दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनियों में गिनी जाने वाली टोयोटा की शुरुआत किसी कार फैक्ट्री से नहीं, बल्कि कपड़ा बुनने की मशीन से हुई थी. जापान का जो इलाका आज एशियन गेम्स की मेजबानी कर रहा है, वही आइचीनागोया क्षेत्र इस कंपनी की जन्मभूमि है. 20वें एशियन गेम्स का उद्घाटन 19 सितंबर की शाम नागोया के मिजुहो पार्क एथलेटिक स्टेडियम में हुआ, जहां जापान के सम्राट नारुहितो ने खेलों की शुरुआत की घोषणा की.

जापान तीसरी बार एशियन गेम्स की मेजबानी कर रहा है, इससे पहले 1958 में टोक्यो और 1994 में हिरोशिमा में ये खेल हुए थे. उद्घाटन समारोह में नागोया और आइची की खूबियों के साथ जापान की परंपरा, तकनीक और औद्योगिक तरक्की को भी दिखाया गया. यही औद्योगिक विरासत टोयोटा की कहानी से जुड़ी है.
बढ़ई का बेटा, जिसने करघा बदल दिया
टोयोटा की कहानी सकिची टोयोडा से शुरू होती है. उनका जन्म 1867 में शिजुओका प्रांत के एक ग्रामीण इलाके में एक बढ़ई के घर हुआ था. उस इलाके की महिलाएं हाथ करघों पर सूती कपड़ा बुनकर परिवार की आमदनी में हाथ बंटाती थीं. मेहनत भरे इसी काम को आसान बनाने ने सपने ने सकिची को आविष्कारक बना दिया.
सकिची टोयोडा.
1891 में उन्हें अपने लकड़ी के हाथ करघे का पहला पेटेंट मिला. कंपनी की जानकारी के मुताबिक यह करघा एक हाथ से चल जाता था और कपड़ा बनाने में पहले के करघों से 40 से 50 फीसदी तेज था. इसके बाद सकिची ने करघों को बेहतर बनाने में पूरी जिंदगी लगा दी.
जब नागोया में लगी पहली बड़ी फैक्ट्री
अक्टूबर 1911 में सकिची ने नागोया इलाके में करीब 9,900 वर्ग मीटर जमीन किराये पर ली और नया प्लांट बनवाना शुरू किया. यह प्लांट सितंबर 1912 में तैयार हुआ. यही आगे चलकर टोयोडा बोशोकु बना, जिससे टोयोडा ऑटोमैटिक लूम वर्क्स और फिर टोयोटा मोटर का सफर शुरू हुआ. उस दौर की ईंटों वाली इमारत आज भी नागोया में खड़ी है और अब उसमें टोयोटा का औद्योगिक और तकनीकी संग्रहालय है.
जापान का टोयोटा म्यूजियम.
टाइपजी ऑटोमेटिक करघा बनाया
1924 में सकिची ने टाइपजी ऑटोमैटिक करघा बनाया, जिसमें बिना रुके शटल बदलने की व्यवस्था थी और इसे अपनी तरह का दुनिया में पहला करघा माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी थी कि ताना धागा टूटते ही मशीन अपने आप बंद हो जाती थी. इसके पीछे की सोच को “जिदोका” कहा गया, यानी “इंसानी समझ वाला ऑटोमेशन”. कर्मचारी को हर वक्त मशीन देखते रहने की जरूरत नहीं रही और एक कर्मचारी कई मशीनें संभालने लगा.
इस करघे के उत्पादन के लिए सकिची ने 1926 में टोयोडा ऑटोमैटिक लूम वर्क्स की स्थापना की. यही जिदोका की सोच आगे चलकर टोयोटा की उत्पादन संस्कृति का हिस्सा बनी.
किइचिरो.
एक लाख पाउंड की डील और बेटे का सपना
टोयोटा की कहानी का सबसे बड़ा मोड़ 1929 में आया. ब्रिटेन की करघा कंपनी प्लैट ब्रदर्स ने टाइपजी करघे के अधिकार के लिए 1 लाख पाउंड की कीमत तय की. यह अधिकार जापान, चीन और अमेरिका को छोड़कर पूरी दुनिया के लिए था. इसी रकम को टोयोटा मोटर कंपनी शुरू करने की शुरुआती पूंजी के रूप में इस्तेमाल किया गया.
सकिची के बेटे किइचिरो ने कारों का सपना देखा. 1929 में वे कारों को समझने यूरोप और अमेरिका गए, 1930 में पेट्रोल इंजन पर रिसर्च शुरू हुई और 1933 में टोयोडा ऑटोमैटिक लूम वर्क्स के भीतर ऑटोमोबाइल विभाग बना. सकिची का निधन 30 अक्टूबर 1930 को हो गया और वे कार बनते हुए नहीं देख पाए. 1935 में पहली प्रोटोटाइप कार A1 और G1 ट्रक तैयार हुए और 1936 में G1 ट्रक का निर्यात हुआ.
टोयोडा से टोयोटा कैसे पड़ा नाम?
कंपनी का असली नाम टोयोडा था. नाम बदलने की वजह उच्चारण बताई जाती है, इसलिए टोयोटा भले आज कार कंपनी के रूप में जानी जाती है, पर उसकी शुरुआत कपड़ा मशीन बनाने वाली टोयोडा के रूप में हुई थी. एक लोकप्रिय मान्यता यह भी है कि जापानी लिपि में “टोयोटा” लिखने पर 8 स्ट्रोक बनते हैं, जिसे शुभ माना जाता है। हालांकि यह मान्यता ही है, इसकी पुष्टि कंपनी के दस्तावेजों से नहीं होती. 1937 में टोयोटा मोटर कंपनी अलग कंपनी बनी.