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कभी आपस में उलझे, कभी राजनीतिक दलाें के निशाने पर आए, चुनाव आयुक्त के विवादों की कहानी​

यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल और बवाल है. पहले भी कई मौके आए जब आयोग के खिलाफ राजनीतिक दल सड़कों पर उतरे. चुनाव आयुक्तों की ईमानदारी को संदिग्ध बताया. सत्ता दल के प्रभाव में काम करने के आरोप लगे. सड़कों से संसद तक टकराव हुआ. यहां तक कि […]

यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल और बवाल है. पहले भी कई मौके आए जब आयोग के खिलाफ राजनीतिक दल सड़कों पर उतरे. चुनाव आयुक्तों की ईमानदारी को संदिग्ध बताया. सत्ता दल के प्रभाव में काम करने के आरोप लगे. सड़कों से संसद तक टकराव हुआ. यहां तक कि त्रिसदस्यीय आयोग गठन बाद चुनाव आयुक्तों के बीच परस्पर असहमति आरोपप्रत्यारोप सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गए. निपटारे के लिए इन्हें सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाया गया.

इन दिनों जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोपों की बौछार करते हुए उनकी पद से छुट्टी की मांग लेकर धरनाप्रदर्शन जारी है और विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है. एक नज़र चुनाव आयोग से जुड़े कुछ विवादों पर.

शेषन जिन्होंने चुनाव आयोग की ताकत का दिया संदेश

यह टीएन शेषन थे, जिन्होंने चुनाव आयोग की शक्तियों से राजनीतिक दलों के साथ ही आम वोटरों को परिचित कराया. शुरुआती हिचक के बाद उन्होंने यह पद स्वीकार किया था. लेकिन एक बार जब यह जिम्मेदारी ले ली तो ऐसे अनेक कदम उठाए, जिससे वे कभी सत्ता दल तो कभी विपक्ष के निशाने पर आए. उन्हीं के दौर में सरकार ने जरूरी समझा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को नियंत्रित करने के लिए आयोग को त्रिसदस्यीय बनाया जाए.

टीएन शेषन.

शेषन के 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 के छह वर्षों के कार्यकाल में पहली बार आयोग की वास्तविक शक्ति और उसकी स्वायत्तता का देश ने अनुभव किया था. अपने निर्भीक फैसलों और चुनाव अवधि में आयोग की शक्तियों के प्रयोग के जरिए बूथ पर कब्जों, बैलेट की लूट और चुनावी हिंसा की घटनाओं में कमी और किसी हद तक निष्पक्ष , पारदर्शी चुनाव सम्पन्न कराने में वे सफल रहे.

प्रधानमंत्री राव से कहा, सरकार माफी मांगे

सरकारें पहले भी चुनाव आयोग को अपने प्रभाव में लेती रही होंगी. लेकिन यह शेषन थे, जिन्होंने इसे बेपर्दा किया. अपनी आत्मकथा Through The Broken Glass में उन्होंने लिखा कि विधि सचिव रमा देवी ने उनसे कहा कि विधि राज्य मंत्री रंगराजन कुमारमंगलम चाहते हैं कि इटावा का लोकसभा उपचुनाव टाल दिया जाए. शेषन ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को सीधे फोन किया और कहा “अगर यह गलतफहमी है कि मैं घोड़ा हूं और सरकार घुड़सवार तो मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा.”

राव ने शेषन से पूछा कि आप क्या चाहते हैं? शेषन का दो टूक जवाब था, आप माफी मांगें. शेषन ने आगे लिखा ,” आपकी खुद की माफी भी स्वीकार होगी. लेकिन लंबी सरकारी सेवा का अनुभव बताता है कि यह काम विभाग के अधिकारियों द्वारा किया जाता है.” उसी दिन विधि विभाग के एक संयुक्त सचिव शेषन के पास विधि सचिव रमा देवी की इटावा उपचुनाव मसले में कहे लिखे के लिए माफी की चिट्ठी लेकर पहुंचे थे. इसके पहले शेषन का विधि मंत्री विजय भास्कर रेड्डी से भी संसद में निर्वाचन आयोग से जुड़े सवालों के जवाब भेजने के मुद्दे पर टकराव हो चुका था.

चुनाव आयोग.

शेषन ने उन्हें बताया था कि निर्वाचन आयोग सरकार का कोई विभाग नहीं है. रेड्डी शिकायत लेकर प्रधानमंत्री राव के पास गए. राव की मौजूदगी में रेड्डी ने शेषन से कहा कि आप सहयोग नहीं कर रहे हैं. शेषन का जवाब था कि मैं कोऑपरेटिव सोसायटी नहीं हूं. मैं निर्वाचन आयोग का प्रतिनिधित्व करता हूं. फिर राव की ओर मुखातिब होते हुए शेषन ने कहा था ,” मिस्टर प्राइम मिनिस्टर अगर आपके मिनिस्टर का यही रवैया रहा तो इनके साथ मैं काम नहीं कर सकता.”

वो फैसला जिसने संवैधानिक संकट पैदा किया

1993 में शेषन के उस फैसले ने गम्भीर संवैधानिक संकट पैदा कर दिया जब उन्होंने 21 राज्यों में चुनावों से जुड़ी समूची प्रक्रिया स्थगित करने का आदेश दे दिया. उनका कहना था कि जब तक केन्द्र सरकार निर्वाचन आयोग के अधिकार को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करती, चुनावी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाएगी. नौ दिन तक इस आदेश को लेकर गतिरोध बना रहा. सत्ता दल और विपक्षी जो आमतौर पर एकदूसरे के विरुद्ध रहते थे—संसद में शेषन की आलोचना करने के मामले में एक साथ दिखाई दिए.

तीन उच्च न्यायालयों ने शेषन के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक भी लगा दी. सर्वोच्च न्यायालय की दखल के बाद शेषन ने अपने आदेश पर पुनर्विचार किया और अधिकांश चुनावों के लिए नई तारीखें निर्धारित कीं. इस असाधारण घटनाक्रम ने निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्ति की सीमा और मुख्य चुनाव आयुक्त के उसके इस्तेमाल के तरीके पर नई बहस शुरू की.

आयोग के भीतर शुरू हुई खींचतान

1993 में ही चुनाव आयोग को लेकर दूसरा बड़ा विवाद खड़ा हुआ. केन्द्र सरकार ने 1 अक्टूबर 1993 को एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर निर्वाचन आयोग को त्रिसदस्यीय बना दिया. शेषन ने इस व्यवस्था को अपने अधिकारों को सीमित करने की कोशिश माना और सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली.

नवंबर 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम व्यवस्था में आयोग का पूरा नियंत्रण मुख्य चुनाव आयुक्त के हाथ में रखा, लेकिन उनसे अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से काम करने को कहा. बाद में यह मसला संविधान पीठ में पहुंचा. इस दौरान आयोग के आपसी मतभेद खुलकर सामने आए. एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति की शिकायत थी कि शेषन उन्हें विश्वास में नहीं लेते.

साफ है कि आयोग में असहमतियों का सिलसिला उसके त्रिसदस्यीय बनाए जाने के समय से शुरू हो गया था. सिर्फ सरकार से आयोग के रिश्ते ही नहीं आयोग के भीतर भी यह प्रश्न उठा कि उसके तीन सदस्य किस तरह काम करेंगे और मुख्य चुनाव आयुक्त की स्थिति कितनी सर्वोच्च होगी? बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त केवल इसलिए अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर अंतिम निर्णयकर्ता नहीं हो जाते, क्योंकि वे आयोग के प्रमुख हैं. यह निर्णय निर्वाचन आयोग की सामूहिक संवैधानिक प्रकृति के लिए महत्वपूर्ण था.

पूर्व चुनाव आयुक्त जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति.

जब कृष्णमूर्ति ने गिल के विरोध में छुट्टी ली

ऐसा नहीं कि शेषन के समय से आयोग विवादों में घिरा. 1991 में पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया और कानूनव्यवस्था से जुड़े आयोग के रुख पर CPI ने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त की आलोचना की. 18 मई 1991 के पार्टी के बयान में आयोग के रुख को पक्षपातपूर्ण बताया गया. 1997 में चुनाव आयुक्त जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति ने मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल के रवैये पर आपत्ति करते हुए विरोध स्वरूप छुट्टी ले ली. उनका आरोप था कि शिवसेना से संबंधित एक मामले में आयोग का रवैया किसी दूसरे राजनीतिक दल के प्रति पक्षपातपूर्ण है. यह शिकायत किसी राजनीतिक दल की ओर से नहीं आयोग के एक सदस्य की ओर से की गई. साफ है कि आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उसके भीतर से भी उठे. अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद गिल ने कांग्रेस की सदस्यता ली. 2004 से 2016 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. 2008 2011 अवधि में यूपीए सरकार में उन्होंने मंत्रिपद की जिम्मेदारी भी संभाली.

गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश की

2009 में आयोग के भीतर के विवाद ने गंभीर रूप धारण कर लिया. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति से चुनाव आयुक्त नवीन चावला के पक्षपातपूर्ण रवैये की शिकायत करते हुए उन्हें हटाने की सिफारिश की. सरकार ने इसे नजरअंदाज किया. आगे चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त भी बनाया. इस विवाद ने चुनाव आयोग की संरचना, नियुक्तियों और राजनीतिक निष्पक्षता पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया. यह प्रसंग इसलिए और गंभीर था, क्योंकि इसमें किसी विपक्षी दल ने आयोग के सदस्य की निष्पक्षता पर सवाल नहीं किया, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक सहयोगी के प्रति अविश्वास जाहिर किया था.

मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी.

आयोग के विरुद्ध सड़कों पर, EVM पर अविश्वास

2014 में चुनाव आयोग के फैसलों का विरोध सड़कों पर दिखाई दिया. समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान पर प्रचार संबंधी प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उनके समर्थकों ने उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन किए और आयोग के पुतले जलाने का प्रयास किया. इसके बाद दिल्ली के जंतरमंतर पर भी प्रदर्शन हुआ. आरोप था कि आयोग अलगअलग राजनीतिक नेताओं के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं कर रहा. 2017 के बाद विवाद ने नया रूप लिया. कई विपक्षी दलों ने EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए.

10 अप्रैल 2017 को 13 राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग से मिलकर EVM संबंधी आपत्तियां दर्ज कराईं. आयोग ने इसके बाद EVM Challenge की प्रक्रिया शुरू की. 2019 में महाराष्ट्र सहित कई स्थानों पर विपक्षी दलों ने EVM के खिलाफ अभियान और प्रदर्शन किए तथा कागजी मतपत्र की वापसी की मांग की.

आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

2019 के आम चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के नेताओं ने दिल्ली में निर्वाचन आयोग के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उन्होंने आयोग के सामने विरोध दर्ज कराया. इसी चुनाव में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के बाहर धरना दिया और आयोग की कार्रवाई को मनमानीपूर्ण और अलोकतांत्रिक बताया.

2024 के लोकसभा चुनाव के समय तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने दिल्ली में चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर धरना दिया. चुनाव के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर आयोग से हस्तक्षेप की मांग की गई. 2025 में मिल्कीपुर उपचुनाव के बाद समाजवादी पार्टी ने संसद परिसर में प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया. सांसदों ने सफेद कपड़ा लेकर प्रदर्शन किया, जिस पर चुनाव आयोग लिखा था. आरोप चुनावी प्रक्रिया में पक्षपात से संबंधित थे. इन सभी विरोध प्रदर्शनों में आरोप अलगअलग थे. राजनीतिक दल अलगअलग थे. लेकिन प्रश्न एक था और वह था आयोग की निष्पक्षता पर अविश्वास.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार.

ज्ञानेश कुमार क्यों निशाने पर?

मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से विपक्ष की मुख्य शिकायत मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर शुरू हुई. बिहार से शुरू हुए इस अभियान में 2025 की पुरानी सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए. विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव और सत्तादल के हितों का ख्याल रखा गया. SIR प्रक्रिया के पश्चिमी बंगाल सहित देश के दूसरे राज्यों में विस्तार के साथ यह विवाद और तीव्र होता गया. इस प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले वहां की मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर वोट कटने अथवा बदलाव ने विवाद को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा दिया.

इस सबके बीच ज्ञानेश कुमार की भूमिका और निर्णयप्रक्रिया पर भी सवाल उठे. पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस अखबार में आयोग के कई फैसलों के प्रति दो अन्य सदस्यों की आपत्तियों के खुलासे ने विपक्ष को ज्ञानेश कुमार पर हमलावर होने के और अवसर दिए. फिलहाल विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर है. साथ ही मतदाता सूचियों के गहन परीक्षण से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों पर सर्वोच्च न्यायालय भी विचार कर रहा है.

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संपादकीय टीम

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