Petrol and Diesel Prices May Rise Soon : भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और पश्चिम एशिया में तनाव ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs), सरकारी वित्त और देश के आयात बिल पर दबाव डाल रहे हैं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड का दाम 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बाद भारत ‘फ्यूल प्राइसिंग इनफ्लेक्शन प्वाइंट’ के करीब पहुंच गया है. ये स्थिति अमेरिका-ईरान संघर्ष और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के कारण बनी है. हालांकि, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ रही है. एनालिस्ट का मानना है कि उपभोक्ताओं को अचानक भारी झटका देने के बजाय धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

15 मई के बाद बढ़ सकते हैं फ्यूल के दाम
इंफोर्मेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मनोहरन शर्मा ने कहा कि अब दबाव नीतिगत फैसले से ज्यादा आर्थिक परिस्थितियों के कारण बन रहा है. उन्होंने कहा, ‘ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है. ऐसे में 15 मई के बाद ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी काफी संभव है.’ अनुमान है कि पेट्रोल और डीजल के दाम 4-5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं, जबकि एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 40-50 रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है.
तेल कंपनियों पर भारी घाटा
ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) मौजूदा समय में बाजार मूल्य से कम दर पर ईंधन बेचकर भारी नुकसान झेल रही हैं. OMCs हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो ये दबाव और बढ़ सकता है.
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85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है भारत
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. इससे घरेलू ईंधन की कीमतें वैश्विक बाजार और जियो-पॉलिटिकल घटनाओं से सीधे प्रभावित होती हैं.
क्या अचानक तेज बढ़ोतरी होगी?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार अचानक बड़ी बढ़ोतरी से बचना चाहेगी ताकि महंगाई पर बड़ा असर न पड़े. महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए धीरे-धीरे 2-4 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी ज्यादा संभव है. हालांकि, अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो मिश्रित रणनीति अपनाई जा सकती है.
क्या ये अस्थायी तेल संकट है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में ईंधन खपत कम करने की अपील को अर्थशास्त्रियों ने बढ़ते कच्चे तेल की कीमतों के संदर्भ में देखा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक अस्थायी स्थिति हो सकती है और जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव कम होगा, कीमतों में गिरावट संभव है.
आम जनता पर असर
ईंधन की कीमतें बढ़ने का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. इससे ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, फूड डिस्ट्रीब्यूशन, हवाई किराए और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. इसका सीधा असर घरेलू बजट और महंगाई पर पड़ता है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर लंबे समय तक रहता है, तो महंगाई पर दबाव और बढ़ सकता है.





