भारतीय टेलीकॉम और मोबाइल बाजार के इतिहास में नोकिया सिर्फ एक ब्रांड नहीं था, बल्कि एक ऐसा इमोशन था जिसने देश के कोनेकोने में डिजिटल क्रांति की नींव रखी थी। 2000 के दशक में जब भारत का मोबाइल फोन मार्केट अपने शुरुआती दौर में था, तब नोकिया ने यहां कदम रखा और देखते ही देखते बाजार पर पूरी तरह कब्जा कर लिया।

नोकिया 3310, 1100 और बाद में ईसीरीज और एनसीरीज जैसे मॉडल्स ने मध्यम वर्गीय परिवारों का दिल जीत लिया। इसकी मजबूती, लंबी बैटरी लाइफ और आसान इंटरफेस ने उपभोक्ताओं के बीच ऐसा भरोसा पैदा किया कि उस दौर में मोबाइल का मतलब ही ‘नोकिया’ बन गया था। चेन्नई के श्रीपेरंबुदूर में अपनी विशाल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के साथ नोकिया ने ‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर भारी पैमाने पर उत्पादन किया और लाखों युवाओं को रोजगार देकर भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ बना।
हालांकि, साल 200708 के आसपास तस्वीर बदलनी शुरू हुई जब दुनिया में टचस्क्रीन स्मार्टफोन का दौर आया। एप्पल के आईफोन और गूगल के एंड्राइड ने बाजार में दस्तक दी, लेकिन नोकिया इस बदलाव को भांपने में बुरी तरह चूक गई। जहां युवा वर्ग इंटरनेट और आधुनिक टचस्क्रीन अनुभव की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा था, वहीं नोकिया अपने पुराने सिम्बियन ऑपरेटिंग सिस्टम और कीपैड वाले फोनों पर ही अड़ा रहा। कंपनी का यह अतिआत्मविश्वास और बदलती तकनीकी प्राथमिकताओं को समय पर न समझ पाना उसके पतन की सबसे बड़ी वजह बना।
ग्लोबल लेवल पर पिछड़ने का असर भारत में भी दिखा, और कानूनी व टैक्स विवादों ने चेन्नई प्लांट की चमक फीकी कर दी। माइक्रोसॉफ्ट द्वारा नोकिया के मोबाइल बिजनेस के अधिग्रहण के बाद विंडोज आधारित लूमिया फोन भी उपभोक्ताओं को रिझाने में नाकाम रहे। इस खाली जगह को चाइनीज कंपनियों ने तेजी से भर दिया, जिससे नोकिया को बाजार से लगभग बेदखल होना पड़ा।
हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ सालों के अंतराल के बाद नोकिया ने एचएमडी ग्लोबल के जरिए एंड्राइड प्लेटफॉर्म पर लौटते हुए भारतीय बाजार में फिर से एंट्री की। कंज्यूमर हैंडसेट मार्केट की मुख्य दौड़ से पीछे हटने के बाद नोकिया ने भारत के टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर और 5जी नेटवर्क डेवलपमेंट में अपनी ताकत झोंक दी। आज नोकिया भारत की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों को नेटवर्क उपकरण मुहैया कराने वाली मजबूत रीढ़ की हड्डी के रूप में देश की डिजिटल ग्रोथ में लगातार योगदान दे रही है।