चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश माना जाता है. यानी कुल मात्रा में वही सबसे ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है. इसी वजह से उसे अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक भी कहा जाता है. लेकिन दूसरी तरफ एक और सच है. चीन बड़े पैमाने पर पेड़ भी लगा रहा है. रेगिस्तान रोकने, मिट्टी बचाने और हवा सुधारने के लिए उसने लंबे समय से अभियान चला रखा है. चीन का पेड़ लगाने का अभियान 1978 में शुरू हुआ. अब तक 66 अरब से ज्यादा पेड़ लगा चुका है. इस अभियान से करीब 3.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में हरियाली बढ़ी. चीन का वन आवरण बढ़कर 25% से अधिक हो गया है. साल 1949 में चीन में वन केवल 10 फीसद थे. विश्व पर्यावरण दिवस के बहाने आइए समझते हैं कि दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वाला देश चीन आज सबसे ज्यादा पेड़ लगाने का अभियान क्यों चलाए हुए है?

अगर हम कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की बात करें, तो चीन ने लगभग 2006 के आसपास अमेरिका को पीछे छोड़ दिया था. इसके बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक कार्बन उत्सर्जक बन गया. सबसे बड़ा प्रदूषक टर्म को कई तरह से समझा जा सकता है. कुछ लोग इसे कुल उत्सर्जन से मापते हैं. कुछ लोग प्रति व्यक्ति उत्सर्जन से. कुछ लोग हवा की गुणवत्ता से. लेकिन अंतरराष्ट्रीय बहस में चीन को सबसे बड़ा प्रदूषक मुख्य रूप से कुल कॉर्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन के आधार पर कहा जाता है.
चीन के तेजी से औद्योगिक बनने के कारण यह स्थिति बनी. उसकी फैक्ट्रियां तेजी से बढ़ीं. कोयले का इस्तेमाल बहुत हुआ. बिजली की मांग बढ़ी. सड़कें, शहर, बंदरगाह और उद्योग तेजी से बने. इस विकास ने चीन को आर्थिक ताकत दी. लेकिन पर्यावरण पर भारी दबाव भी डाला.
चीन में उद्योग की रफ्तार बढ़ाने पर प्रदूषण बढ़ा. फोटो: pexels
चीन में प्रदूषण इतना ज्यादा क्यों बढ़ा?
चीन की अर्थव्यवस्था कई दशकों तक तेज उत्पादन पर टिकी रही. उसने दुनिया की फैक्ट्री बनने का रास्ता चुना. सस्ते श्रम, बड़े कारखाने और तेज निर्यात उसकी ताकत बने. इस मॉडल के कारण कई समस्याएं भी पैदा हुईं.
1- कोयले पर बहुत ज्यादा निर्भरता: चीन ने बिजली बनाने के लिए लंबे समय तक कोयले पर भरोसा किया. कोयला सस्ता था. उपलब्ध था. और उद्योगों को लगातार ऊर्जा देता था. लेकिन कोयला सबसे गंदे ईंधनों में से एक है.
2- तेज औद्योगीकरण: इस्पात, सीमेंट, रसायन, मशीनरी और निर्माण क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़े. इन उद्योगों से भारी प्रदूषण होता है.
3- शहरीकरण: चीन में करोड़ों लोग गांवों से शहरों में आए. नए घर बने. नई सड़कें बनीं. नई गाड़ियां आईं. इससे ऊर्जा की मांग और बढ़ गई.
4- निर्यात आधारित विकास: दुनिया भर के लिए सामान बनाने का काम चीन ने बड़े पैमाने पर किया. यानी चीन का कुछ प्रदूषण उन वस्तुओं से भी जुड़ा है, जिनका उपभोग दूसरे देश करते हैं.
फिर चीन सबसे ज्यादा पेड़ क्यों लगा रहा है?
चीन पेड़ सिर्फ दिखावे के लिए नहीं लगा रहा. इसके पीछे कई बड़े कारण हैं.
1- रेगिस्तान फैलने से रोकने के लिए
चीन के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में शुष्क क्षेत्र बहुत बड़े हैं. गोबी रेगिस्तान का फैलाव लंबे समय से चिंता का विषय रहा है. रेत के तूफान बीजिंग जैसे शहरों तक पहुंचते रहे हैं. इससे खेती, पानी, स्वास्थ्य और शहरों की जिंदगी प्रभावित होती है. पेड़ लगाने से मिट्टी बंधती है. हवा की रफ्तार कुछ हद तक रुकती है. धूल कम उड़ती है. इसी कारण चीन ने बड़े पैमाने पर हरित पट्टियां विकसित कीं.
2- मिट्टी और खेती बचाने के लिए
जहां जंगल कटते हैं, वहां मिट्टी बहने लगती है. बाढ़ का खतरा बढ़ता है. खेती की जमीन कमजोर हो जाती है. चीन को यह समस्या कई क्षेत्रों में दिखी. इसलिए उसने वनीकरण को कृषि सुरक्षा से भी जोड़ा.
चीन ने बड़े पैमाने पर हरित पट्टियां विकसित कीं. फोटो: pexels
3- हवा और पर्यावरण सुधारने के लिए
चीन के कई शहर कभी बहुत खराब वायु गुणवत्ता के लिए बदनाम रहे हैं. घना धुआं, धूल और जहरीली हवा बड़ी समस्या रही. पेड़ अकेले इस समस्या का हल नहीं हैं. लेकिन वे पर्यावरण सुधार में मदद करते हैं. वे धूल रोकते हैं. हरित क्षेत्र बढ़ाते हैं. स्थानीय तापमान पर असर डालते हैं. और शहरों को रहने योग्य बनाने में भूमिका निभाते हैं.
4- जलवायु राजनीति में छवि सुधारने के लिए
चीन पर लंबे समय से आरोप लगता रहा है कि उसने विकास के नाम पर बहुत प्रदूषण फैलाया. ऐसे में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना उसकी वैश्विक छवि सुधारने का भी एक तरीका है. वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह सिर्फ प्रदूषण फैलाने वाला देश नहीं है. बल्कि पर्यावरण सुधार में भी निवेश कर रहा है.
5- कार्बन संतुलन की रणनीति
पेड़ कार्बन को सोखते हैं. इसे कार्बन अवशोषण भी कहा जाता है. हालांकि, पेड़ लगाना, भारी औद्योगिक प्रदूषण की पूरी भरपाई नहीं कर सकता. फिर भी यह जलवायु नीति का एक हिस्सा है. चीन अपने उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और वनीकरण, तीनों पर काम कर रहा है.
चीन ने साल 1978 से अब तक 66 अरब से ज्यादा पेड़ लगाए हैं. फोटो: pexels
क्या है ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट?
चीन ने पेड़ लगाने का काम छोटे स्तर पर नहीं किया. यह एक संगठित राष्ट्रीय अभियान की तरह चला. चीन में सरकार बड़े पैमाने पर जमीन चिन्हित करती है. फिर वहां पौधरोपण कार्यक्रम चलाए जाते हैं. कई जगह स्थानीय प्रशासन, सेना, स्कूल और सामुदायिक समूह भी शामिल किए जाते हैं. चीन ने रेगिस्तान रोकने के लिए विशाल हरित पट्टी विकसित करने का प्रयास किया. इसे अक्सर ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना के रूप में जाना जाता है.
इस परियोजना में साल 1978 से अब तक 66 अरब से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं. इसका उद्देश्य उत्तर चीन में पेड़ों की लंबी पट्टी तैयार करना है. ताकि धूल भरी हवाओं और भूमि क्षरण को रोका जा सके. कुछ ढलानदार या कमजोर कृषि भूमि को फिर से जंगल या घास वाले क्षेत्र में बदला गया. इससे मिट्टी का कटाव कम करने की कोशिश हुई. चीन ड्रोन, सैटेलाइट और डिजिटल मैपिंग जैसी तकनीकों का उपयोग भी करता है. इससे पता चलता है कि कहां पौधे लगे, कहां बचे, और कहां असफल रहे.
चीन की पेड़ लगाने की नीति की आलोचना भी होती है. फोटो: pexels
क्या सिर्फ पेड़ लगाने से समस्या हल हो जाएगी?
नहीं. बिल्कुल नहीं. फिर भी पेड़ लगाना अच्छा कदम है. लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है. अगर एक देश लगातार कोयला जलाता रहे, भारी उद्योग बढ़ाता रहे और दूसरी तरफ पेड़ लगाता रहे, तो कुल असर सीमित रहेगा. जलवायु संकट से निपटने के लिए असली जरूरत कोयले का कम उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार, उद्योगों में सुधार, वाहनों से उत्सर्जन कम करना और ऊर्जा दक्षता बढ़ाना है. पेड़ इसमें मदद करते हैं. लेकिन वे प्रदूषण की जड़ खत्म नहीं करते. जड़ है जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता. चीन की पेड़ लगाने की नीति पर आलोचना भी होती है.
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फिर भी चीन का मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुनिया को दो बातें एक साथ दिखाता है. पहली, तेज आर्थिक विकास अगर कोयले और भारी उद्योग पर आधारित हो, तो प्रदूषण बहुत बढ़ता है. दूसरी, जब पर्यावरणीय संकट बढ़ता है, तो वही देश बड़े पैमाने पर सुधार की कोशिश भी कर सकता है. चीन आज सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी तकनीक में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है. यानी वह प्रदूषण की समस्या का हिस्सा भी है और समाधान का एक हिस्सा भी बनना चाहता है.
इस तरह कहा जा सकता है कि चीन लगभग 2006 के आसपास कुल कार्बन उत्सर्जन के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक देश बन गया. इसकी मुख्य वजह थी तेज औद्योगीकरण, कोयले पर निर्भरता, निर्यात आधारित उत्पादन और तेज शहरीकरण. लेकिन बाद में उसे समझ आया कि पर्यावरणीय नुकसान बहुत भारी पड़ सकता है. रेगिस्तान बढ़ रहे थे. हवा खराब हो रही थी. मिट्टी कट रही थी. लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा था. अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ रहा था. इसीलिए चीन ने बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने शुरू किए. उसका लक्ष्य सिर्फ हरियाली बढ़ाना नहीं है. बल्कि धूल रोकना, जमीन बचाना, जलवायु नीति में संतुलन दिखाना और अपनी वैश्विक छवि सुधारना भी है. फिर भी सच यही है कि पेड़ लगाना जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं. जब तक प्रदूषण के बड़े स्रोत कम नहीं होंगे, तब तक असली बदलाव अधूरा रहेगा.












