाव के कारण होता है, जो उन्हें अपने मेटाबॉलिज्म को धीमा करने और ऊर्जा बचाने में सक्षम बनाता है। भोजन के बिना तिलचट्टों का यह प्रभावशाली जीवनकाल उन्हें अत्यधिक अनुकूलनीय कीट बनाता है।
भोजन के विपरीत पानी कॉकरोच के जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी है। कॉकरोच की अधिकांश प्रजातियां पानी के बिना केवल एक सप्ताह तक ही जीवित रह सकती हैं। चूंकि तिलचट्टे तेजी से डिहाइड्रेशन का शिकार होते हैं, इसलिए वे रसोई, बाथरूम, तहखाने और नालियों जैसे नम क्षेत्रों में रहना पसंद करते हैं।
कॉकरोच 40 मिनट तक बिना सांस लिए जिंदा रह सकते हैं। कॉकरोच के शरीर में इंसानों की तरह सांस लेने के लिए नाक या फेफड़े नहीं होते हैं। उनके पूरे शरीर में छोटी-छोटी नलिकाएं होती हैं, जिससे वो सांस ले पाते हैं। ऐसे में अगर किसी कॉकरोच का सिर भी कट जाए या हाथ-पैर कट जाए तो भी वो जिंदा रह सकते हैं। वो बिना सिर के भी दो हफ्ते तक जीवित रह सकते हैं।





