नई दिल्ली के जोरबाग इलाके में रहने वाले एक टैक्सपेयर को इनकम टैक्स विभाग की तरफ से एक नोटिस मिला. असेसमेंट ईयर 201920 के लिए उन्होंने अपना इनकम टैक्स रिटर्न फाइल नहीं किया था. विभाग के इनसाइट पोर्टल ने उनसे जुड़े कुछ हाईवैल्यू ट्रांजैक्शन को फ्लैग कर दिया था, जिसके बाद ये कार्रवाई हुई. नोटिस मिलने के बाद टैक्सपेयर ने अपना रिटर्न भरा. इसमें उन्होंने साल भर में कटे 5.31 लाख रुपये के टीडीएस रिफंड की मांग की. लेकिन विभाग ने ये रिफंड देने से साफ इनकार कर दिया. इसके बाद मामला दिल्ली इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल पहुंचा, जहां टैक्सपेयर की बड़ी जीत हुई.

रिफंड रोके जाने की असली वजह
टैक्सपेयर ने तय समय पर असेसमेंट ईयर 201920 का ओरिजिनल ITR फाइल नहीं किया था. इसके बाद 27 मार्च 2023 को विभाग ने रीअसेसमेंट की प्रक्रिया शुरू की. धारा 148 के तहत एक नोटिस जारी किया गया. इसके जवाब में टैक्सपेयर ने जो ITR फाइल किया, उसमें अपने बिजनेस में 1.38 करोड़ रुपये का नुकसान दिखाया. इस नुकसान को एडजस्ट करने के बाद उनकी टैक्सेबल इनकम शून्य हो गई. इसी आधार पर उन्होंने 5,31,680 रुपये के रिफंड का क्लेम किया था.
असेसिंग ऑफिसर ने शून्य इनकम की बात तो मान ली, लेकिन रिफंड देने से मना कर दिया. अफसर का तर्क था कि टैक्सपेयर ने धारा 139 के तहत ओरिजिनल रिटर्न नहीं भरा था. पहली बार रिफंड का दावा धारा 148 के नोटिस के जवाब में भरे गए रिटर्न में किया गया था. पहली अपीलीय अथॉरिटी ने भी इस फैसले को सही ठहराया था.
ITAT के फैसले से मिली बड़ी जीत
जब ये मामला दिल्ली ITAT के पास पहुंचा, तो ट्रिब्यूनल ने इसकी गहराई से समीक्षा की. सवाल ये था कि क्या सिर्फ ओरिजिनल रिटर्न न भरने की वजह से रिफंड रोका जा सकता है. ट्रिब्यूनल ने इसका जवाब ‘नहीं’ में दिया. इनकम टैक्स एक्ट की धारा 237 के मुताबिक, अगर चुकाया गया टैक्स तय देनदारी से ज्यादा है, तो रिफंड मिलना चाहिए. चूंकि रीअसेसमेंट के बाद टैक्सेबल इनकम शून्य हो गई थी, इसलिए अतिरिक्त टीडीएस रिफंडेबल था.
ITAT ने स्पष्ट किया कि ये रिफंड असेसमेंट ऑर्डर का ही एक स्वाभाविक परिणाम है. इसे रीअसेसमेंट के दायरे से बाहर का कोई नया दावा नहीं माना जा सकता. ट्रिब्यूनल ने संविधान के अनुच्छेद 265 का भी हवाला दिया. इसके अनुसार, कानून के अधिकार के बिना कोई भी टैक्स नहीं वसूला जा सकता. अंततः, असेसिंग ऑफिसर को निर्देश दिया गया कि वह 5,31,680 रुपये का रिफंड वैधानिक ब्याज समेत टैक्सपेयर को जारी करें.
पुराने रिफंड क्लेम पर जानकारों की राय
इस फैसले का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि कोई भी टैक्सपेयर कभी भी पुराने रिफंड का दावा कर सकता है. टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सबसे सही तरीका यही है कि समय पर अपना रिटर्न फाइल किया जाए. टैक्सबडी की सीपीओ दिव्या भानुशाली का कहना है कि अगर ओरिजिनल या बिलेटेड रिटर्न नहीं भरा गया है, तो टैक्सपेयर धारा 119 के तहत देरी माफी के लिए कमिश्नर से अपील कर सकते हैं. हालांकि, अगर विभाग खुद रीअसेसमेंट की प्रक्रिया शुरू करता है, तो नए भरे गए ITR में रिफंड का दावा किया जा सकता है.
विभाग के इनकार पर क्या करें टैक्सपेयर्स
अगर किसी का रिफंड विभाग रिजेक्ट कर देता है, तो आगे के कदम हालात पर निर्भर करते हैं. अगर रिटर्न भरने की डेडलाइन खत्म हो चुकी है, तो देरी माफी की अपील करना सही विकल्प है. अगर रिफंड क्लेम किया गया था, लेकिन प्रोसेसिंग में किसी गलती से पैसा नहीं मिला, तो रेक्टिफिकेशन फाइल किया जा सकता है. वहीं, डीएमडी एडवोकेट्स के पार्टनर करणजोत सिंह खुराना बताते हैं कि अगर रीअसेसमेंट के दौरान वैलिड रिफंड क्लेम किया गया है, फिर भी उसे खारिज कर दिया जाए, तो अपील में जाना सबसे सही कानूनी रास्ता होता है.